इस मंत्र से प्रसन्न होते हैं केतु, जानिए केतु की महिमा

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यदि केतु किसी व्यक्ति की कुडली में अशुभ स्थान पर रहते हैं तो वह अनिष्टकारी हो जाते हैं। अनिष्टकारी केतु का प्रभाव व्यक्ति को रोगी बना देता है। इसकी प्रतिकूलता से दाद, खाज और कुष्ठ जैसे रोग होते हैं।
सागर मंथन के पश्चात जब भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृतपान करा रहे थ्ो, तब राहु वहां देवताओं की कतार में बैठ गए थ्ो और अमृत का पान कर लिया था, तभी चंद्र देव व सूर्य देव ने इसका खुलासा कर दिया तो भगवान विष्णु ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। चक्र से सिर कटने के बाद सिर वाला हिस्सा राहु कहलाये तो धड़ वाला हिस्सा केतु कहलाए। केतु जो हे राहु का ही कबन्ध हैं। राहु के साथ केतु भी ग्रह बन गए थ्ो।

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मत्स्य पुराण के अनुसार केतु बहुत से है लेकिन उनमें धूम केतु प्रधान है। ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाताओं के अनुसार यह छाया ग्रह है। केतु की दो भुजाएं हैं। वे अपने सिर पर मुकुट और शरीर पर काला वस्त्र धारण करते हैं। उनका शरीर धूम्रवर्ण है और मुख विकृत है। वे अपने एक हाथ में गदा तो दूसरे हाथ में वरमुद्रा धारण करते हैं और नित्य गीध पर समासीन होते हैं। केतु व्यक्ति के जीवन क्ष्ोत्र और समस्त सृष्टि को प्रभावित करते हैं। आकाश मंडल में इसका प्रभाव वायव्यकोण में माना जाता है। यह भी माना जाता है कि राहु की अपेक्षा केतु अधिक सौम्य और व्यक्ति के हितकारी हैं। कुछ विश्ोष परिस्थितियों में यह व्यक्ति को यश के शिखर पर पहुंचा देते हैं। केतु का मंडल ध्वजाकार माना गया है। यही कारण है कि यह आकाश में लहराती ध्वजा के समान दिखाई देते हैं। इनका माप केवल छह अंगुल है।

हालांकि राहु केतु के शरीर का मूल अंग थ्ो और वे दानव जाति के थ्ो लेकिन ग्रहों में परिगणित होने के पश्चात उनका पुनर्जन्म मानक उनका नया गोत्र घोषित किया गया। इसी आधार पर राहु पैठीनस गोत्र और केतु को जैमिनी गोत्र का सदस्य माना गया है। कहीं-कहीं इनका कपोत वाहन भी मिलता है। केतु की महादशा सात वर्ष की होती है। इनके अधिदेवता चित्रकेतु और प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं।

केतु को कैसे करें प्रसन्न
नीले रंग का पुष्प, वैदूर्य रत्न तेल, काला तिल, कम्बल, शस्त्र व कस्तूरी दान देने से केतु प्रसन्न होते हैं और साधक का कल्याण करते हैं। लहसुनियां रत्न धारण करने से केतु की कृपा प्राप्त होती है। मृत्यंजय जप से भी केतु प्रसन्न होते हैं। नवग्रह मंडल में इनका प्रतीक वायव्यकोण में काले रंग का ध्वज है।

केतु की प्रसन्नता के लिए वैदिक मंत्र
ऊॅँ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे।
सुमुषjिम्दरजार्यथा:। केतवे नमः।। 

केतु की प्रसन्नता के लिए पौराणिक मंत्र
पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्।।

बीज मंत्र
ऊॅँ स्रां स्रीं सौं स: केतवे नम:

साधारण मंत्र
ऊॅँ कें केतवे नम:

इसमें से किसी भी मंत्र का जप निश्चित संख्या में प्रति दिन किया जाना चाहिए। जप संख्या 17००० और समय रात्रि का होना चाहिए। हवन के लिए कुश को प्रयोग करना चाहिए।

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