इस मंत्र के जप से प्रसन्न होते हैं शनि देव, जानिए शनि देव की महिमा

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शनि देव न्याय के देवता है, वह मनुष्य के कर्मों को देखते हैं, उसे कर्मों का भान करा कर सन्मार्ग की ओर प्ररित करते हैं। शनैश्चर के शरीर की कांति इंद्रनीलमणि के समान है। इनके सिर पर स्वर्ण मुकुट, गले में माला और शरीर पर नीले रंग के वस्त्र शोभा पाते हैं। इनके चार  हाथ हैं। हाथों में क्रमश: धनुष, वाण, त्रिशूल व वरमुद्रा धारण करते हैं। इनका वाहन गीध है।
शनि देव के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण कृष्ण, वाहन गीध और रथ लोहे का बना है। यह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं। यह मकर व कुम्भ राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है।

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शनि देव भगवान सूर्य और छाया यानी संवर्णा के पुत्र हैं। ये क्रूर ग्रह माने जाते हैं। इनकी दृष्टि में क्रूरता है, क्योंकि ये न्याय के देवता है। वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। पुराणों में इनकी तमाम गाथाएं मिलती हैं, एक गाथा के अनुसार बालपन से ही शनि देवता भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थ्ो। वे भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में निमगÝ रहा करते थ्ो। वयस्क होने पर इनके पिता ने इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से कर दिया। इनकी पत्नी सती,साध्वी और परम तेजस्वी थीं। एक रात्रि वह ऋतु ·ान करके पुत्र प्राप्ति की इच्छा से शनि देव के पास पहुंचीं, लेकिन शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के ध्यान में निमगÝ थ्ो। उन्हें बाह्य संसार की सुधि ही नहीं थी। उनकी पत्नी प्रतीक्षा करके थक गईं। उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। उन्होंने क्रुद्ध होकर शनिदेव को शाप दिया कि आज से तुम जिसे देख लोगे, वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान भंग होने पर शनिदेव ने अपनी पत्नी को मनाया। पत्नी को अपनी भूल का अहसास हुआ लेकिन शाप के प्रतिकार की शक्ति उनमें नहीं थी। तब से शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे, क्योंकि वह नहीं चाहते थ्ो कि उनके द्बारा किसी का अनिष्ट हो।


ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि शनि ग्रह यदि कहीं रोहिणी- शकट भ्ोदन कर दे तो पृथ्वी पर 12 वर्ष तक घोर दुर्भिक्ष पड़ जाए और प्राणियों का बचना ही कठिन हो जाएगाा। शनि ग्रह जब रोहिणी का भ्ोदन कर बढè जाता है, तब यह योग आता है। यह योग महाराजा दशरथ के समय में आने वाला था। जब ज्योतिषियों ने महाराजा दशरथ जी को बताया कि यदि शनि का यह योग आ जाएगा तो प्रजा अन्न-जल के बिना तड़प-तड़प कर मर जाएगी, तब प्रजा को बचाने के लिए राजा दशरथ अपने रथ पर सवार होकर नक्षत्रमंडल पहुंचे। पहले तो महाराजा दशरथ ने शनि देवता को नित्य की भांति नमन किया और बाद में क्षत्रीय धर्म के अनुसार उनसे युद्ध करते हुए उन पर संहारास्त्र का संधान किया। तब शनि देवता दशरथ की कर्तव्य निष्ठा से प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने के लिए कहा। महाराजा दशरथ ने वर मांगा कि जब तक सूर्य, नक्षत्र आदि विद्यमान हैं, तब तक आप शकट-भ्ोदन न करें। शनि देव ने उन्हंे वर देकर संतुष्ट कर दिया।

शनि देव को शांत व प्रसन्न कैसे करें
शनि देव की शांति के लिए महामृत्युंजय जप करना चाहिए। नीलम धारण करने से भी शनिदेव शांत होते हैं। ब्राह्मणों को तिल, उड़द, भैंस, लोहा, तेल, काला वस्त्र, नीलम, काली गौ, जूता, कस्तुरी और स्वर्ण दान देने से शनि देव की कृपा प्राप्त होती है।

शनि देव को शांत व प्रसन्न करने का वैदिक मंत्र

ऊॅँ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु न: ।।

शनिदेव को शांत व प्रसन्न करने का पौराणिक मंत्र

ॐ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम |
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम ||

बीज मंत्र
ॐ प्रां प्रीं प्रों स: शनैश्चराय नमः ||

सामान्य मंत्र

ॅऊॅँ शं शनैश्चराय नम:।

इनमें से किसी भी एक मंत्र का श्रद्धानुसार नित्य निश्चित संख्या में जप करना चाहिए। जप संख्या 23००० हजार होनी चाहिए और जप का समय संध्याकाल होता है।

 

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