जाने, शिवलिंग की महिमा, लौकिक व अलौकिक अर्थ

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भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। आदिपुरुष हैं। उनका न आदि है और न ही अंत हैं। सृष्टि में सर्वानंद देने वाले भोले शंकर जिस पर प्रसन्न होते हैं, उसे जीवन-मृत्यु के इस जंजाल से मुक्ति मिल जाती है, अर्थात मोक्ष के द्बार उसके लिए खुल जाते हैं। वे देवों के देव यानी महादेव कहलाते हैं। उनकी महिमा का बखान जिव्हा से सम्भव नहीं है। उन महादेव यानी शंकर की पूजा में लिंग पूजा का विशेष विधान है। वैसे तो महादेव यानी शिव-शंकर श्रद्धा से नमन मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं। वह जीव के भाव को देखते है, उसके कष्टों को हर लेते है। ऐसे महादेव की पूजा में शिवलिंग की पूजा का विधान है। आइये समझते हैं कि शिवलिंग क्या अर्थ है?, क्या महत्व है? और क्या महिमा है?

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शिवलिंग के भेद

शिव – ‘ श ‘ + ‘ इ ‘ + ‘ व ‘

– ‘ श ‘ कार अर्थात नित्य सुख व आनंद।

– ‘ इ ‘ कार अर्थात पुरुष ।

– ‘ व ‘ कार अर्थात अमृतस्वरूपा भक्ति ।

शिव अर्थात ‘ कल्याण ‘ का प्रतीक, निश्चल ज्ञान , ब्रह्म तेज, सृजन – सृजनहार शक्ति का प्रतीक हैं । वहीं स्कन्दपुराणानुसार लिग अर्थात ‘ लय ‘, कहने का आशय है कि प्रलय के समय सब कुछ अग्नि मे परिवर्तित हो कर लिग मे समा जाता है और पुन: सृष्टि के समय लिग से ही प्रकट हो जाता है ।

लिंग पुराण में के अनुसार:

मूले ब्रह्मा मध्ये विष्णु त्रिभुवनेश्वर: रुद्रोपारि सदाशिव: ।

लिगवेदी महादेवी लिग साक्षान्महेश्वर: ।।

अर्थ – शिव लिग में सब से नीचे ब्रह्मा जी – मध्य मे श्री विष्णु भगवान – सबसे ऊपर स्वंयमेव भोलेनाथ महादेव विराजते हैं, जब कि जलाधारी ( अर्घा ) तो साक्षात माता पार्वती हैं।

शिवलिंग के पूजन से होता है पंच देवों का पूजन:

सनातन वैदिक मान्यता के अनुसार पंच देव पूजन का विधान मान्य है, शिव लिग के पूजन से साक्षात सभी पंच देवों का पूजन हो जाता है।

लिंग और योनि की अविभाज्य एकात्मकता प्रतीकात्मक रूप मे जीवन के स्रोत्र में निष्क्रिय अंतिरक्ष और सक्रिय समय का दर्शन है । कुछ तथाकथित विद्वानो ने इसकी व्याख्या यौन अंगों के रूप मे की है, लेकिन सनातन दर्शन पुरुष व महिला सिद्धान्तों और रचना की समग्रता और अवियोज्यता का प्रतीकात्मक स्वरूप मानता है ।

शिवलिंग की महत्ता उसकी रचना, दुर्लभता के साथ स्थापित स्थल पर निर्भर करती है । शिवलिग के कई रूपों का निर्माण विभिन्न कालक्रमों मे हुआ है । प्रकृतिक रूप से नदी के बहाव से अद्भुत शिव लिगों का निर्माण होता है ( जैसे नर्मदा जी मे पाये जाने वाले ‘ वाणलिग ‘ कंकर कंकर में शंकर ) । एकमुखी , चतुर्मुखी, पन्चमुखी , अष्टमुखी शिवलिगों की निर्मित हुए हैं। सनातन हिन्दु मान्यता वाले देशों मे लिगोद्भव प्रतिमाओं की रचनायें बहुतायत से अभी भी पायी जाती हैं।

1- स्वयंभू लिंग – देवर्षियों की तपस्या से प्रसन्न हो कर उनके समीप प्रकट होने के लिये पृथ्वी के अन्तर्गत बीजरूप से व्याप्त भगवान शिव वृक्षों के अंकुर की भांति भूमि को भेद कर ‘ नाद ‘ लिंग के रूप मे व्यक्त होते हैं और स्वंय प्रकट होने के कारण ‘ स्वयंभू ‘ कहलाते हैं ।

2- बिन्दु लिंग – सोने या चांदी के पात्र पर भूमि अर्थात वेदी पर अपने हाथ से लिखे शुद्ध प्रणवरूप लिग में भगवान शिव की प्रतिष्ठा और आह्वान करने पर पूजा जाने वाला नाद लिग – बिन्दु लिग कहलाते हैं( इनमें स्थावर और जंगम दो भेद हैं )।

3- प्रतिष्ठित लिंग – देवताओं और ऋषियों द्बारा वैदिक मन्त्रो के उच्चारण पूर्वक अपने हाथ से शुद्ध भावनापूर्वक पौरुष लिंग ही ‘ प्रतिष्ठित लिंग ‘ कहलाते हैं ।

4- चर लिंग – लिंग , नाभि , जिव्हा , नासाग्र भाग , शिखा के क्रम में कटि, हृदय और मस्तिष्क में की गयी लिग की भावना ही ‘ अध्यात्मिकता ‘ है और यही चर लिग कहलाते हैं ।

5- गुरु लिंग – गुरु में शिव भावना करना और उनके निर्देश से पूजन के लिये अस्थायी रूप से मिट्टी से बनाया हुआ लिग , जिसे पूजन पश्चात विसर्जित किया जाता है, ‘ गुरु लिंग ‘ कहलाते हैं ।

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