पौराणिक काल से ही भारत में प्रचलित थी इच्छा मृत्यु

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इच्छा मृत्यु को लेकर वर्तमान समय में तरह-तरह की धारणाएं प्रबल हो रही हैं। कोई मानता है कि इच्छा मृत्य उचित है तो कोई मानता है यह अपराध है। ईश्वर द्बारा प्रदत्त जीवन को समाप्त करने का हमे अधिकार नहीं है।
 
इच्छा मृत्यु सही या गलत
 
यदि हम सनतन धर्म से सम्बन्धित पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि पूर्व काल में इच्छा मृत्यु को स्थान प्राप्त था, बशर्ते दायित्वों को छोड़कर जीवन से पलायन को उचित नहीं माना गया है। इस क्रम में हम रामायण, महाभारत व जैन धर्म के गंथों के उदाहरण देख सकते हैं।
 
इन्होंने जलसमाधि ली
 
 
महाभारत के कथानानुसार गंगा पुत्र भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त था। उन्होंने तीरों से बनी श्ोष श्ौय्या पर अपने प्राणों का त्याग अपनी इच्छा से किया था। रामयण की बात करें तो माता सीता ने भी अपनी इच्छानुसार धरती में समाहित होकर प्राणोें का त्याग किया था। भगवान श्री राम के सरयू में जल समाधि की कथा प्रचलित है। वैसे जल समाधि और सांस रोककर प्राणों को त्यागने के सैकड़ों उदाहरण हमारे धर्म शास्त्रों में मिल जाएंगे। जैन धर्म में इच्छा मृत्यु के ही एक रूप में संथारा या साल्लेखना का उल्लेख मिलता है। जिसकी परम्परा सदियों पुरानी है।
 
जैन धर्म में संथारा या सल्लेखना
 
जैन धर्म के पंत श्वेताम्बर में संथारा प्रचलित है,जबकि दिगम्बर पंथ में इसे सल्लेखना कहते हैं। यह जैन धर्म में साधना का एक अंग है। इसके अनुसार इंसान की आयु जब अधिक हो जाती है या वरिष्ठ लोग तय करते हैं कि उसके इस संसार से जाने का समय आ गया है तो वह धीरे-धीरे खाना-पीना कम करता है और अंत में खाना-पीना बंद कर देता है। जिससे उसकी मृत्यु हो जाती है। इस तरह से जैन धर्म में साधना का यह नियम प्रचलित है। वहीं आधुनिक युग की बात करें तो आचार्य विनोबा भावे का नाम हमारे समाने आता है। जिन्होंने अपने अंतिम दिनों में इच्छा से मृत्यु का वरण किया था। माना जाता है कि स्वामी विवेकानंद में भी स्वेच्छा से योगसमाधि के जरिए प्राणों का त्याग किया था।
 
 
 
 
 
 
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