नेपाल की गुह्येश्वरी देवी शक्तिपीठ की महिमा, दूर होते हैं रोग 

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भगवान पशुपतिनाथ का मंदिर नेपाल में अवस्थित है। धार्मिक दृष्टि से इस मंदिर का बहुत महत्व है। यहीं भगवान पशुपतिनाथ मंदिर से थोड़ी दूर वागमती नदी प्रवाहित होती है। वागमती नदी के दूसरी ओर गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है। यह यहां की अधिष्ठात्री देवी हैं। इस पावन शक्तिपीठ के मंदिर में एक छिद्र से निरंतर जल प्रभाहित होता रहता है। यहां पीठ किरातेश्वरी महादेव मंदिर के समीप पशुपति नाथ मंदिर से सुदूर वागमती गंगा नदी तट पर टीले पर विजराजमान है। यहां प्राचीन काल में श्लेषमान्त वन था, जिसमें अर्जुन ने तपस्या की थी, कैलासपति किरात के रूप में इस जंगल में विचरते रहे। वह वन आज गाँव का रूप ले चुका है। कुछ भाग अब भी शेष है। काठमाण्डू का हवाई अड्ड उसी वन भाग में बना है। वहां पहुंचकर जो भी भक्त नर नारी भगवती गुह्येश्वरी का दर्शन पूजन करते हैं, उनकी मनोकामना भगवती गुह्येश्वरी पूरा करती हैं।
वहां पहुंचने के लिए अनेक साधक है। हवाई जहाज से जाने पर हवाई अड्डïे से निकलकर गौशाला होते हुए टैम्पो या टैक्सी द्वारा वागमती के किनारे तक जाकर पुल पार करके शक्तिपीठ तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। बस से जाने पर भी बस अड्डïे से रत्न पार्क शहीद फाटक होते हुए, गौशाला ही पहुंचते हैं। सिटीबस, टैक्सी आदि सब प्रकार के साधक सुलभ है। मान्यता है कि शरीर के किसी अंग कोई रोग हो या विशेष तौर पर गुप्तांग में कोई रोग हो तो गुह्रेश्वरी के दर्शन पूजन से और वहां पर पाठ करने या कराने से रोग से मुक्ति व सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। नेपाल शक्तिपीठ ‘गुह्रेश्वरी’ के नाम सिद्घेश्वर महादेव का लिंग भगवान सृष्टिकर्ता ब्रह्मा द्वारा प्रतिष्ठित है। जिसकी अर्चना-वंदना से  भक्तजन इच्छित फल प्राप्त कर सकते हैं।

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स्कन्दपुराण के केदारखण्ड में भगवती शक्ति की महिमा का आख्यान विस्तार से वर्णन किया गया है। उल्लेख है कि पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में परमेश्वर शिव का भाग न देखकर देवी सती ने यज्ञशाला में ही योगाग्रि प्रकट कर अपना शरीर,भस्मीभूत कर दिया। वीरभद्र आदि प्रचण्ड गणों  ने दक्षका यज्ञ विध्वंश किया, भगवान शिव सती की निर्जीव देह कंधेपर लेकर भ्रमण करने लगे। भगवान शिव के शोकसंतप्त नृत्य से कहीं प्रलय न हो जाय, भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती की देह को काटना प्रारम्भ किया, इससे शरीर के विभिन्न भाग कटकर गिरने लगे। जहां-जहां महादेवी सती के शरीर का भाग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बने। प्रत्येक पीठ में महादेव तथा योगिनी (ईश्वरी) प्रकट हुईं। जबतक भगवती सती के प्रत्येग अंग गिरकर समाप्त न हुए, तब तक भगवान शिव भ्रमण करते रहे। भ्रमण करते हुए जब भगवान शंकर नेपाल पहुंचे तो वहां पर भगवती सती के शरीर का गुह्रभाग गिरा।

वह नेपाल शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्घ हुआ। यहां की शक्ति ‘गुह्रेश्वरीदेवी’ के नाम से प्रसिद्घ हैं। यहीं पर चन्द्रघंटा योगिनी तथा सिद्घेश्वर महादेव का प्रादुर्भाव हुआ। यहां शिव शक्तिस्वरूप से विराजमान हुए। यह क्षेत्र साधकों को सिद्घि देनेवाला है। शक्ति संगम तंत्र में कहा गया है कि जटेश्वर से प्रारम्भकर योगेशतक साधकों को सिद्घि प्रदान करने वाला नेपाल देश है-
जटेश्वरं समारभ्य योगेशान्तं महेश्वरि।
नेपालदेशो देवेशि साधकानां सुसिद्घिद:।।
इस पुण्यभूमि सिद्घपीठ में इन्द्र आदि देवताओं ने आकर शक्ति की आराधना करते हुए कठोर तप किया। भगवती गुह्रेश्वरी ने प्रकट होकर देवताओं को वरदान दिया कि आप लोग सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि-इन चारों युगों में तैंतीस कोटि देवता के नाम से प्रख्यात रहोगे। विश्व में आप लोगों की पूजा होगी तथा आप सभी आराधकों को ईप्सित फल दे सकोगे। इस प्रकार वरदान पाकर देवगण प्रसन्न होकर सदैव शक्ति की आराधना में रत रहते हुए स्वर्ग लौट आये।

माँ की महिमा 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


जो पराशक्तिरूपा देवी समस्त प्राणियों में शक्ति रूप से विराजमान है, उन आद्याशक्ति भगवती को बारम्बार नमस्कार है।
ब्रह्म सृष्टि करने की, विष्णु में पालन करने की और शिव में संहार करने की शक्ति है। सूर्य संसार को प्रकाश  देते हैं। शेषनाग और कच्छप में पृथिवी धारण करेन की शक्ति है। अग्रि में प्रज्वालन शक्ति और पवन में गतिशील करेन की शक्ति है। तात्पर्य यह है कि सभी में जो शक्ति विराजमान है, वस्तुत: वह आद्याशक्ति के कारण ही है। उनके प्रभाष से शिव शिवता को प्राप्त होते हैं। जिस पर शक्तिरूपिणी की कृपा न हुई चाहे वह कोई भी हो शक्तिहीन हो जाता है। विद्वज्जन उसे असमर्थ कहते हैं। सबमें व्यापक रहने वाली जो आद्याशक्ति है, उन्हीं का ‘ब्रह्म’ नाम से निरूपण किया गया है।
वे ही आद्याशक्ति इस अखिल ब्रह्मïाण्ड को उत्पन्न करती है और उसका पालन भी करती हैं। वे ही आद्याशक्ति इच्छा होने पर इस चराचर जगत का संहार भी कर लेेने में संलग्र रहती हैं। सभी देवता अपने कार्य में तब सफल होते हैं, जब आद्याशक्ति उन्हें सहयोग पहुंचाती हैं। इससे सिद्घ होतो है कि वे शक्ति ही सर्वोपति हैं। वे सगुणा साकारा, निर्गुणा निराकारा के भेद से अनेक रूप में जानी जाती हैं-
‘निराकारा च साकारा सैव नानाभिधा स्मृता’

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