नीलम कब व कैसे करें धारण, जाने- गुण, दोष व प्रभाव

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नीलम का प्रभाव बहुत ही जल्द पड़ता है। यह बहुत ही मूल्यवान रत्न है। इसका स्वामी शनि ग्रह हैं। माणिक्य की तरह नीलम भी कुरूंदम समूह का रत्न है। इस समूह के लाल रत्न को माणिक्य और सभी अन्य रत्नों को नीलम कहा जाता है। जैसे श्वेत नीलम, हरा नीलम, बैंगनी नीलम आदि है।

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जानिए, नीलम की पृष्ठभूमि
भारतीय धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यराज बलि के नेत्रों से नीलम का जन्म हुआ है। भारतीय ग्रंथों में नीलम दो तरह के बताए गए हैं। 1- जलनील व 2- इंद्रनील। लघु नील में सफेदी होने के कारण उसे जलनील कहा जाता है। जबकि श्याम आभयुक्त नीलिमा प्रस्फुटित करने वाला भारी नीलम इंद्रनील कहलाता है। वास्तव में यह नीले और लाल रंग का मिश्रण् यानी बैंगनी रंग का होता है। सबसे अच्छे नीलम भारत के कश्मीर में मिलते हैं। नील की खान वहां जांसकर पहाड़ी में सुमजाम नामक गांव के निकट है।

जानिए, नीलम के प्रभाव क्या होते हैं
सभी रत्नों में मात्र नीलम ही ऐसा रत्न है, जो देखते ही देखते अपना असर दिखा देता है, इसलिए इसे पहनने बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। अगर नीलम धारण करने के बाद यह घटनाएं या बातें तो इसे तत्काल उतार देना चाहिए।
1- अगर कोई अनिष्टि हो जाए तो नीलम नहीं पहनना चाहिए।
2- अगर नीलम पहनने के बाद आंखों में पीड़ा बढ़ जाए या मुखाकृति में अंतर आ जाए तो नीलम तत्काल उतार देना चाहिए।
3- अगर नीलम धारण करने के बाद रात को डरावने या बुरे सपने आने लगे तो इसे धारण नहीं करना चाहिए।

जानिए, नीलम के गुण क्या होते है
1- इसका पानी श्रेष्ठ होता है, इसके कोण सुडौल होते हैं।
2- यह साफ व पारदर्शी होता है।
3- चमकीला और चिकना होता है।
4- यह नीला रंग का होता है, लेकिन कुछ ज्योतिषी मानते है कि मोरपंख के रंगवाला नीलम श्रेष्ठ माना जाता है।
5- इससे पतली-पतली नीली रश्मियां निकलती है।

आइये, जाने नीलम की जांच कैसे की जाए
1- अगर नीलम के पास कोई तिनका लाया जाए तो वह चिपक जाता है।
2- नीलम को दूध में रखने के बाद यह नीला दिखने लगता है।
3- यदि नीलम धूप में रखा जाए तो यह प्रखर होता है। इससे तेज किरण्ों निकलती है।
4- अगर नीलम को पानी के गिलास में डाल दिया जाए तो पानी से स्पष्ट नीली किरण्ों निकलती हैं।

भूल से न धारण करें ऐसे नीलम
दोषयुक्त नीलम धारण करने से बेहद घातक परिणाम सामने आते है, इसलिए दोषयुक्त नीलम नहीं धारण करना चाहिए।
1- ऐसा नीलम, जिसमें गढ्डा हो, वह शत्रुता बढ़ता है।
2- नीलम जिसमें जाल हो, ऐसे नीलम रोग बढ़ाने वाले होते हैं।
3- नीलम जिसमें चमक नहीं होती है, वह प्रिय बंधुओं का नाश करने वाले होते हैं।
4- नीलम जिसमें सफेद धब्बे होते है, ऐसे नीलम विषयुक्त होता है।
5- जिसमें लाल रंग के छोटे-छोटे बिंदु होते हैं, यह नीलम विषयुक्त होता है।
6- नीलम जो कि दोरंगा होता है, यह संतान व पत्नी के लिए घातक होता है।
7- नीलम जिसमें चीरा लगा होता है, वह गरीबी बढ़ाता है।
8- नीलम जिसमें सफेद लकीरें हों, यह शस्त्र से मृत्यु को अंजाम देता है।
9- जो दूधिया रंग का हो, यह कुल लक्ष्मी का नाश करता है।

जानिए, नीलम के उपरत्न क्या है
नीलम के दो उपरत्न होते है। 1- लीलिया व 2- जमुनिया।
1- लीलिया- यह नीले रंग का हल्की रक्तिम ललाई वाला होता है। इसमें चमक भी होती है। लीलिया गंगा-यमुना के तट पर मिलता है।
2- जमुनिया- इसका रंग पके जामुन सा होता है। इसके अलावा यह हल्के गुलाबी और सफेद रंग में भी पाया जाता है। यह चिकना, साफ और पारदर्शी होता है। जमुनिया भारत के हिमालय क्ष्ोत्र में अक्सर ही मिल जाता है।
जानिए, नीलम को कौन करे धारण
आइये जानते हैं कि किन परिस्थितियों में नीलम को धारण किया जा सकता है।

1- मेष, वृष, तुला व वृश्चिक लग्न वाले जातकों को नीलम धारण करना लाभकारी होता है। यह भाग्योदय कराता है।
2- अगर जन्मकुंडली में शनि चौथ्ो, पांचवे, दसवें या ग्यारहवें भाव में हो तो नीलम आवश्य धारण करना चाहिए।
3- अगर शनि षष्ठेश या अष्टमेश के साथ बैठा हो ता ेनीलम धारण करना श्रेष्ठतम होता है।
4- अगर शनि अपने भाव से छठे या आठवें स्थान पर स्थित हो तो नीलम आवश्य पहनना चाहिए।
5- शनि मकर और कुम्भ राशि का स्वामी है। अगर एक राशि श्रेष्ठ भाव में और दूसरी अशुभ भाव में हो तो नीलम नहीं पहनना चाहिए। यदि शनि की दोनों दोनों राशियां श्रेष्ठ भाव का प्रतिनिधित्व करती हो तो नीलम आवश्य धारण करें।
6- अगर शनि की साढ़े साती चल रही हो, तो नीलम पहनना उत्तम होता है।
7- अगर किसी भी ग्रह की महादशा में शनि की अंतर्दशा चल रही हो, तो नीलम आवश्य पहनना चाहिए।
8- यदि शनि सूर्य के साथ हो, सूर्य की राशि में हो या सूर्य की दृष्टि हो तब भी नीलम पहनना चाहिए।
9- अगर जन्मकुंडली में शनि मेष राशि पर स्थित हो, तो नीलम पहनना बहुत जरूरी होता है।
1०- अगर कुंडली में शनि वक्री, अस्तगत या दुर्बल हो और शुभ भावों का प्रतिनिधित्व कर रहा हो तो नीलम पहनना श्रेष्ठकर माना जाता है।
11- जो शनि ग्रह प्रधान व्यक्ति हैं, उन्हें आवश्य ही नीलम पहनना चाहिए।
12- क्रूर कर्म करने वालों के लिए नीलम हर समय उपयोगी माना गया है।

जानिए, राशि के अनुसार नीलम का व्यवहार कैसा होता है
हर राशि में शनि भी अलग-अलग फल प्रदान करता है, इसलिए राशि के अनुसार नीलम का व्यवहार होता है।
1-मेष लग्न की कुंडली में शनि दशम और एकादश भाव का स्वामी होता है। ये दोनों भाव शुभ होते है। फिर भी एकादश भाव भाव का स्वामी होने के कारण शनि को मेष लग्न के लिए शुभ ग्रह नहीं माना गया है। इसलिए यदि शनि मेष लग्न में प्रथम, द्बितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम या दशम भाव में स्थित हो तो शनि की महादशा में नीलम पहनना हर क्ष्ोत्र के लिए लाभदायक होता है।
2- वृष लग्न के लिए शनि नवम और दशम भाव का स्वामी होने के कारण् अन्यन्त शुभकारक और योगकारक ग्रह माना गया है। इसलिए इस लग्न के जातकों को हमेशा नीलम धारण करना चाहिए। इससे मान-सम्मान, सुख-सम्पदा और राजकृपा आदि की प्राप्ति होती है। यदि शनि की महादशा में नीलम धारण किया जाए तो विश्ोष लाभ होता है।

3- मिथुन लग्नमें शनि अष्टम व नवम भाव का स्वामी होता है। नवम त्रिकोण का स्वामी होने से शनि इस राशि के लिए शुभ ग्रह माना गया है। अगर शनि की महादशा में ऐसे जातक को नीलम पहनना चाहिए। इससे लाभ की प्राप्ति होती है। अगर नीलम को पन्ने के साथ धारण किया जाए तो परम लाभ होता है।
4- कर्क लग्न में शनि सप्तम और अष्टम भाव का स्वामी होता है। ये दोनों भाव अशुभ होते हैं। साथ ही शनि कर्क लग्नके स्वामी चंद्रमा का मित्र नहीं है। इसलिए इस लग्न के जातकों को नीलम नहीं पहनना चाहिए।
5- सिंह लग्न में शनि छठे व सातवें भाव का स्वामी होता है। ये दोनों भाव अशुभ माने गए हैं। साथ ही शनि सिंह लग्न के स्वामी सूर्य का शत्रु भी है। इसलिए इस लग्न के जातकों को नीलम नहीं धारण करना चाहिए।
6- कन्या लग्न में शनि पंचम और षष्ठम भाव का स्वामी है। पंचम त्रिकोण का स्वामी होने के कारण शनि को इस लग्न के लिए शुभ ग्रह माना गया है। इसलिए शनि की महादशा में कन्या लग्न के जातक नीलम पहनें। यह अत्यन्त लाभकारी होता है।
7- तुला लग्न में शनि चतुर्थ और पंचम भाव का स्वामी होता है। साथ ही तुला लग्न के स्वामी शुक्र और शनि में मित्रता है। इसलिए यदि इस लग्न के जातक नीलम धारण करें तो चौतरफा लाभ होता है। शनि की महादशा में नीलम धारण करना परम लाभकारी होता है। अगर इसे हीरे व पन्ने के साथ ग्रहण किया जाए तो विश्ोष लाभ होगा।
8- वृश्चिक लग्न में शनि तृतीय व चतुर्थ भाव का स्वामी है। चूंकि इस लग्न का स्वामी मंगल हैं और मंगल व शनि में शत्रुता है। इसलिए अगर ऐसे जातक नीलम न धारण करें तो बेहतर रहता है।
9- धनु लग्न में शनि द्बितीय व तृतीय भाव का स्वामी होता है। ये दोनों भाव अशुभ माने गए हैं। दूसरी ओर धनु लग्न के स्वामी बृहस्पति और शनि में शत्रुता है, इसलिए इस लग्न के जातकों को नीलम नहीं पहनना चाहिए।
1०- मकर लग्न में शनि द्बितीय भाव का स्वामी है। इसलिए इस लग्न के जातकों को हमेशा नीलम पहनना चाहिए। इससे उन्हें हर तरह की सुख-समृद्धि व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
11- कुम्भ लग्न में शनि एक और द्बादश भाव का स्वामी होने से अशुभ फलदायी है तो दूसरी ओर लग्नेश होने के कारण परम कल्याणकारी है। फिर उसकी मूल त्रिकोण राशि लग्न में पड़ती है। इसलिए कुम्भ लग्न के लिए विश्ोष कवच का काम करता है और सुख-सौभाग्य प्रदान करता है।
12- मीन लग्न में शनि एकादश व द्बादश भाव का स्वामी होता है। ये दोनों भाव अशुभ माने जाते हैं। इसलिए शनि इस लग्न के लिए अशुभ ग्रह माने गए हैं। इसके अलावा शनि मीन लग्न कुंडली में द्बितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम या लग्न पर स्थित हो तो उसकी महादशा में नीलम धारण करने से आर्थिक लाभ होता है। लेकिन ज्योतिष शास्त्री मानते हैं कि इस लग्न के लोगों को नीलम कभी नहीं पहनना चाहिए।

जानिए, नीलम के विकल्प 

जो व्यक्ति नीलम य उसके उपरत्न नहीं खरीद सकते हैं, उनके लिए अन्य विकल्प है। वे जिरकॉन, कटैला यानी एमेथिस्ट या लाजवर्द यानी लेपीज लाजुली धारण करना चाहिए। ऐसे लोग नीला तामड़ा यानी ब्लू गारनेट, नीला स्पाइनेल या पूर्ण रूप से पारदर्शक नीले रंग का तुरमली भी पहन सकते हैं। नीलम के साथ माणिक्य, मोती, पीला पुखराज या मूंगा कभी नहीं धारण करना चाहिए।

जानिए, कैसे धारण करना चाहिए नीलम 

नीलम को शनिवार के दिन पंचधातु या स्टील की अंगूठी में जड़वाकर विधिनुसार उसकी उपासनादि करके सूर्यास्त से दो घंटे पूर्व मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए। नीलम का वजन चार रत्ती से कम नहीं होना चाहिए। इसे पहनने से पूर्व ऊॅँ शं शनैश्चराय नम: …………….मंत्र का जप 23 हजार बार करना चाहिए।

शनि की शाढ़े साती
अगर शनि जन्म लग्न से या चंद्र से बारहवीं लग्न पर स्थित हो तो इस पूरे समय को शनि की साढ़ेसाती कहा जाता है। शनि एक राशि पर ढाई वर्ष रहता है। इस तरह से तीन राशियों पर उसका भ्रमण साढ़े सात वर्ष में पूरा होता है। अगर किसी व्यक्ति की साढ़ेसाती अनिष्टकर हो तो उसे नीलम आवश्य पहनना चाहिए।

जानिए, किन रोगों के उपचार में कारगर है नीलम

आयुर्वेद में बताया गया है कि नीलम तिक्त रस वाला है, जो कफ, पित्त और वायु के कष्टों का समूल नाश करता है। इसके अलावा नीलम दीपन हृदय, पृष्य वल्य और रसायन है। इसलिएयह मस्तिष्क की दुर्बलता, क्षय, हृदय रोग, दमा, खांसी, कुष्ठ आदि में अत्यधिक लाभकारी है।
1- पागलपन में नीलम का भस्म रामबाण है।
2- नीलम को धारण् करने से खांसी, उल्टी, रक्त विकार, विषम ज्वर आदि स्वत: नष्ट हो जाता है।
3- आंखों के रोग जैसे धूंध, मोतियाबिंद, पानी गिरना आदि में नीलम को केवड़े के जल में घोटकर आंखों मंे डालने से शीघ्र लाभ होता है।

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