जानिए, रुद्राक्ष धारण करने के मंत्र

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षियों ने रुद्राक्ष धारण करने की विधि का विस्तार से वर्णन धर्म शास्त्रों ने किया है। वैदिक धर्म ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। पहले हम अपको जप करने का विधान बताते हैं। शास्त्रों में माला जप करने की विधि दो तरह की बताई गई है। 1- गोमुख निर्णय और 2- अंगुली निर्णय।

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1- गोमुखी निर्णय
वस्त्रेणाच्छादित करं दक्षिणं य: सदाजपेत।
तस्यस्यात्सफलं जाप्यं तद्धीनफलं स्मृतम्।।
भूत राक्षस बेताला सिद्ध गंधर्वचारणा:।
हरंति प्रकटं यस्मात्तस्माद्गुप्तं जपेत्सुधी:।।
भावार्थ: दाहिने हाथ को सदा वस्त्र से ढककर जप करना चाहिए। इस तरह जप करने से वह जप सफल होता है और इसके अच्छे फल मिलते है। माला को गुप्त रूप से जप करने से भूत, राक्षस, बेताल, गन्धर्व, चारण आदि की सभी प्रकार की बाधाएं दूर होती हैं।
2- अथांगुली निर्णय
अगुंष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्ज्जनी शत्रु नाशिनी।
मध्यमा धनदा शांति करत्वे वा ह्यनामिका।।
कनिष्ठा कर्षण्ोशस्ता जप कर्मणि शोभने।
अंगुष्ठेन बिना कर्म कृतं तदफल यत:।।
भावार्थ- अंगुष्ठे की सहायता से माला का जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और तर्जनी अंगुली की सहायता से जप करने से शत्रु का नाश होता है। मध्यमा अंगुली की सहायता से माला जप करने से धन की प्राप्ति होती है और अनामिका अंगुली की सहायता से माला जप करने से शांति की प्राप्ति होती है। कनिष्ठा अंगुली की सहायता से जप करना भी सुंदर होता है और बिना अंगुष्ठ की सहायता से किया कर्म का फल भी वैसा ही होता है।
मध्यमनामिकां गुण्ठैरक्षमालामणि शतै:।
एवं जपस्य चैकस्य क्रमाअय चलायेज्जपैत्।।
गंगुष्ठेन तु मोक्षाय मध्यमाधविवृद्धये।
जपेदनामिकां गुष्ठैर्नेतराश्यां कदाचन।
अंगुष्ठमध्यमायोगात्सर्व सिद्धि प्रदासने।।
भावार्थ- मध्यमा, अनामिका व अंगुष्ठ नामक अंगुलियों से रुद्राक्ष की माला को क्रम से एक-एक करके चलाता हुआ सौ बार जप करना चाहिए। अंगुष्ठे की सहायता से से माला को चलाने से मोक्ष मध्यमा अंगुली से माला चलाने से यश और श्री की वृद्धि होती है। अंगुष्ठ व अनामिका की सहायता से माला को कभी नहीं चलाना चाहिए। अंगुष्ठ व मध्यमा अंगुली की सहायता से माला को चलाकर जप करने से सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है।
पुन: इसे लेकर मतान्तर है-
अंगुष्ठमध्यमाभ्यां च चालयेन्मध्यमध्यत:।
तर्जन्या न स्पृश्ोदेनां मुक्तिदोगणनक्रम:।।
भावार्थ- अंगुष्ठ व मध्यमा अंगुली के मध्य कामला को चलाना और उसे तर्जनी अंगुली से स्पर्श न होने देना मुक्ति को देने वाला है।

एकमुखी रुद्राक्ष
एकमुखी रुद्राक्ष शिव स्वरूप परातत्व का प्रकाशक है। इसे धारण करने से प्राणी चिंतामुक्त होकर निर्भय रहता है। ब्रह्महत्या का पाप दूर होता है। इसके पूजन से लक्ष्मी का वास होता है। एकमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद विधिपूर्वक ऊॅँ एं हं अौं एें ऊॅँ ………………….. मंत्र का 1०8 बार जप करके धारण करना चाहिए।
पद्य पुराण के अनुसार मंत्र
ऊॅँ ऊॅँ दृशं नम: मंत्र से एक मुखी रुद्राक्ष को प्रतिष्ठित करना चाहिए।
एक मुखी रुद्राक्ष को किसी पवित्र दि व पवित्र नक्षत्र में सफेद धागे में पिरोकर इसके लिए बताए पूर्वाक्त मंत्र से अभिमंत्रित करके धारण करना चाहिए। इससे धन सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।

द्बिमुखी रुद्राक्ष
द्बिमुखी रुद्राक्ष धारण करने से अद्धनाशीश्वर प्रसन्न होते हैं। साथ ही गो हत्या का पाप दूर होता है। साथ ही स्वर्ग प्राप्ति में सहायता मिलती है। प्राणी धन-धान्य से सम्पन्न एवं चिंताआं से मुक्त होता है।
द्बिमुखी रुद्राक्ष को विधिपूर्वक सोमवार के दिन प्रात:काल या महाशिव रात्रि में ऊॅँ ह्रीं क्षौं व्रीं ऊॅँ …………………………मंत्र का 1०8 बार जप करके धारण करना चाहिए। 

त्रिमुखी रुद्राक्ष
त्रिमुखी रुद्राक्ष साक्षात् अग्नि स्वरूप है। इसका धारण करने से अग्नि की तृप्ति होती है। स्त्री हत्या के पास से मुक्ति, विद्या प्राप्ति, शत्रु का नाश, पेट की व्याधि और अशुभ घटनाओं से रक्षा होती है।
त्रिमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात: स्नानादि करके ऊॅँ रं ह्रैं ह्रीं ह्रूं ऊॅँ…….. मंत्र का 1०8 बार जप करके धारण करना चाहिए।

चतुर्मुखी रुद्राक्ष
चतुर्मुखी रुद्राक्ष पितामह ब्रह्मा के स्वरूप वाला है। इसके धारण करने से श्री और आरोग्य की प्राप्ति होती है। प्राणी वेदशास्त्र क ज्ञाता, सबका प्रिय और दूसरों को आकर्षित करने वाला होता है। उसे आंखों में तेज और वाणी में मिठास का गुण मिलता है।
चतुर्मुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन विधिपूर्वक प्रात: स्नान के बाद ऊॅँ वां क्रां त्तां ह्रां ह्रं ……………………. मंत्र का जपन करके धारण करना चाहिए। साथ ही प्रतिदिन एक बार यह मंत्र आवश्य जप करें।

पंचमुखी रुद्राक्ष
पंचमुखी रुद्राक्ष रुद्र कालाग्नि नाम से प्रसिद्ध हैं। यह सबसे अधिक शुभ और पुण्यदाता माना गया है। इसके धारण स्वरूप यश, वैभव, सम्पन्नता, सुख-शांति और प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है।
पंचमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात:काल यथाविधि स्नानादि के बाद ऊॅँ ह्रां क्रां वां ह्रां…… या ऊॅँ ह्रीं नम:….. मंत्र का जप करते हुए काले धागे में गूंथकर यथाविधि धारण करना चाहिए।

षट्मुखी रुद्राक्ष
षट्मुखी रुद्राक्ष के देवता कार्तिकेय हैं। इसे धारण करने वाला प्राणी शुभ लक्षणों से युक्त, सद्गुणी व ध्ौर्यवान होता है। धारक पर माता पार्वती की विश्ोष कृपा दृष्टि रहती है।
षट्मुखी रुद्राक्ष को सोमवा के दिन प्रात:काल यथाविधि स्नानादि के बाद ऊॅँ ह्रीं श्रीं क्लीं सौं एें………….. मंत्र का जप करके काले धागे में गूंथकर पहनें।

सप्तमुखी रुद्राक्ष
सप्तमुखी रुद्राक्ष का नाम अनन्त है। सूर्य और सप्तऋषि इसके देवता हैं। इस रुद्राक्षधारी को विष बाधा नहीं सताती है। इसे पहनने से महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है। सभी पाप व शोक नष्ट होकर सुख- शांति मिलती है।
सप्तमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन स्नानादि के बाद काले धागे में गूंथकर धारण करें। प्रतिविधि पूर्वक ध्यान करके ऊॅँ हुं नम:………………..मंत्र का पाठ करें।

अष्टमुखी रुद्राक्ष
अष्टमुखी रुद्राक्ष को गण्ोश जी का प्रत्यक्ष अवतार माना गया है। इसकी देवियां आठ माताएं हैं। इसे धारण करने वाले प्राणी को जीवन भर अपयश नहीं मिलता है। यह आठों वसु और गंगा को प्रसन्न करने वाला है।
अष्टमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात:काल स्नान के बाद यथाविधि ऊॅँ ह्रां ग्रीं लं आं श्रीं………..मंत्र का जप करके पहने या ऊॅँ ह्रुं नम:………… मंत्र का पाठ करने के बाद काले धागे में गूंथकर धारण करें।

नवमुखी रुद्राक्ष
नवमुखी रुद्राक्ष के देवता भ्ौरव और यमराज हैं। इस रुद्राक्ष को धारण करने वाला व्यक्ति शिव को अत्यन्त प्रिय होने के कारण स्वर्ग में इंद्र के समान पूजनीय होता है। इसे बाई भुजा में पहनने से बल की प्राप्ति होती है। मृत्युलोक में धन, सम्पत्ति और ऐश्वर्य की कमी नहीं रहती है। यमराज का भय नहीं रहता है।
सोमवार के दि प्रात: स्नानादि के बाद भगवान शंकर का चित्र सम्मुख रखकर यथाविधि पूजन करें। फिर नवमुखी रुद्राक्ष को काले धागे में लपेटकर गले में पहन लें। इसे धारण करने से पूर्व ऊॅँ ह्रीं वं यं रं लं……………मंत्र का जप करना चाहिए।

द्बादशमुखी रुद्राक्ष
द्बादशमुखी रुद्राक्ष की स्वामी दसों दिशाएं हैं। इसे साक्षात् जनार्दन विष्णु भगवान का रूप माना जाता है। यह रुद्राक्ष अत्यन्त शंक्तिशाली होता है। इसे धारण करने ाले प्राणी को सर्पादि का भय नहीं होता है। भूत-प्रेत और ब्रह्मराक्षस की बाधाएं शांत होती है। दसों दिशाओं में प्रीति बढ़ती है। साथ् ही प्राणी के सर्वग्रह शांत होते हैं।
दशमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात: स्नानादि से निवृत्ति होकर भगवान के सम्मुख यथाविधि पूजन करके काले धागे में बांध कर पहनना चाहिए। इसे धारण करने से पूर्व ऊॅँ श्रीं ह्रीं क्लीं व्रीं ऊॅँ ……………….मंत्र का जप करना चाहिए।

एकादशमुखी रुद्राक्ष
एकादशमुखी रुद्राक्ष रुद्र स्वरूप माना गया है। इंद्र भी इसके स्वामी हैं। इसे धारण करने से हजारों गोदान का पुण्यफल प्राप्त होता है, जो चंद्रग्रहण में किए गए दान और वाजपेय यज्ञ से भी कई गुणा अधिक होता है। इससे यश, वैभव और चारों ओर अपार प्रसिद्धि मिलती है।
एकादशमुखी रुद्राक्ष को धारण रकने के लिए सोमवार को प्रात: स्नानादि करें। फिर परमेश्वर का ध्यान करके अनन्य भाव से रुद्राक्ष को नमस्कार कर काले धांगे में गूंथकर गले में धारण करें। धारण करने से पूर्व ऊॅँ रुं मूं अौं……………….मंत्र का जप करें।

द्बादशमुखी रुद्राक्ष
द्बादशमुखी रुद्राक्ष आदित्य स्वरूप तेजस्वी महाविष्णु का कारक है। इसे धारण करने वाला प्राणी राजा बनने के योग्य होता है। चोर, अग्नि, दरिद्र्य और व्याधियों से मुक्ति मिलती है। धन-पुत्रादि की प्राप्ति होती है।
सोमवार के दिन प्रात: काल सूर्योदय होते ही सूर्य की किरणों को हाथ में लेकर द्बादशमुखी रुद्राक्ष को स्नान कराएं और नारायण को नमस्कार करें। तदन्तर इसे भगवान के समीप रख्ों। फिर काले धागे में गूंथकर विधिपूर्वक ऊॅँ ह्री क्षौ घृणि: श्रीं…….. मंत्रोच्चारण के साथ गले में धारण करें।

त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष
त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष के देवता कामदेव हैं। इसे इंद्र की संज्ञा दी गई है। यह काम व रस-रसायन की सिद्धि प्रदान करने वाला और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष को सोमवार के दिन प्रात:काल यथाविधि स्नानादि के बाद भगवान के सम्मुख रख्ों और ऊॅँ ईं यां आप अौं……………मंत्र का पाठ करके काले धागे में गूंथकर गले में पहने।

चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष
चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष रुद्र के नेत्र से प्रकट हुआ है। इसे हनुमान जी का स्वरूप भी मानते हैं। बलशाली हनुमान का प्रतीक होने से यह रुद्राक्ष भूत-पिचात और अन्य संकटों से रक्षा करके बल और साहस प्रदान करता है।
सोमवार के दिन प्रात:काल यथाविधि स्नानादि करें। फिर भगवान के समक्ष आसन, विद्या और चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष रखकर नमस्कार करके विधिपूर्वक पूजन करें। अंत में काले धागे में गूंथकर ऊॅँ हं स्फ्रें खण्फ्रैं हस्त्रौं हसण्फ्रैं …………. मंत्र का जप करके गले में धारण करें।

गौरी शंकर रुद्राक्ष

गौरी शंकर रुद्राक्ष अपने प्राकृतिक स्वभाव से ही वृक्ष से जुड़ा हुआ उत्पन्न होता है। गौरी शंकर रुद्राक्ष को भी शिव शक्ति के तुल्य अपार शक्तिवाला और शवि शक्ति स्वरूप ही माना गया है। इसलिए इस रुद्राक्ष को धारण करने से शिव व शक्ति दोनों ही प्रसन्न होते हैं। इसे घर में रखकर विधिवत पूजा करने से मोक्ष देने वाला व खजाने में रखने से खजाना बढ़ाने वाला होता है। इससे एक मुखी रुद्राक्ष से होने वाले सभी फल प्राप्त होते हैं। इसके दर्शन मात्र से सभी प्रकार का आनंद व सुख मिलता है। इसे भी लाल या पीले धागे में पिरोकर सोमवार के दिन स्नानादि के निवृत्त होकर शिवलिंग और माता पार्वती के चरणों से स्पर्श करके शिव शक्ति रुद्राक्षय नम:……………….. मंत्र का जप करते हुए हृदय तक धारण करना चाहिए। इसे एक मुखी रुद्राक्ष  के अभाव में धारण किया जाता है।

 

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