अनंत अविनाशी मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अनंत हैं, अविनाशी हैं। उनकी सम्पूर्ण गाथा को लिपिबद्ध करना आसान नहीं रहा होगा। तमाम रचनाकारों ने अपने-अपने बुद्धिबल के अनुसार उनकी पावन गाथा का वर्णन किया है। श्री राम ने जीवन के हर पड़ाव में आदर्श के उच्च मापदंड स्थापित किए हैं, वे अतुलनीय और अकल्पनीय है, इसलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए जाते हैं। राम की बात आती है तो रावण का जिक्र आना भी स्वाभाविक है, लेकिन वास्तव में रावण तो अनाचार और आसुरी परम्परा की एक सशक्त कड़ी मात्र था, उसके संरक्षण में अधर्म और अधर्मी सृष्टि में पांव पसार रहे थे। जिनका समूल विनाश करने के लिए भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में श्री राम इस धरती पर अवतरित हुए और पापियों का समूल नाश कर धर्म की स्थापना की।

श्री राम के अवतरण की गाथा कहते हैं तो यह बताना जरूरी हो जाता है कि भगवान श्री राम के अवतार को परमसत्ता ने बेहद गोपनीय रखा था। जैसे भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण ने अवतरण के बाद लीलाओं को प्रदर्शित करना शुरू कर दिया था, बाल्यकाल में उन्होंने सैकड़ों असुरों का वध कर आसुरी सत्ता को चुनौती दे दी थी, लेकिन श्री राम ने बालकाल में सीधे-सीधे आसुरी शक्तियों को चुनौती नहीं दी थी। श्री राम जब धरती पर प्रकट हुए तो उन्होंने माता कौशल्या को अविनाशी चतुर्भुज स्वरूप दिखाया था, तब माता के निवेदन करने पर वह साधारण बालक के रूप में प्रकट हो गए थे। जब उन्हें महर्षि विश्वामित्र अपने साथ आसुरी शक्तियों के नाश और धर्म की स्थापना के लिए वन में ले गए, तब भगवान श्री राम ने ताड़का, खर-दूषण आदि का वध कर सीधे-सीधे आसुरी शक्तियों को चुनौती दी, इन असुरों के वध का समाचार मिलते ही रावण को भी भान हो गया था कि श्री राम कोई साधारण मानव नहीं हैं, बल्कि वे वही भगवान विष्णु के अवतार ही हैं, जो धरती पर अधर्म का नाश करने के लिए अवतरित हुए। इस बात की पुष्टि तमाम ग्रंथों में भी होती है, जब सीताहरण के बाद रणभूमि में मेघनाद का वध हो गया।

मेघनाद के मरने पर रावण की पत्नी मंदोदरी व्याकुल हो गयी और रावण को दुखित मन से कोसने लगी- आखिर सीता में ऐसा क्या है? जिसके कारण तुमने अपने कुल का सर्वनाश करवा लिया, तब रावण ने मंदोदरी से कहा- जिसे तुम सीता समझ रही हो, वह वास्तविक सीता हैं ही नहीं, क्योंकि महालक्ष्मी स्वरूप सीता जहां रहती हैं, वहां जो प्राकृतिक लक्षण दिखते हैं, वह यहां प्रकट नहीं हो रहे हैं, मैं जानता हूं कि श्री राम भगवान विष्णु के अवतार हैं, मैं उन्हीं के हाथों अपने कुल का विनाश कराके उन्हें राममय करके परमगति दिलाना चाहता हूं, क्योंकि मैं व मेरा कुल ब्राह्मण वंश से जरूर है, लेकिन संस्कार आसुरी हैं, ऐसे में इनके उद्धार के लिए इनका श्री राम के हाथों कालकल्वित होना परमगति दिलाने वाला है। रावण बोला- मेघनाद को वरदान था कि उसका वध वही कर सकता है, जो 14 वर्ष तक सोया नहीं हो, 14 वर्ष तक भोजन न ग्रहण किया हो और 14 वर्ष तक ही ब्रह्मचारी रहा हो। उसका वध लक्ष्मण ने किया है, जो स्वयं श्ोषनाग के अवतार हैं, उनके द्बारा मृत्यु होने पर उसका तो उद्धार ही हुआ है।

उल्लेखनीय है कि श्ोषनाग की सहज वृत्ति है कि वे लम्बे समय तक आहार के बिना रह सकते हैं। यानी परमसत्ता यानी परम ब्रह्म ने रामावतार में सब नीयत कर रखा था। विधि के विधान के अनुसार पुरुषोत्तम ने लीलाकर धरती को अधर्म मुक्त किया था।

राम कथा-

अलग-अलग तरह से गिनने पर रामायण की संख्या तीन सौ से लेकर एक हजार तक मिलती है, इनमें संस्कृत में महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण सबसे प्राचीन व प्रामाणिक मानी जाती है और सर्वाधिक मान्यता भी है। वर्तमान में अवधी भाषा में पंडित तुलसीदास कृत राम चरित मानस को अधिक पढ़ा जाता है। इसमें सर्वाधिक भक्ति भाव की प्रधानता है। वैसे प्रमुख रामकथा हैं- वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण, अद्भुत रामायण, रघुवंश रामायण, रामचरित मानस, दांडि रामायण आदि।

-भृगु नागर

सनातन लेख

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