जानिए, क्या है माता वैष्णवी की तीन पिण्डियों का स्वरूप

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गवती वैष्णवी की तीन पिण्डियां वैष्णों देवी के दरबार में हैं। क्या आप जानते हैं कि कौन सी पिण्डी किस देवी का स्वरूप है? उनकी क्या महिमा है? आइये हम आपको बताते हैं कि देवी की तीन पिण्डियों के स्वरूप के बारे में-

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तीन पिण्डियों में जो मध्यवर्ती पिण्डी है, वह महालक्ष्मी का स्वरूप हैं, जो कि भगवान विष्णु की शक्ति हैं। इनका दूसरा नाम है वैष्णवी। परमात्मा की और शक्तियां हैं। इन अनेक शक्तियों में भगवान विष्णु की अहन्त नाम की जो शक्ति हैं, वही महालक्ष्मी कहलाती हैं। इस स्थान पर स्वयं महालक्ष्मी ने इंद्र से कहा था कि उस पारब्रह्म की जो चंद्रमा की चांदनी की तरह समस्त अवस्थाओं में साथ देने वाली शक्ति है, वह आदि शक्ति मैं ही हूं। मेरा दूसरा नाम नारायणी भी है। मैं नित्य, निर्दोष, सीमारहित कल्याण गुणों वाली, नारायणी के नाम वाली वैष्णवी हूं। पुरातन शास्त्रों के अनुसार जो देवी परम शुद्ध व सत्व स्वरूपा है, उनका नाम महालक्ष्मी है। परम परमात्मा श्री हरि विष्णु की ये शक्ति हैं। हजार पंखुरियों वाला कमल उनका आसन है। इनके मुख की शोभा तपे हुए स्वर्ण के समान है और उनका रूप करोड़ों चंद्रमाओं की कांति से सम्पन्न है। माता महालक्ष्मी क मुख पर सदैव मुस्कान फैल रहती है। सम्पत्तियों की ईश्वरी होने के कारण अपने सेवकोें को ये धन, ऐश्वर्य, सुख, सिद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं।
भगवान श्री हरि की माया है और उनके तुल्य होने के कारण इन्हें नारायणी के नाम से जाना जाता है। जिस प्रकार नदियों में गंगा, देवताओं में श्री हरि और वैष्णवों में शिव श्रेष्ठ मान्य है, उसी तरह से देवी के सभी नाम रूपों में वैष्णवी नाम से प्रसिद्ध भगवती श्रेष्ठ हैं। माता महालक्ष्मी अत्यन्त सुंदर, संयमशील, शांत, मधुर और कोमल स्वभाव की हैं। क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार आदि से रहित अपने भक्तों पर सदैव कृपा करती है और श्रीहरि विष्णु से प्रेम करना उनके स्वभाव में है। जिस धन से जीव सांसारिक कार्य संचालित होते हैं, उनकी वह अधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी कृपा से वंचित जीव मृत के समान है। देवी का यह स्वरूप सबकी कारण रूप हैं।

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सर्वोच्च पवित्रता है और वैकुष्ठ लोक के स्वामी श्रीहरि की सेवा में लीन रहती हैं। भगवती का यह स्वरूप वैकुंठ में महालक्ष्मी, क्षीर सागर में गृह लक्ष्मी, व्यापारियों के यहां व्यापार लक्ष्मी और ग्राम-ग्राम में ग्राम देवी और घर-घर में महादेवी के रूपों में रहती हैं। पापी जो अपकर्म करते हैं, लड़ाई-झगड़ा, मारपीट, घृणा, द्बेष, पारस्परिक विरोध और निंदा आदि में प्रवृत्त होने हैं। जो भी जीव माता महालक्ष्मी का पूजा अर्चन और ध्यान करते हैं, महालक्ष्मी की शरण में रहते हैं। माता उनक पर सदैव ही कृपा करती हैं।

तीन पिण्डियों में दूसरी पिण्डी महाकाली का स्वरूप है। महाकाली शक्ति का प्रधान अंश हैं। शुम्भ-निशुम्भ के साथ होने वाले युद्ध में के समय भगवती दुर्गा के ललाट से प्रकट हुई थी। इन्हें भगवती दुर्गा का आधा अंश माना जाता है। गुण व तेज में ये दुर्गा के समान हैं। इनका अत्यन्त शक्तिशाली शरीर करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी है। सम्पूर्ण शक्तियों में ये प्रमुख हैं और इनसे बढ़कर कोई शक्तिशाली है नहीं। ये प्रयोग स्वरूपणी व सम्पूर्ण सिद्धि देने वाली हैं। ये श्रीहरि के तुल्य है। इनके शरीर का रंग काला है और इतनी शक्तिशाली है कि चाहे तो क्षणभर में सृष्टि को नष्ट कर सकती हैं।
जगत कल्याण के लिए वह असुरों से संग्राम करती हैं, जो मनुष्य भगवती काली की पूजा करता है, उसे अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। ब्रह्मादि देवता, मुनि और मानव आत्मकल्याण के लिए इनकी उपसाना करते हैं और उन्हें मनचाही कृपा प्राप्त होती है।
महाकाल शिव का एक नाम है, उनकी शक्ति होने के कारण इन्हें महाकाली कहा जाता है। भगवती का यह स्वरूप नील कमल की तरह श्याम है। भगवती महाकाली की चार भुजाएं हैं। गले में मुण्डमाला धारण करती हैं। चोला व्याघ्र के चर्म का है। इनके दांत लम्बे, जिह्वाा चंचल, आंख्ों लाल, कान चौड़े और मुंख खुला हुआ है। भद्रकाली, श्यशान काली, गुह्य काली और रक्षा काली आदि इनके अनेकों रूप हैं। इनका एक प्रसिद्ध मंदिर चामुंडा देवी है। इन्होंने असुरों से युद्ध के दौरान चंड-मुंड असुरों का संहार किया था, तभी से इन्हें चामुंडा देवी के नाम से जाना जाता है। महाकाली भक्तों की मनोकामनाएं सहज ही पूरी करती हैं। माता का यह स्वरूप महातेजस्वी है। उनकी मूर्ति में साक्षात वीरता, साहस, ऐश्वर्य, रूप, तेज और अलौकिक शक्ति प्रतीत होती है। उनके दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, वाण, धनुष, परिध, त्रिशूल, भुशुण्डि, सिर और शंख है।

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भगवती के इस स्वरूप के तीन नेत्र हैं। सभी अंग आभूषणों से सुशोभित हैं। उनकी कांति नीलमणि के समान है। वह सदा अपने भक्तों की संकटों से रक्षा कर उन्हें भोग व मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। देवताओं पर जब-जब संकट आया तो भगवती ने उनकी मदद की। भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के मनोरथ को पूर्ण किया। इनकी कृपा से जीव निर्भय हो जाता है। युद्ध में कोई उसे पराजित नहीं कर पाता है। उसे जीवन में सौभाग्य की प्राप्ति होती है और मृत्यु के उपरान्त मोक्ष मिलता है।

वैष्णों देवी के दरबार में तीसरी पिण्डी मां महासरस्वती का स्वरूप हैं। परब्रह्म परमात्मा से सम्बन्ध रखने वाली यह वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं। कवियों की इष्ट देवी हैं। शुद्ध सत्वस्वरूपा और शांत स्वरूपिणी हैं। वाणी, विद्या, बुद्धि और ज्ञान को प्रदान करने वाली भी यही देवी हैं, इसलिए वाणी की श्रेष्ठता, विद्याओं और कलाओं में निपुणता, बुद्धि में विलक्षणता और ज्ञान में विविधता के लिए इनकी कृपा अत्यन्त आवश्यक होती है।
मां सरस्वती गौर वर्ण हैं। ये अत्यन्त सुंदर और तेजस्वी हैं। इनका शरीर तेज की आभा से इतना कांतिमान रहता है कि करोड़ों चंद्रमाओं की आभा भी उसके सामने तुच्छ प्रतीत होती है। माता का मुख चंद्रामा, नयन शरतकाल के खिलते हुए कमलों के सामान और दांत कुंद पुष्प की कलियों के समान हैं। ये उज्जवल वस्त्र धारण करती हैं और विविध प्रकार के रत्नों से निर्मित आभूषणों से शोभा पाती हैं। महासरस्वती सभी श्रुतियों, शास्त्रों और सम्पूर्ण विद्याओं की स्वामिनी हैं।

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संसार की सभी विद्याएं और कलाएं इनका स्वरूप हैं। अनेक तरह के सिद्धांत-भेदोंे और अर्थों की कल्पना शक्ति भी यही देने वाली हैं। इनकी कृपा से शास्त्र और ज्ञान सम्बन्धित भ्रम और संदेह मिट जाते हैं। सरस्वती देवी के के एक हाथ में पुस्तक और हाथ में वीणा है, जो कि इनके विद्या और संगीत कला की देवी होने का संकेत देती है। ब्रह्मस्वरूपा, ज्योर्तिस्वरूपा, सनातनी और सम्पूर्ण कलाओं की स्वामिनी होने के कारण माता महासरस्वती ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवताओं से भी पूजित हैं। श्रीहरि विष्णु की प्रिय होने के कारण ये रत्न निर्मित माला फेरती हुईं उनके नाम का जप करती रहती हैं।

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