माता वैष्णो देवी की रहस्य गाथा और राम, स्तुति मंत्र

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माता वैष्णो देवी की महिमा का बखान मनुष्य मात्र के लिए संभव नहीं है।उनकी महिमा अपरंपार है, जो भक्त अपनी मन्नते लेकर वैष्णो देवी के दरबार में पहुंचते हैं।भक्त वत्सला वैष्णो अपने भक्तों को पुत्रवत स्नेह करती हैं और मुरादें पूरी करती हैं। कोई भी भक्त मां के दरबार में पहुंचने के बाद निराश नहीं लौटा है। माता वैष्णो देवी त्रिकुट पर्वत पर महाकाली महालक्ष्मी और महासरस्वती की तीन पिंडियों के रूप में विराजमान है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु दर्शन हेतु कठिन चढ़ाई चढ़ कर आते हैं।

माता वैष्णो देवी की गाथा 

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एक समय में पृथ्वी पर अनेकों बार असुरों के अत्याचार हुए और उनके अत्याचारों का के बोझ से जब पृथ्वी धसने लगी, तब महाशक्तियों के रूप में देवी भगवती अवतरित हुई है तथा दुष्टों का संहार करके पृथ्वी को भार मुक्त किया। एक बार महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती ने त्रेतायुग में दैत्यों के अत्याचार का नाश करने के लिए और संत जनों की रक्षा के लिए अपने सम्मितल तेज से एक दिव्य शक्ति को उत्पन्न करने का निश्चय किया। उनके नेत्रों से निकली दिव्य ज्योति से उसी समय एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। उसके हाथ में त्रिशूल था और सिंह पर सवार थी। उस कन्या ने तीनों महाशक्तियों की ओर देखकर कहा- हे महाशक्तियों! आपने मुझे क्यों उत्पन्न किया? मेरी उत्पत्ति का क्या प्रयोजन है। कृपा करके बतलाएं।

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तब तीनो महादेवी ने कहा- हे कन्या! धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए हमने तुम्हें उत्पन्न किया अब तुम्हारी आज्ञा मानकर दक्षिण भारत में रत्नाकर सागर के घर पुत्री के रूप में जन्म लो। वहां तुम भगवान विष्णु के अंश से उत्पन्न होओगी और आत्म प्रेरणा से धर्म हित का कार्य करोगी। महादेवियों की आज्ञा शिरोधार्य कर वह दिव्य कन्या उसी क्षण प्रस्थान करके रत्नाकर सागर के घर गई और उनकी पुत्री के रूप में रत्नाकर सागर की स्त्री के गर्भ में स्थित हो गई। समयानुसार कन्या की उत्पत्ति हुई। उस कन्या का मुख मंडल सूर्य के समान अनुपम आभा से अलौकिक हो रहा था। रत्नाकर सागर ने कन्या का नाम त्रिकुटा रखा। थोड़े ही दिनों में त्रिकुटा ने अपनी दिव्य शक्तियों से ऋषि-मुनियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया अर्थात ऋषि जन उसे दिव्य अवतार देवी मानने लगे। इसी तरह कुछ और दिन भी जाने के बाद त्रिकुटा ने अपनी माता और पिता से आज्ञा प्राप्त कर तप करने हेतु समुद्र तट पर चली गई, वहां गेरुआ वस्त्र धारण करके छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगी, उन्हीं दिनों पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी की स्त्री सीता का हरण करके रावण ले गया।

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सीता की खोज करते हुए एक दिन प्रभु श्री रामचंद्र अपनी वानर सेना सहित पधारें और उस दिव्य कन्या को तब करते हुए देख कर बोले हे सुंदरी! वह कौन सा कारण है अथवा तुम किस प्रयोजन सिद्धि के लिए तप कर रही हो। श्री राम जी के पूछने पर त्रिकुटा ने अपने नेत्र खोलकर देखा वनवासी वेशधारी प्रभु श्री रामचंद्र जी अपने अनुज लक्ष्मण एवं वानरी सेना सहित खड़े हैं। उन्हें देखकर उसके हर्ष की सीमा ना रही| वह प्रसन्न होकर प्रभु को प्रणाम करने के बाद विनीत भाव से बोली कि आपको पति रूप में प्राप्त करने का निश्चय ही मेरी तपस्या का कारण है, अतः मुझे स्वीकार करके मेरी तपस्या का फल प्रदान करने की कृपा करें। तब भगवान श्री रामचंद्र जी ने कहा- हे सुमुखी! इस अवतार में मैंने पतिव्रत होने का निश्चय किया है अतः इस जन्म में तुम्हारी अभिलाषा नहीं पूर्ण कर सकता हूं, मुझे प्राप्त करने के उद्देश्य से तुमने कठिन तपस्या की है, इसलिए तुम्हें यह वचन देता हूं कि सीता सहित लंका से लौटते समय मैं तुम्हारे सामने भेस बदल कर आऊंगा, यदि उस समय तुमने मुझे पहचान लिया तो मैं तुम्हें ग्रहण कर लूंगा, उसके बाद प्रभु श्री रामचंद्र जी अपनी सेना सहित लंका की ओर प्रस्थान कर गए। लंका में रावण से उनका घरघोर संग्राम हुआ और अंत में रावण की संपूर्ण राक्षसी सेना मारी गई और अंत में प्रभु श्री रामचंद्र जी के तीक्ष्ण वाणों से रावण भी मृत्यु को प्राप्त हुआ। बाद में  संसार में अपनी लीला प्रकट करने के लिए  सीता की अग्नि परीक्षा ली उसके बाद पुष्पक विमान में सवार होकर जब अयोध्या लौटने लगे तो एक स्थान पर विमान रोक का लक्ष्मण और सीता से बोले- तुम यहीं ठहरो, मैं और हनुमान थोड़ी देर में आते हैं। उसके बाद श्री राम जी ने एक वृद्ध साधु का रूप धारण किया और त्रिकुटाके सम्मुख जा पहुंचे त्रिकुटा उन्हें पहचान ना सकी, तब भगवान अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उसे दर्शन देकर बोले कि कन्या! पूर्व कथानुसार तुम परीक्षा में असफल रही, अतः अब तुम यहां कुछ काल तक तप करो, कलयुग में जब मेरा कल्कि अवतार होगा तब तुम मेरी सहचरी बनोगी। उस समय उत्तर भारत में माणिक पर्वत पर तीन शिखरों वाले त्रिकूट पर्वत की मनोरम गुफा में जहां तीन महाशक्तियों का निवास है, वहां पर तुम भी अमर हो जाओगी। तप करो, महाबली हनुमान जी तुम्हारे प्रहरी होंगे तथा संपूर्ण भू-मंडल पर तुम्हारी  पूजा होगी और वैष्णो देवी के नाम से तुम्हारी महिमा जगह विख्यात होगी।
माना जाता है कि त्रेता युग से ही माता वैष्णो देवी सुंदर गुफा में विराजमान हैं, जो तीन महादेवियो के दिव्य तेज से प्रकट होकर सांसारिक प्राणियों को अपने आशीर्वाद और कृपा प्रसाद से निरंतर उनकी झोलिया भरती आ रही हैं। युग परिवर्तन होने के साथ-साथ देवी ने अपनी अनेक लीलाएं भूमंडल पर की है । उनकी लीलाओं से अनेक कथाओं का जन्म हुआ। देवी की जो कथा जिस स्थान पर जिस रूप में प्रचारित हुई, उस स्थान पर उसी रूप में पूजी जाने लगी। कलयुग में वैष्णो माता की लीला के आधार पर जो कथा प्रकट हुई वह इस प्रकार है-
कटरा से दो किलोमीटर के अंतराल पर भंसाली नामक एक गांव है, जहां लगभग 600 वर्ष पूर्व एक श्रीधर नामक ब्राह्मण हुए जो माता के परम भक्त थे। वह अपना ज्यादातर समय माता की भक्ति में व्यतीत करते थे| माता के भक्ति में उन्हें अपार प्रसन्नता होती थी, किंतु दुर्भाग्यवश श्रीधर संतानहीन थे। नव कुंवारी कन्याओं का पूजन माता की सबसे उत्तम पूजा कही गई है, अतः उन्होंने ग्राम निवासियों की कन्याओं को पूजन के लिए अपने घर बुलाया।
उस गांव के निकट भैरवनाथ नाम का एक और औघड़पंथी साधु रहता था जो माता वैष्णो देवी का कट्टर विरोधी था, ग्राम वासियों सेव वह अपनी पूजा करवाना चाहता था। उस महान सिद्ध साधु ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा की श्रीधर नौ कन्याओं का पूजन करने जा रहा है,तब उसने अपने मन में विचार किया कि कन्याओं का पूजन कार्य यदि श्रीधर ने निर्विघ्नं पूर्ण कर लिया तो निश्चय है कि मेरी पूजा कोई नहीं करेगा, क्योंकि कन्याओं के पूजन से पुण्य फल प्राप्त होता है, उसने उसी क्षण अपने एक शिष्य को बुलाकर आदेश दिया कि जाकर श्रीधर का पूजन कार्य खंडित कर दो। भैरवनाथ के शिष्य ने उसी समय वहां पहुंचकर श्रीधर की पत्नी के द्वारा बनाए गए भोजन को मायावी शक्ति से विषयला कर दिया, जिसे खाते ही वह कन्याएं रोने चिल्लाने लगी और श्रीधर के घर से भागकर अपने घर की ओर जाने लगी। कुछ कन्या अब इसके प्रभाव से उसी स्थान पर गिरकर अचेत हो गई तो कुछ अपने अपने घरों तक पहुंच कर यह दृश्य देखकर भक्त श्रीधर तथा उसकी पत्नी की आंखों में आंसू आ गए। उधर भैरवनाथ के शिष्य ने गांव में घूम-घूमकर प्रचारित करना आरंभ किया कि देखो -देखो गांव वालों! अपनी खुली आंखों से श्रीधर की करनी देखो। इसने पूजन के लिए जिन कन्याओं को अपने घर आमंत्रित किया था उन कन्याओं को भोजन में विषला कर दिया और खुद को देवी का पुजारी कहता फिरता है। कैसा है यह पुजारी और इसकी देवी।
इसी तरह वह देवी के भक्त श्रीधर का दुष्प्रचार करने लगा जिसे सुनकर गांव वाले क्रोधित भी हुए देवी को महिमा हीन सिद्ध करना ही भैरवनाथ का प्रमुख उद्देश्य था। दूसरी और पूजा अपूर्ण रह जाने के कारण पंडित श्रीधर अत्यंत दुखी मन से अपने घर में स्थापित माता की मूर्ति के सम्मुख जाकर गिर पड़े और रो-रो कर कहने लगे- हे माता! मैंने सदैव सच्चे मन से आपकी पूजा की है फिर आज मेरे साथ यह कैसा अन्याय हो रहा है। मां! मैंने भोजन में विष नहीं मिला या फिर भोजन बिषयुक्त कैसे हो गया? इस प्रकार मां के चरणों में सिर रख कर रोने लगे। उनका विलाप सुनकर महाबली हनुमान ने कहा कि हे माता! भक्त श्रीधर अत्यधिक दुख से पीड़ित हो रहे हैं, उस पर दया करो मां, उस पर दया करो। तब माता वैष्णव देवी जी ने कहा हे महाबली! तुम सत्य कहते हो भक्त श्रीधर के दुखों का निवारण करने का समय निकट आ चुका है। यह कहकर देवी भगवती उसी क्षण कन्या का रूप धारण करके श्रीधर के घर गई और बाहर भाग में खड़ी होकर अन्य देवियों का आह्वान करने लगी- आओ नैना देवी, बहन ज्वाला जी, हे बहन चिंतपूर्णी आओ, बृजेश्वरी देवी, आओ मनसा देवी, तुम भी आओ बहन कालिका देवी, हे चामुंडा बहन शीघ्र आओ, आओ शाकुंभरी बहन। इस तरह वैष्णो देवी के बुलाने पर अन्य देवियां उसी क्षण उपस्थित हुई और बोली है बहन! तुमने हम सभी देवियों को किस लिए बुलाया, तब वैष्णो देवी ने कहा हे देवियों! भक्त श्रीधर की पूजा पूर्ण करने हेतु मैंने तुम्हें बुलाया। उसी क्षण सभी देवियों ने कन्या का रूप धारण किया और श्रीधर की स्त्री के सम्मुख जाकर कहने लगी। हे माता! हम नव कन्याये आपका पूजन पूर्ण कराने के लिए आई हैं। यह सुनते ही श्रीधर की स्त्री बहुत प्रसन्न हुई और घर के अंदर जाकर अपने पति से बोली जो देवी जी की मूर्ति के सम्मुख सिर झुकाए निराश भाव से बैठे थे, वह कहने लगी- हे स्वामी! देखो तो सही, बाहर कौन आया है!
कौन आया है?
उनके पूछते ही वह नौ कन्याओं के रूप में बाहर खड़ी देवियां अंदर आ गई और श्रीधर से बोली- हम आए हैं! आपका पूजन पूर्ण करने। श्रीधर के प्रश्न का उत्तर स्वयं वैष्णो देवी ने मुस्कुरा कर दिया। उनके मुखमंडल पर विद्यमान अद्भुत तेज को देखकर श्रीधर के आश्चर्य कीसीमा न रही। उन्होंने उस गांव में इन कन्याओं को कभी नहीं देखा था, अतः आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला- हे माताओं! मैंने आप लोगों को पहले कभी इस गांव में नहीं देखा।

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माताओं!..आप माताओं किसे कह रहे हैं? यह कह कर कन्या रूपी वैष्णो देवी हंसने लगी| उनके साथ अन्य दिव्य भी हंसने लगी। तब श्रीधर ने कहा-
आप लोग हंस क्यों रही हैं? श्रीधर ने पूछा।
हम सभी के हंसने का कारण यह है कि तुम, हमें माताओं कहकर संबोधित कर रहे हो जबकि हम सभी कन्याएं आपकी पुत्री के समान हैं।
आप ठीक कह रही हैं। वैष्णो देवी के दिव्य मुख्य मंडल की ओर देखकर श्रीधर ने कहा- किंतु आप लोग हमारी पूजा संपन्न कराने के उद्देश्य से मेरे घर पधारी हैं, इसलिए आप लोग देवी भगवती के समान हैं और देवी भगवती जगत माता है जिस कारण मैं आपको माता कह रहा हूं।
श्रीधर की वाणी सुनकर श्री वैष्णो देवी जी मन ही मन उनकी भक्ति भावना से अति प्रसन्न हुई किंतु प्रत्यक्ष रुप से कुछ ना बोली। तत्पश्चात श्रीधर ने उन्हें भक्ति एवं प्रेम सहित अंदर ले जाकर स्वच्छ आसन पर बिठाया, उसके बाद बारी-बारी उनके पैरों को धोकर साफ नवीन (नए) वस्त्र से पोछा फिर महावर लगाया, सभी देवियों के सिर पर चुनरी ओढ़या।
उस समय श्रीधर के कार्य को देखकर वैष्णव जी बाल सुलभ (बच्चों की तरह) व्यवहार करती हुई अन्य देवियों की ओर देख कर मुस्कुराने लगी किंतु श्रीधर पर कोई प्रभाव ना हुआ, वह पूर्ववत उन कन्याओं को साक्षात देवी मानकर चंदन किया फिर आरती उतारी और भोजन परोसने के बाद स्वयं अपने हाथों से एक ओर खड़े होकर पंखा झलने लगे दूसरी और उनकी स्त्री खड़ी हो गई।
फिर निवेदन करते हुए बोले हे माताओं! भोजन ग्रहण करो। यह सुनकर देवियाँ पुनः हंसने लगी।
जबकि श्रीधर के मुख से बार बार जय माता दी, जय माता दी शब्द का उच्चारण होता था। उन कन्याओं के प्रति उनके मन में अपार श्रद्धा थी। भोजन करने के उपरांत देवियां उठ कर खड़ी हुई तब श्री माता वैष्णो देवी जी ने श्रीधर से कहा है भक्त! हम 9 कन्याएं बहुत दूर दूर से आए हैं। हम इसी प्रकार सदैव एक गांव से दूसरे गांव में विचरण करती हुई देवी के भक्तों की पूजा संपन्न कराती हैं यही हमारा उद्देश्य अब तो मेरी बात ध्यान से सुनो- तुम अपने गांव तथा आसपास के अन्य गांवों में जाकर यह संदेश दे दो कि कल हमारे घर भंडारे का आयोजन है और आप सभी परिवार सहित भंडारे में अवश्य पधारें। भंडारे के समय मैं स्वयं उपस्थित रहूंगी।
और भैरवनाथ को अवश्य निमंत्रित करना। यह कहकर दिव्य कन्या चली गई। उसके जाने के बाद श्रीधर चिंता में डूब गए तथा विचार करने लगे की दिव्य कन्या ने विशाल भंडारे का आयोजन करने को कहा है, कैसे करूंगा विशाल भंडारे का आयोजन। मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है और ना ही लोगों को बैठाने के लिए घर में स्थान है। कैसे होगा यह सब? इस प्रकार विचार करते हुए वे परेशान हो गए, अंत में कन्या की बात को मुख्य रखकर दूसरे दिन प्रातः काल गांव में भंडारे का निमंत्रण देने चल पड़े। उनके स्त्री भी घर घर में जाकर गृहणियों से कहती बहन! आज हमारे घर भंडारा है, भोजन करने के लिए अवश्य आना और हां! बच्चों को अपने साथ जरूर लाना। वह स्त्रियाँ मुंह पर कह देती ठीक है, जरूर आऊंगी किंतु श्रीधर की पत्नी के जाने के बाद कहती हूंह्! चली है भंडारा करने। घर में अन्न का एक टुकड़ा नहीं हैऔर भंडारे का न्योता देने आई थी। चलो ठीक है। आऊंगी तेरे भंडारे में भोजन करने नहीं बल्कि तेरे भंडारे का दृश्य देखने। मैं भी देखूं कैसा होता है तेरा भंडारा। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया और शाम का समय होने लगा। गांव के लोग भंडारे का भोजन करने के लिए आने लगे। ज्यों-ज्यों समय गुजरता जा रहा था आने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। श्रीधर का मन बेचैन होने लगा। उनकी बेचैनी का मुख्य कारण यह था कि लोग हजारों की संख्या में आ रहे थे जिन्हें बैठाने के लिए उसके घर में पर्याप्त स्थान ना था किंतु फिर भी वह जयमाता दी, जय माता दी कह कर उन लोगों का स्वागत कर रहे थे और मन ही मन उस दिव्य कन्या के बारे में भी सोच रहे थे कि वह अभी तक नहीं आई। तब दुखी होकर पंडित श्रीधर पुनः देवी प्रतिमा के सम्मुख जाकर सिर झुकाकर विनय करते हुए कहने लगे हे माता! मैंने दिव्य कन्या का आदेश मानकर भंडारे का आयोजन किया, किंतु वह दिव्य कन्या अभी तक नहीं आई। अब क्या होगा माता। लोगों के बैठाने के लिए मेरे पास स्थान भी नहीं है, वह इस प्रकार विचार कर रहे थे उसी समय हुआ दिव्य करना प्रकट हुई और अभय वर प्रदान करनेवाली मुद्रा में ज्यों ही वह अपना हाथ उठाई। उसके हाथ से दिव्य ज्योति निकली निकली और पल भर में पूरी हलवा मिठाई आदि अनेक प्रकार के व्यंजन तैयार हो गए। इतना ही नहीं श्रीधर का छोटा सा घर देवी की शक्ति से आश्चर्यजनक रूप में इतना बड़ा हो गया कि जितने लोग भी आए सब के बैठने के लिए पर्याप्त स्थान हो गया। उसी समय अपने 360 चेलो के साथ भैरवनाथ का आगमन हुआ। भैरोनाथ के हाथ में त्रिशूल और विशाल आकार का चिमटा था तथा आंखें लाल लाल थी। उसने पहुंचते ही हर हर महादेव का जयकारा किया,जिसके उत्तर में श्रीधर ने हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए कहा जय माता दी
तब भैरवनाथ श्रीधर का उपहास करते हुए कहा अरे नादान! तूने मुझे भंडारे में भोजन के लिए आमंत्रित किया, क्या तुझे मालूम नहीं कि हमें देवराज इंद्र भी भोजन नहीं करा सके।
जय माता दी। श्रीधर ने उच्चारण किया और भैरवनाथ से बोले है योगीराज! मेरी क्या सामर्थ? मैं तो एक तुच्छ प्राणी हूं। मैंने वही किया जो दिव्य कन्या ने आदेश किया था।
कहां है वह देवी कन्या? मैं उसका दर्शन करना चाहता हूं और देखना चाहता हूं कि कौन है और कहां से आई है? उसी समय उस दिव्य करना ने भैरवनाथ को संबोधित करते हुए कहा मैं यहां हूं भैरवनाथ।
कन्या को देखकर योगी भैरवनाथ ने कहा- यही है वह दिव्य कन्या जिस के कहने पर तुमने भंडारे का आयोजन किया।
हां महाराज! श्रीधर ने उत्तर दिया तथा निवेदन करते हुए कहा- अब अपने शिष्यों सहित कुटिया के अंदर पधारें। यह सुनते हुए भैरवनाथ ठठाकर हंसने लगा। उसके साथ चेले भी हंसने लगे। तत्पश्चात अहंकार युक्त वाणी में भैरवनाथ ने कहा- हे श्रीधर! तेरी इस छोटी सीकुटिया में हमारे बैठने के लिए स्थान नहीं है, सो हम अंदर चलकर अपने चेलों सहित कहां बैठेंगे। तब कन्या रूपी देवी ने कहा सब प्रबंध हो जाएगा। यह सुनकर भैरवनाथ अपने चेलों सही श्रीधर की कुटिया में प्रविष्ट हुआ। और उस समय उसे महान आश्चर्य हुआ जब उसके सभी चेले आराम से बैठ गए, फिर भी जगह शेष बची। तब उसने अपने मन में विचार किया कि अवश्य ही यह कन्या कोई शक्ति है। उसकी वास्तविकता जानने के लिए भैरो अपने स्थान से चलकर कन्या के निकट पहुंचा और घूरता हुआ बोला हे कन्या! यहां आए हुए सभी जनों को उनकी इच्छा अनुसार भोजन दिया। क्या तुम मेरी इच्छा की भी पूर्ति करेगी। भैरव के मन की बात जानकर भी देवी ने पूछा तुम्हें क्या चाहिए योगीराज? कन्या के पूछने पर भैरों ने कहा- मैं अघोर पंथी साधु हूं। मांस और मदिरा मेरा प्रिय भोजन है। भैरव के वचन सुनने के उपरांत देवी ने शांत स्वर में कहा हे भैरव! यह एक ब्राह्मण के घर का भंडारा है, यहां ऐसी वस्तु की अपेक्षा करना सर्वथा अनुचित है। मांस और मदिरा का नाम लेना भी पाप है। यह सुनते ही भैरव क्रोधित हो उठा और कन्या का हाथ पकड़ना चाहा, वह कन्या उसे हाथ छुड़ाकर तक्षण अंतर्ध्यान हो गई।
अरे! कहां गई वह कन्या! वह उसे इधर उधर देखने लगा, किंतु वह कहीं ना दिखाई दी तब उसने योगविद्या के बल से देखा। वह अदभुत कन्या पवन रूप होकर त्रिकूट पर्वत की ओर चली जा रही थी। भैरव अपनी योग शक्ति से उस कन्या का पीछा करने लगा। देवी के प्रहरी महाबली भी थे। लांगुर वीर को मार्ग में एक स्थान पर प्यास लगी तब महाशक्ति ने पत्थर में बाण मारकर जल की धारा प्रकट की और अपने वीर की प्यास बुझाई तथा स्वयं अपने केस बाल धोकर सवारी इसलिए वह स्थान बाण गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुआ। केश धोने केकारण लोग बाल गंगा भी कहते हैं। वहां से देवी ने पुनः प्रस्थान किया और कुछ दूर जाने के पश्चात एक स्थान पर रुकी, यह देखने के लिए कि भैरवनाथ अब भी मेरा पीछा कर रहा है या नहीं। जिस पत्थर शिला पर देवी ने पल भर के लिए विश्राम किया उस पत्थर पर  उनके चरण कमलों के चिन्ह अंकित हो गए। वह स्थान बाद में चलकर चरण पादुका के नाम से विख्यात हुआ। वहां से चलकर वैष्णो देवी गर्भजून गुफा के निकट पहुंची और वहां पर निवास करने वाले तपस्वी को दर्शन देकर बोली हे तपोधन! इस गुफा में मैं थोड़ी देर विश्राम करूंगी, यदि कोई आकर मेरे विषय में तुमसे पूछे तो तुम कुछ मत बताना। यह कहकर देवी गुफा में प्रविष्ट हो गई। महाबली हनुमान वही एक वृक्ष की शाखा पर बैठ गए।
उधर कन्या का दर्शन हुए पंडित श्रीधर का दूसरा दिन था, दर्शन ना मिलने के कारण क्षण प्रतिक्षण उनके हृदय की वेदना बढ़ती चली गई। उन्होंने अन्न जल त्याग दिया और देवी की मूर्ति के सम्मुख जाकर बैठ गए। भोजन ना करने से उनकी शक्ति क्षीण होने लगी। कब तक प्राणी कब तक अन्न जल के बिना जीवित रह सकता है। उनकी दशा देखकर उनकी पत्नी भी विह्वल हो गई। उसने बहुत प्रयास किया कि कुछ खा पी लें किंतु देवी का दर्शन करने की हथ ठाने श्रीधर उसी प्रकार अपने निश्चय पर अटल रहे और अंत में अर्ध मूर्छित होकर गिर पड़े। मूर्छित अवस्था में उन्हें ऐसा आभास हुआ जैसे कोई सिर पर हाथ फेर रहा है। कोमल स्पर्श पातें ही श्रीधर ने आंखें खोल दी और देखा साक्षात देवी अष्टभुजी रूप में सिंह पर अरुण होकर सम्मुख खड़ी हैं। उनके हाथों में शंख चक्र, गदा, त्रिशूल, पद्म आदि आयुध शोभायमान हो रहे हैं। गले में रक्त पुष्प की माला। पैरों मैं रक्तिमय में महावर कानों में कुंडल अत्यधिक शोभा पा रहे हैं। अभय वर मुद्रा धारी देवी का साक्षात दर्शन पाकर श्रीधर अपने जीवन को धन्य समझने लगे, तत्पश्चात मैया के चरणों में शीश झुकाकर स्तुति करते हुए कहने लगे हे माता! मैं अज्ञानी और महामूर्ख सांसारिक प्राणी हूं। आपकी पूजा और जप तप करने का मुझे कोई ज्ञान नहीं है। तब देवी ने प्रसन्न होकर कहा है पुत्र! अन्न और जल त्याग कर कभी भजन पूजन नहीं होता। भजन पूजन के लिए केवल सच्ची भक्ति और पूर्ण श्रद्धा की आवश्यकता है। आज मैं तुमसे अत्यंत प्रसन्न हूं। उठो, मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें अपने दिव्य धाम के दर्शन कराती हूं। उस समय मूर्छित श्रीधर के शरीर से उनकी दिव्य काया निकल कर हाथ जोड़े देवी के पीछे पीछे चली। जैसे-जैसे सबकुछ यंत्रवत हो रहा है। तब उन्होंने पर्वत पर चढ़कर एक गुफा के द्वार पर पहुंचे। गुफा का प्रवेशद्वार बहुत छोटा था जिस कारण श्रीधर ने लेटकर गुफा में प्रवेश किया। अंदर पहुंचकर श्रीधर ने माता का दिव्य धाम देखा और बारंबार मैया की स्तुति करते हुए कहने लगे हे माता! तुम धन्य हो और तुम्हारी महिमा धन्य हैं। तुम्हारे दर्शन मात्र से ही मैं धन्य हो गया मां! इस प्रकार विनती करके देवी के चरणों में शीश झुकाकर श्रीधर पंडित गुफा से बाहर निकले और जैसे ही बाहर की तेज रोशनी उन पर पड़ी उनकी निद्रा भंग हो गई और आंखें मलते हुए उठ बैठे। उनके शरीर में किसी प्रकार की कमजोरी ना थी। पहले की तरह पूर्ण रुप से स्वस्थ है। भूख-प्यास भी नहीं थी। वहां उपस्थित उनकी पत्नी और अन्य लोगों ने देखा तो उनके आश्चर्य की सीमा ना रही। आंखे खुलते ही श्रीधर के मुख से जय माता दी, जय माता दी उच्चारण हुआ जिसे सुन के अन्य लोगों ने अनेकों बार जय माता दी, जय माता दी का उद्घोष किया। इस अद्भुत घटना के कुछ ही दिनों बाद श्रीधर की पत्नी गर्भवती हुई जो माता वैष्णो देवी की कृपा का प्रसाद था।
उधर गर्भ गुफा में माता रानी ने पूरे नव महीने का समय व्यतीत किया और भैरवनाथ ने पकड़ने के लिए पर्वत पर भटक रहा था। अनेकों बार उसने अपनी योग्यता के बल से करने को ढूंढने का प्रयास किया, किंतु असफल रहा जिससे यह सिद्ध होता है कि माता की इच्छा के बिना उनके दर्शन कर पाना संभव है, इतना ज्ञान भैवनाथ को, ताकि वह करने से पर्वत पर आई है किंतु किस गुफा में है कहां छिपी है पीछा करते समय उसने देखा कि करने के बाण चलाकर जल प्रकट किया उसके बाद वहां से चलकर आगे जाकर खड़ी हुई। जहां उसके चरणों के निशान अंकित हुए तदोपरांत वहां से चलकर वह पर्वत की ऊंचाई पर पहुंची जब भैरव पर्वत की ऊंचाई पर पहुंचा तो करना उसे कहीं भी दिखाई ना दे, किंतु उसकी जिज्ञासा इतनी प्रबल थी कि कन्या को वह निरंतर ढूंढता रहा जब नौमान गर्भ गुफा में पूर्ण हो गए तो एक दिन ढूंढते-ढूंढते भैरवनाथ उसको साथ के निकट पहुंचा और एक तपस्वी साधु को देखकर पूछा यहां कोई कन्या आई है? जिसे मैंने मैं नव माह से ढूंढ रहा हूं वह इसी पर्वत पर कहीं छिपी हुई है, उसी समय भैरव की दृष्टि उस छोटी सी गुफा के अंदर पर पड़ी तब उसने गुफा में घुसने की चेष्टा की तब उस तपस्वी ने भैरव का मार्ग रोकते हुए कहा कि जा भैरवनाथ तुम इस गुफा में नहीं जा सकते। तपस्वी के रोकने पर भैरो को निश्चय हो गया कि अवश्य ही वह दिव्य कन्या इस गुफा के अंदर है। यह जानकर उसने गुफा में जाने की हठ ठान ली तपस्वी ने भैरवनाथ को समझाते हुए कहा कि हे भैरव जिसे तू साधारण कन्या समझ रहा है, वह आदि कुमारी महाशक्ति है तू वापस लौट जा इसी में तेरा हित है, लेकिन भैरव कहां मानने वाला था उसने तपस्वी साधु को धकेल दिया और गुफा की ओर बढ़ा तक वृक्ष की शाखा पर बैठे महाबली ने अपनी पूछ बढ़ाकर भैरव को जकड़ लिया और पूछ से ही उठा कर दूर फेंक दिया । भैरव भी शक्तिशाली था, पृथ्वी पर गिरने के बाद तत्काल उठा और महाबली लांगुर वीर से लड़ने लगा और गुफा के अंदर जाने की बार-बार चेष्टा करने लगा- उसने हठ करते हुए तीव्र स्वर में कहा- या गुफा है या गर्भयोनि जहां यह कन्या नव महीने से छुप कर बैठी है। मैं उसे ढूंढ कर ही दम लूंगा। उधर गुफा के अंदर विराजमान माता, महाबली और भैरवनाथ का युद्ध करना देख रही थी और खेल रचाकर कोउतुल देख रही थी, अंत में देवी क्रोधित होकर अपने स्थान पर उठ खड़ी हुई, क्रोध से उसके नेत्र लाल हो गए। उसने अपने त्रिशूल से गुफा के पीछे की ओर मार्ग बनाया और सिंह पर सवार होकर बाहर निकली। उधर महाबली लांगुर वीर भैरव के ऊपर अपने विशाल गधा का प्रहार कर धराशाही करने के उद्देश्य से जिस समय आगे बढ़े उसी समय देवी प्रकट हो गई और उन्हें रोकती हुई बोली- नहीं महाबली नहीं| इस दुष्ट पर तुम अपनी वज्र समान गधा का प्रहार मत करो। यह सुनते ही लांगुर वीर एक और हट गए, तब देवी पुनः बोली- इसकी मृत्यु मेरे हाथों होनी है। उस घड़ी महामाई के नेत्रों से क्रोध की ज्वाला बरस रही थी। क्रोध के कारण उनका सोम्य मुखमंडल साक्षात चंडी देवी के समान लग रहा था। हाथ में चमकता त्रिशूल और शेर की सवारी से साक्षात दुर्गा लग रही थी देवी। जगत माता का यह रौद्र रूप देखकर भैरवनाथ घबरा गया, किंतु देवी ने जो निश्चयकर लिया उसे टालने की शक्ति किसमें है। भगवती ने उसी क्षण अपने चमकते त्रिशूल के एक ही वार से भैरवनाथ का शीश काट लिया। उसका कटा हुआ सिर उसके धड़ से बहुत दूर जाकर गिरा। भैरवनाथ सिद्ध पुरुष तथा महान योगी था। सिर धड़ से अलग होने के उपरांत भी वह चेतना शून्य नहीं हुआ और अपने कर्मों पर पश्चाताप करते हुए देवी से विनय करते हुए कहने लगा- हे जगत की सृजनहार माता! मैं आपके इस रूप से अनजान था। हे जगत का कल्याण करने वाली जगत माता! मेरे अज्ञान और अपराधों को क्षमा करें। पुत्र कितना भी नालायक और दुराचारी क्यों ना हो पर माता कभी कुमाता नहीं होती। मां! यदि तूने मुझे क्षमा नहीं किया तो आने वाला युग मुझे पापी कहेगा। सांसारिक प्राणी मुझे घृणा की दृष्टि से देखेंगे। हे मां! मुझे क्षमा करो, क्षमा करो मां।

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भैरो ने वनीत होकर बार-बार देवी भगवती को मां कह कर पुकारा और ममतामई देवी माता का कोमल हृदय उसकी कातर करुण पुकार से द्रवित हो गया। तब भैरव को वर देकर देवी बोली-हे भैरव! तूने बारंबार मुझे मां कहकर पुकारा इसी से तेरे सारे पाप नष्ट हो गए और तू मोक्ष का अधिकारी हुआ। मैं तुझे यह वर देती हूं कि मेरी पूजा के बाद तेरी भी पूजा हुआ करेगी। जो प्राणी मेरी पूजा करने के बाद तेरा दर्शन करेंगे उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंगी तथा जो तुम्हारे दर्शन नहीं करेंगे मात्र मेरा ही दर्शन कर लौट जाएंगे उनकी पूजा अपूर्ण होगी। हे माता के भक्तों! जिस स्थान पर वैष्णो माता के तीक्ष्ण त्रिशूल से कटकर भैरव नाथ का सिर गिर गया उसी स्थान पर भैरव मंदिर का निर्माण हुआ। श्रद्धालुजन मैया का दर्शन करने के उपरांत भैरव का दर्शन करने हेतु अवश्य जाते हैं।
माता के देव धाम की यात्रा पंडित श्रीधर ने स्वप्न में किया था, उसी दिन से वह माता के दरबार में पहुंचने का प्रयास करने लगे। स्वप्न में देखें मार्ग के अनुसार वह त्रिकूट पर्वत की चढ़ाई चढ़ते गए। जहां मार्ग भूलने लगते उस स्थान पर खड़े होकर स्वप्न का दृश्य याद करते। इस तरह वह माता के दरबार तक जा पहुंचे और गुफा मार्ग से प्रवेश करके उस स्थान पर गए, जहां माता पिंडी रूप में विराजमान थी। उनका दर्शन कर उन्होंने अपना जीवन सार्थक किया। माता की सेवा आरती एवं नित्य वंदना से श्रीधर को माता कि कृपा का प्रसाद प्राप्त हुआ। माता ने साक्षात श्रीधर को अपना दर्शन देकर कृतार्थ किया तथा चार सुंदर, सुशील एवं ज्ञानी पुत्रों का वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गई।

अश्वराज रुरु के वध का प्रसंग

पूर्व काल में रुरु नामक एक महाशक्तिशाली दैत्य हुआ करता था। उसने पितामह ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। उसकी उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया। वर पाकर वह महाशक्तिशाली हो गया। समुद्र के मध्य में बसी असुरराज रुरु की राजधानी रत्नपुरी थी, जिसके चारों ओर गहन वन थे। उसकी वीरता और शक्ति से भयभीत होकर अनेक राजाओं ने उसकी दास्तां स्वीकार कर ली। समयानुसार रुरु की शक्ति बढ़ती गई। उसने अपनी महान दलित सेना के बल पर देवताओं की नगरी अमरावती पर चढ़ाई कर दी। दैत्यों द्वारा अमरावती पर चढ़ाई किए जाने का समाचार जब देवराज इंद्र को प्राप्त हुआ तो वह देव सेना को युद्ध के लिए प्रेरित कर स्वयं हाथ में वज्र लेकर अपने प्रिय वाहन एरावत पर अरूण हो दैत्यों से युद्ध करने के लिए चल पड़े।

उनके साथ सभी देवगढ़ अपने आयुधों से सुसज्जित होसमर भूमि की ओर देवराज इंद्र के साथ युद्ध भूमि में पहुंचते ही देवताओं ने दैत्य को ललकारते हुए कहा अरे मूर्खों! जब कभी तुम बलशाली हो जाते हो तो तुम्हारे अंदर अहंकार उत्पन्न हो जाता है और देवताओं से युद्ध ठान लेते हो। आज तुम सभी असुरों को अहंकार का परिणाम भुगतना ही होगा। यह कहकर देवराज इंद्र ने असुर सेना को युद्ध के लिए ललकारा। उनकी ललकार सुनकर असुरराज रुरु ने क्रोधित होकर कहा कि अरे मूर्ख इंद्र! तू हमारे सम्मुख युद्ध में एक पल भी नहीं ठहर सकता। यज्ञादि का हविष्य तेरी शक्ति है हविष्य ग्रहण करके तू ही शक्तिसंपन्न होता है और मेरे भय से भयभीत पृथ्वी वासी यज्ञ आदि पुण्य कर्म नहीं कर पा रहे हैं, सो तेरी आदि शक्ति वैसे ही चला चीड़ है। उपरोक्त वचनों का उच्चारण करने के पश्चात रुरु ने अपनी असुर सेना को आक्रमण करने का आदेश दिया। आदेश प्राप्त होते असुरवीरों नेअपने भयानक अस्त्रों से देवसेना पर प्रहार करना शुरू किया। देवतागण पूरे उत्साह से असुरों का मुकाबला करने लगे, लेकिन अति बलसाली असुरों के सम्मुख ज्यादा देर तक ना ठहर सके और घायल होकर इधर- उधर भागने लगे। देवताओं को इस तरह परास्त होता देखकर देवराज इंद्र के मुख्य मंडल पर निराशा की रेखाएं उभर आई और हताश होकर रणभूमि से भाग खड़े हुए। हे भक्तों! देवराज इंद्र सहित समस्त देवताओं को परास्त करके असुरराज रुरु ने अमरावती पर अपना अधिकार कर लिया।
असुरो से पराजित होकर सभी देवता एक स्थान पर एकत्रित हुये ओर आपस मे विचार विमर्श कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हमारी मुसीबत से मुक्ति दिलाने में एकमात्र भगवती देवी ही सक्षम हैं। वही हमारे दुखों का निवारण कर सकती हैं अतः हम सभी को उनकी शरण में चलना चाहिए। उसी भगवती ने पूर्व काल में भयानक रूप धारण कर महाबली चंड मुंड और रक्तबीज नामक असुरों का वध किया जो रुरु की तरह वरदान प्राप्त कर महाशक्तिशाली और अभिमानी हो गए थे, तब सभी देवतागण भगवती की स्तुति करने लगे हे माता! हम सभीदेवतागण, असुरराज रुरु से परास्त होकर तुम्हारी शरण में आए हैं। हे शरणदाती माता! असुरों के अत्याचार से समूचे भूमंडल पर अधर्म का बोलबाला हो रहा है। प्राणी जगत में त्राहि त्राहि मची हुई है। उस दुष्ट स्वभाव वाले असुर ने हमारी अमरावती छीन कर हम सभी देवताओंको दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है। सत्य तो यह देवी कि हम देवगढ़ उन असुरों के सम्मुख बलहीन सिद्ध हो चुके हैं। हे जगदीश्वरी! एकमात्र तुम ही हमारी रक्षा करने में समर्थ हो। देवताओं के विनती सुनकर अभय प्रदान करने वाली देवी विकराल रूप धारण कर उसी समय प्रकट हुई और भयानक अटठाहास करने लगी। अट्टहास करते समय उनके मुख से अन्य देवियां प्रकट होकर दैत्य सेना को कुचल डालने के लिए आतुर हो उठी। उनके हाथों में पास, अंकुश, खड़ग्, त्रिशूल आदि विद्यमान थे। देवी की अतुलित शक्ति का अनुमान करके देवगढ़ अति प्रसन्न हुए और देवी के साथ होकर दैत्यों का सामना करने के लिए तैयार हो गए।
हाहा-कारी युद्ध छिड़ गया। भगवती के साथ दैत्यों से युद्ध कर रही देवियों के मुख से मारो काटो भागने ना पाए आदि शब्द उच्चारित होकर नभ मंडल में विलीन हो रहे थे। उनके भयानक प्रहारों से दैत्य सेना मरने लगी। चारों तरफ रक्त ही रक्त दिखाई दे रहा था। महाबली रुरु ने अपनी संपूर्ण दैत्य सेना को प्रतिपल नष्ट होते देखकर मायावी शक्ति का प्रयोग किया, जिससे सभी देवता अचेत होकर सो गए। तब भगवती ने विचार किया कि इस दैत्य को ज्यादा देर तक जीवित रखना उचित नहीं है। उन्होंने ततक्षण अपने त्रिशूल का भयंकर प्रहार रुरु पर किया जिससे उसका सिर धड़ से अलग हो गया। देवी ने रुरु के चर्प धड़ से मुन्ड सिर को अलग कर दिया, इसी कारण वह चामुंडा कहलाई। देवी चामुंडा की अनुचरी देवियां उस समय भूख से व्याकुल होकर भोजन मांगने लगी, तब देवी ने भगवान रुद्र का स्मरण किया रुद्र भगवान उसी समय प्रकट हुए और देवियों के भोजन का प्रबंध किया, तदुपरांत जब उनकी दृष्टि मरे हुए रुरु पर पड़ी तो वह देवी को इस प्रकार की स्तुति करते हुए कहने लगे हे देवी तुम्हारी जय हो, हे चामुंडा, हे महामाया, हे आदि शक्ति तुम्हारी जय हो तुम ही काली महाकाली, चामुंडाकालरात्रि आदि नाम वाली एक मात्र देवी हो आप को बारंबार नमस्कार इस प्रकार स्तुति करके रुद्र भगवान अपने लोक को गए।
माता महाकाली महासरस्वती और महालक्ष्मी की सवारी सिंह नहीं है, जिस कारण उनके मंदिरों में सिंह की मूर्तियां स्थापित नहीं है, संपूर्ण जगत में शेरावाली माता के नाम से विख्यात देवी वैष्णो माता ही हैं, जिन्होंने समय-समय पर अनेक रूप में अवतार ग्रहण किया और महिषासुर चिचुर चामर, चंड मुंड और असुरों का वध कर देवताओं को अभय प्रदान किया।

 

माता वैष्णों की स्तुति

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्त वीर्या
विश्वस्य बीजं परमासि माया।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत
तवं वै प्रसन्न भुवि मुक्ति हेतु:।।
विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:
स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्ब यैयत
का ते स्तुति: सल्वयपरा परोक्ति:।।
भावार्थ – तुम असीमित बल एवं शक्ति संपन्न वैष्णवी हो। संपूर्ण जगत की कारण भूता परामाया हो। देवि! तुमने संपूर्ण जगत को मोहित कर रखा है। प्रसन्न होकर पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो। संपूर्ण विधाये तुम्हारे अनेक रुप हैं। जगत की समस्त स्त्रियां तुम्हारी मूर्तियों के स्वरुप है। हे जगत माता! तुम से ही यह विश्व व्याप्त है। तुम्हारी सस्तुति कौन कर सकता है। तुम स्तवन करने योग्य पदार्थों से परे, परावाणी हैं।

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