गीता ही है ज्ञान की कुंजी

भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण ने कलयुग में जीवों के उद्धार के लिए श्रीमद् भगवद गीता का पावन ज्ञान दिया था, यह ज्ञान न सिर्फ आत्मोत्थान के लिए उपयोगी है, बल्कि व्यवसायिक दृष्टिकोण से भी बेहद सफल व उपयोगी माना जाता है, शायद यही वजह है कि आज के बड़े- बड़े मैनेजमेंट गुरु गीता के ज्ञान को कोड करना नहीं भूलते हैं । चाहे प्रबंधन का क्षेत्र हो या आत्मचेतन को जागृत करने का, सभी जगह गीता ज्ञान बिल्कुल फिट बैठता है। अब बात करते है, उस दौर की यानी द्बापरयुग की, जब भगवान श्री कृष्ण स्वयं इस धरती पर अवतरित हुए थे, उस समय महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद महर्षि वेद व्यास जब धर्म ग्रंथों का लिपिबद्ध कर रहे थे, तब भगवान ने उन्हें इंगित किया था कि कलयुग में मनुष्य की बुद्धि का ह्वास हो जाएगा और अति अल्प होगी, तब इस ज्ञान को समझना मनुष्य के लिए सहज नहीं रहेगा। शायद यही वजह रही होगी कि भगवान ने गीता का परमोपयोगी ज्ञान मंत्र मनुष्यों का दिया, जिसे वह सहजता से समझ सके और उसे जीवन में उतार कर अपने जीवन का उद्धार कर सके। गीता में श्री कृष्ण भगवान ने मोह के विभिन्न स्वरूपों को प्रकट किया है।

वास्तव में गीता में भगवान ने अर्जुन से संवाद के जरिए सृष्टि को ज्ञान के अमृत का पान कराया है। गीता के विभिन्न पहलुओं की विश्लेषण करें तो अनुभूति होती है कि मोह ही सब दुखों का मूल है, जबकि प्रेम आनंद प्रदान कराने वाला है, मोह में मनुष्य अपने विवेक को खो देता है, जबकि प्रेम में विवेक जागृत होता है और व्यक्ति विश्ोष से अपेक्षाएं नहीं होती है। कहने का आशय यह है कि प्रेम किसी भी प्रकार के बंधनों से परे होता है, यानी प्रेम के बदले प्रेम की अभिलाषा नहीं होती है लेकिन मोह बंधनों में जकड़ता है। मोह से ग्रस्त व्यक्ति का कर्म निष्काम नहीं हो सकता है, जबकि गीता में निष्काम कर्म को प्रधानता प्रदान की गई है। वैसे तो गीता का हर प्रसंग हमे सीख देता है लेकिन धनुर्धारी अर्जुन का युद्ध क्षेत्र में मोह के बंधनों में जकड़ कर विषादग्रस्त होना और भगवान का उन्हें विराट रूप दिखाना जीवन के मूल स्वरूप को प्रदर्शित करने वाला है। विराट स्वरूप के जरिए भगवान ने अर्जुन को यह अनुभूति करा दी थी कि जिसे पृथक सृष्टि समझ रहा है और स्वयं व दूसरों का अस्तित्व मान रहा है, वास्तव में वह सब तो भगवान के विराट स्वरूप में ही समाहित है, कुछ भी भिन्न नहीं है, जो है, वहीं अनंत परमात्मा ही है, जो सृष्टि को अपनी गति से चलायमान कर रहा है।

श्रीमद् के इस श्लोक को ही लें, तो आपकों स्वयं ही गीता के संदेशों में स्पष्टता की अनुभुति होगी।
श्लोक है-

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम।
म व`मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।

अर्थ- हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

यह हैं गीता के अमृत तुल्य वाक्य-

खाली हाथ आए और खाली हाथ चले जाएगे। जो तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता ही तुम्हारे दुखों का कारण है।

  • परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वआज ही तो वास्तव में नव जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारे हैं, तुम सबके हो।
  • न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बनी स्थूल देह है और इसी में मिल जायेगा। बस आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो? विचार करो।
  • तुम अपने आपको भगवान को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
  • जो तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल । ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।
  • क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से व्यक्ति का पतन हो जाता है।

-भृगु नागर

सनातन लेख

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