क्या है पतंजलि का आष्टांग योग,बीस से अधिक उपनिषदों में भी योग का उल्लेख

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जकल अधिसंख्य लोग योग को शारीरिक क्रियाभर समझते हैं, लेकिन योग मात्र शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा-सीधा सम्बन्ध हिंदू यानी वैदिक यानी सनातन धर्म से है। वैदिक परम्परा में आत्म तत्व को जागृत करने को महिमा मंडित किया गया है और योग हमे न सिर्फ शारीरिक विकारों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि यह जीवन को सही तरह से जीने का विज्ञान है। योग के माध्यम से हम भौेतिक, मानसिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक व आत्मिक रूप से सशक्त होते हैं। योग का शाब्दिक अर्थ है जुड़ना। इस शब्द का मूल संस्कृत भाषा में युज, जिसका अर्थ हुआ जुड़ना। वैसे सीध्ो शब्दों में कहें तो योग शब्द को दो अर्थों में लिया जाता हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है- जोड़ और दूसरा अर्थ है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुंचना कठिन ही नहीं, असंभव होता है। योग में आध्यत्मिक चेतना जागृत होती है। आध्यात्मिक चेतना से जुड़ने का अर्थ है कि सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का संगम होना अर्थात एक रूप होना।

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व्यवहारिक रूप से योग मन, शरीर व भावनाओं को संतुलित करने और तालमेल बनाने का काम करता है। योग साधना की प्राप्ति आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध, षट्कर्म और ध्यान के निरंतर अभ्यास के माध्यम से प्राप्त होती है। योग साधना का पहला प्रभाव हमारे वाह्य शरीर पर दिखता है। शुरुआती चरण में साधक को थोड़ी बहुत परेशानी महसूस हो सकती है, लेकिन साधना क्रम से करते रहने पर यह परेशानी दूर हो जाती है। साधना के एक बात का विश्ोष ध्यान रखना चाहिए कि शरीर के साथ साधक का जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए, जितना वह शुरुआती चरण में सहज भाव से कर सके, उससे उतना ही करना चाहिए। वाह्य प्रभाव के बाद योग का असर होना शुरू होता है मानसिक व भावनात्मक स्तर पर। जैसे-जैसे क्रम से साधना बढ़ती है, इसका प्रभाव भी बढ़ता जाता है। बस जरूरत होती है, निरंतरता बनी रहने की। कोई ये समझे कि योग करने से आजकल के जीवन का तनाव समाप्त हो जाएगा, तो यह गलत होगा, लेकिन योग से मानसिक शक्ति साधक की इतनी प्रबल हो जाती है कि वह तनाव का प्रभाव समाप्त कर देती है।

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यह मानसिक शक्तियों को प्रबल करने की एक सिद्ध विधि है। योग साधना के शिखर में पहुंचे ऋषि-मुनि अपने आत्म बल को इतना प्रबल कर लेते थ्ो कि किसी भी बाह्य क्रिया का उन पर कोई असर नहीं होता था और वे साधना में वर्षों लीन रहते थ्ो। योग में सबसे ज्यादा जरूरी यह होता है कि साधक अपने श्वास को लयबद्ध करे।

योग का फायदा तभी होता है, जब साधक इन नियमों का पालन करेे:-

1- साधना की सबसे पहली शर्त यह है कि किसी विद्बान गुरु के सानिध्य में साधना करे और साधना के दौरान ढीले वस्त्र धारण करे, ताकि साधना में उसे असुविधा न हो, क्योंकि साधना के दौरान मांसपेशियों में खिचाव होता है, ऐसे में यदि स्किन टाइट वस्त्र होंगे तो साधना कर पाना सम्भव नहीं हो सकेगा।
2- योग करने से पहले स्नान जरूर कर लेना चाहिए। स्नान करके स्वयं को पवित्र करें, फिर साधना करें तो निश्चित तौर पर आपको पूर्ण फल की प्राप्ति होगी।
3- सूर्यादय या फिर सूर्यास्त के समय साधना करना श्रेयस्कर होता है।
4- साधना खाली पेट करनी चाहिए और साधना के तत्काल बाद भी कुछ नहीं खाना चाहिए। साधना के समाप्त होने के कम से कम आध्ो घंटे बाद साधक कुछ खा सकता है। यह भी स्मरण रहे कि साधना से दो घंटे पहले कुछ नहीं खाना चाहिए।
5- किसी शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठकर योग साधना करें और साधना के दौरान तन के साथ मन कीपवित्रता का विश्ोष ध्यान रखना चाहिए। साधना के दौरान शांति चित्त से पूरा ध्यान योगाभ्यास पर केंद्रित रखना चाहिए।

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6-योगाभ्यास में ध्ौर्य और दृढता रख्ों। साधना के दौरान शरीर के साथ किसी भी तरह की जबरदस्ती नहीं करें, जितना सहजता से कर पा रहे है, उतना ही करें। निरंतर करते हुए धीरे-धीरे बढ़ाते जाए।
7- योगाभ्यास के अंत में शवासन जरूर करें।
अंत में एक बात कहना उचित प्रतीत हो रहा है कि यदि साधक को कोई शारीरिक परेशानी होती है, तत्काल योग गुरु व चिकित्सक से सम्पर्क करे। स्वास्थ लाभ लेने के बाद ही योगाभ्यास शुरू करे।

सही ढंग से किया तो योग के फायदे ही फायदे:-

 

योग मानसिक व शारीरिक शक्तियों को बढ़ाने वाला है, इससे शारीरिक विकार भी मिटते हैं। बीमारियों पर रोकथाम लग जाती है, जो साधक नियमित योग क्रिया करता है, वह सदैव स्वस्थ रहता हैं। योग से अस्थमा, मधुमेह, गठिया, रक्तचाप, पाचन विकास आदि पर नियंत्रण का सहज उपाय है। योग चिकित्सा तंत्रिका और अत:स्रावी तंत्र में बनाए गए संतुलन के कारण सफल होता है। योग यदि निरंतर किया जाए तो साधक की मानसिक शक्तियां बढ़ती हैं।

श्वास की तकनीक ही प्राणायाम और ध्यान

वास्तव में देखा जाए तो सांस का नियंत्रण और विस्तार करना ही प्राणायाम होता है। सांस लेने की उचित तकनीकों का अभ्यास रक्त और मस्तिष्क को अधिक ऑक्सीजन देने के लिए होता है, अंत: प्राण या महत्वपूर्ण जीवन ऊर्जा को नियंत्रित करने में मदद करता है ।

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प्राणायाम भी विभिन्न योग आसन के साथ- साथ चलता जाता है। योग आसन और प्राणायाम का संयोग शरीर और मन के लिए, शुद्धि और आत्म अनुशासन का उच्चतम रूप माना गया है। प्राणायाम तकनीक हमें ध्यान का एक गहरा अनुभव प्राप्त करने के लिए भी तैयार करती हैं।

जाने क्या है पतंजलि का आष्टांग योग

पतंजलि ने ईश्वर तक, सत्य तक, स्वयं तक, मोक्ष तक या कहो कि पूर्ण स्वास्थ्य तक पहुंचने के आठ स्तर निर्मित किए हैं। पहल कर पहले स्तर को पार करोंगे तो दूसरे स्तर पर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं होगी, बशर्ते योग को लेकर निरंतरता बनी रहनी चाहिए। इतना जान लीजिए कि योग उस परम शक्ति की ओर क्रमश: बढ़ने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। यदि आप इस प्रक्रिया को अपना कर आगे बढ़ें तो निश्चित तौर पर जीवन के लक्ष्य मोक्ष तक पहुंच ही जाएंगे।

योग एक बहुत ही बृहद विषय है, यदि सक्ष्ोप में कहना मुश्किल है। वैसे आप ज्ञानयोग, भक्तियोग, धर्मयोग और कर्मयोग के बारे थोड़ा बहुत तो जानते ही होंगे। इन सभी में योग शब्द प्रयुक्त हुआ है। इसके इतर हठयोग के बारे में भी आपकों थोड़ी बहुत जानकारी तो जरूर होगी। इन सब को छोड़कर एक राजयोग हैं। यहीं पतंजलि का योग है। इसी योग का सर्वाधिक प्रचलन और महत्व है। यहीं आष्टांग योग भी हैं। आष्टांग योग अर्थात योग के आठ अंग। दरअसल पतंजललि ने योग की समस्त विद्याओं को आठ अंगों में श्रेणीबद्ध कर दिया था। अब इनसे बाहर कुछ भी नहीं है।
यह आठ अंग हैं- (1) यम (2) नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) धारणा (7) ध्यान (8) समाधि। उक्त आठ अंगों के अपने-अपने उप अंग भी हैं। वर्तमान में योग के तीन ही अंग प्रचलन में हैं- आसन, प्राणायाम और ध्यान।

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यदि ईश्वर को जानना है, सत्य को जानना है, सिद्धियां प्राप्त करनी हैं या फिर स्वस्थ रहना है, तो पतंजलि यह कहते हैं कि शुरुआत शरीर के तल से ही करना होगी। शरीर को बदलो मन बदलेगा। मन बदलेगा तो बुद्धि बदलेगी। बुद्धि बदलेगी तो आत्मा स्वत: ही स्वस्थ हो जाएगी। आत्मा तो स्वस्थ है ही। एक स्वस्थ आत्मचित्त ही समाधि को उपलब्ध हो सकता है।
शुरुआती पांच अंगों से योग विद्या में प्रविष्ठ होने की तैयारी होती है,यानी समुद्र में छलांग लगाकर भवसागर पार करने के पूर्व तैराकी का अभ्यास होता है। यह इन पांच अंगों में सिमटा है। इन्हें किए बगैर भवसागर पार नहीं कर सकते हैं और जो इन्हें करके छलांग नहीं लगाएंगे, तो यहीं रह जाएंगे। बहुत से लोग इन पांचों में महारत हासिल करके दूसरों को योग का चमत्कार बताने में में अपना जीवन नष्ट कर देते हैं।

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जिनके मस्तिष्क में हमेशा ही द्बंद्ब रहता है, वह चिता, भय और संशय में ही जीते हैं। उन्हें जीवन एक संघर्ष ही नजर आता है, आनंद नहीं प्राप्त होता है। योग इन सभी प्रकार की चित्तवृत्तियों का निरोध करता है-

योग का सूत्र है- योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।

चित्त अर्थात बुद्धि, अहंकार और मन नामक वृत्ति के क्रियाकलापों से बनने वाला अंत:करण। चाहें तो इसे अचेतन मन कह सकते हैं, लेकिन यह अंत:करण इससे भी सूक्ष्म माना गया है।
दुनिया के सारे धर्म इस चित्त पर ही कब्जा करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने तरह-तरह के नियम, क्रिया कांड, ग्रह-नक्षत्र और ईश्वर के प्रति भय को उत्पन्न कर लोगों को अपने-अपने धर्म से जकड़े रखा है। पतंजली कहते यह भी कहते हैं कि इस चित्त को ही खत्म करो। योग विश्वास करना नहीं सिखाता और न ही संदेह करना। और विश्वास तथा संदेह के बीच की अवस्था संशय के तो योग बहुत ही खिलाफ है। योग कहता है कि आप में जानने की क्षमता है, इसका भरपूर उपयोग करो। आपकी आंखें हैं। इससे और भी कुछ देखा जा सकता है, जो सामान्य तौर पर दिखता नहीं। आपके कान हैं, इनसे वह भी सुना जा सकता है जिसे अनाहत कहते हैं। अनाहत अर्थात वैसी ध्वनि, जो किसी संघात से नहीं जन्मी हो, जिसे ज्ञानीजन ओम कहते हैं, वहीं ओंकार है। अत: साधक सबसे पहले अपनी इंद्रियों को बलिष्ठ बनाएं। शरीर को लचीला बनाओं और इस मन को स्वयं का गुलाम बनाओ तो यह सब कुछ करना बहुत सहज हो जाएगा। योग का अंतिम लक्ष्य आत्म चेतन का जागृत करना भी साधक को प्राप्त हो जाएगा। जब आत्म तत्व यानी आत्म चेतना जागृत होती है तो परमसत्ता यानी परमात्मा से जीवात्मा का संगम हो जाता है।

शिव संहिता में चार योग का वर्णन, बीस से अधिक उपनिषदों में भी योग का उल्लेख –

योग की प्रमाणिक पुस्तक गोरक्षशतक व शिव संहिता में योग चार प्रकार के वर्णन मिलते
हैं। यह इस प्रकार है- मंत्र योग, हठ योग, लय योग व राज योग।

प्राचीनतम उपनिषद, बृहदअरण्यक में भी, योग का हिस्सा बन चुके, विभिन्न शारीरिक अभ्यासों का उल्लेख मिलता है। छांदोग्य उपनिषद में प्रत्याहार का तो बृहदअरण्यक के एक स्तवन (वेद मंत्र) में प्राणायाम के अभ्यास का उल्लेख मिलता है।
बीस से भी अधिक उपनिषद और योग वशिष्ठ उपलब्ध हैं, जिनमें महाभारत और भगवद गीता से भी पहले ही, योग के बारे में, सर्वोच्च चेतना के साथ मन का मिलन होना कहा गया है।

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हिदू दर्शन के प्राचीन मूलभूत सूत्र के रूप में योग की चर्चा की गई है और शायद सबसे अलंकृत पतंजलि योगसूत्र में इसका उल्लेख किया गया है। अपने दूसरे सूत्र में पतंजलि, योग को कुछ इस रूप में परिभाषित करते हैं:

’’ योग: चित्त-वृत्ति निरोध: ’’- योग सूत्र 1.2

पतंजलि का लेखन भी अष्टांग योग के लिए आधार बन गया। जैन धर्म की पांच प्रतिज्ञा और बौद्ध धर्म के योगाचार की जडें पतंजलि योगसूत्र में निहित हैं।

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