राम भक्त हनुमंत ने ऐसे दिया था सुग्रीव को सुरक्षित होने का संकेत

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त्रेता युग की बात है कि जब दानवराज रावण ने भगवती सीता का हरण कर लिया था और भगवान श्री विष्णु के अवतार श्री राम उनकी तलाश में इधर-उधर भटक रहे थ्ो। उसी समय श्री राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे। जहां सुग्रीव बाली से छिप कर रह रहा था। वह हर दिन बाली से भयभीत होकर छिपा रहता था।

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अब बताते हैं, वह किस्सा, जब हनुमान जी ने बाली को संकेत दिया था कि वह निर्भय होकर श्री राम के सामने आ जाए। भगवान श्री राम के परम भक्त हनुमान ऋष्यमूक पर्वत की एक बहुत ऊंची चोटी पर बैठे हुए थे। उसी समय भगवान श्रीराम जी भगवती माता सीता जी की खोज करते हुए लक्ष्मण जी के साथ पर्वत के पास पहुंचे। ऊंची चोटी पर से वानरों के राजा सुग्रीव ने उन लोगों को देखा तो डर गया। उसने सोचा कि ये बाली के भेजे हुए दो योद्धा तो नहीं हैं, जो मुझे मारने के लिए हाथ में धनुष-बाण लिए चले आ रहे हैं। दूर से देखने पर ये दोनों बहुत बलवान जान पड़ते हैं। डर से घबरा कर उसने हनुमान जी से कहा कि हे हनुमंत, वह देखो, दो बहुत ही बलवान मनुष्य हाथ में धनुष-बाण लिए इधर ही बढ़े चले आ रहे हैं। लगता है, इन्हें बाली ने मुझे मारने के लिए भेजा है। ये मुझे ही चारों ओर खोज रहे हैं। तुम तुरंत तपस्वी ब्राह्मण का वेश बना लो और इन दोनों योद्धाओं के पास जाओ तथा यह पता लगाओ कि ये कौन हैं? किसलिए घूम रहे हैं? अगर कोई भय की बात जान पड़े तो मुझे वहीं से संकेत कर देना। मैं तुरंत इस पर्वत को छोड़कर कहीं और भाग जाऊंगा।

सुग्रीव को अत्यंत भयभीत था। उसे घबराया देखकर हनुमान जी तत्काल तपस्वी ब्राह्मण का रूप बनाकर भगवान श्रीरामचंद्र और लक्ष्मण जी के पास जा पहुंचे। उन्होंने दोनों भाइयों को माथा झुकाकर प्रणाम करते हुए कहा कि आप लोग कौन हैं? कहां से आए हैं? यहां की धरती बड़ी ही कठोर है। आप लोगों के पैर बहुत ही कोमल हैं। किस कारण से आप यहां घूम रहे हैं? आप लोगों की सुंदरता देखकर तो ऐसा लगता है-जैसे आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कोई हों या नर और नारायण नाम के प्रसिद्ध ऋषि हों। आप अपना परिचय देकर हमारा उपकार कीजिए। इसे हम धन्य होंगे।

हनुमंत की बात प्रभु श्री राम को अच्छी लगी और उन्होंने परिचय देते हुए कहा कि राक्षसों ने सीता जी का हरण कर लिया है। हम उन्हें खोजते हुए चारों ओर घूम रहे हैं। हे ब्राह्मण देव, मेरा नाम राम तथा मेरे भाई का नाम लक्ष्मण है। हम अयोध्या नरेश महाराज दशरथ के पुत्र हैं। अब आप अपना परिचय दीजिए। भगवान श्रीराम की बातें सुनकर हनुमान जी ने जान लिया कि ये स्वयं भगवान ही हैं। बस वह तत्काल ही उनके चरणों पर गिर पड़े। श्री राम ने उठाकर उन्हें गले से लगा लिया। हनुमान जी ने कहा कि भगवन, आप तो सारे संसार के स्वामी हैं। मुझसे मेरा परिचय क्या पूछते हैं? आपके चरणों की सेवा करने के लिए ही मेरा जन्म हुआ है। अब मुझे अपने परम पवित्र चरणों में जगह दीजिए।

भगवान श्री राम ने प्रसन्न होकर उनके मस्तक पर अपना हाथ रख दिया। केसरीनंदन हनुमंत ने उत्साह और प्रसन्नता से भरकर दोनों भाइयों को उठाकर कंधे पर बैठा लिया। चूंकि सुग्रीव ने उनसे कहा था कि भय की कोई बात होगी तो मुझे वहीं से संकेत करना। हनुमान जी ने राम लक्ष्मण को कंधे पर बिठाया, यही सुग्रीव के लिए संकेत था कि इनसे कोई भय नहीं है। उन्हें कंधे पर बिठाए हुए ही वह सुग्रीव के पास आए और उनसे सुग्रीव का परिचय कराया। भगवान श्री राम ने सुग्रीव के दुख और कष्ट की सारी बातें जानीं। उसे अपना मित्र बनाया और दुष्ट बाली को मार कर उसे किष्किंधा का राजा बना दिया। इस प्रकार हनुमान जी की सहायता से सुग्रीव का सारा दुख दूर हो गया।

जब बाली की मृत्यु की घड़ी नजदीक आई तो उसने श्री राम पूछा, हे प्रभु, आपका अवतार धरती पर धर्म की रक्षा के लिए हुआ है, आपने मुझे ऐसे छिप कर क्यों मारा तो श्री राम ने कहा कि जो बहन, छोटे भाई पत्नी का कुदृष्टि रखता है। उसके वध में कोई पाप नहीं है। बाली ने गलती स्वीकारी और श्री राम का जप करते हुए प्राणों का त्याग किया।

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