विशुद्ध ज्ञान के द्योतक हैं वेद

जानिये, वेद क्या है?

वर्तमान समय में विज्ञान जैसे दुनिया को चमत्कृत कर रहा है। नित नई खोजें हो रही हैं, प्रकृति के रहस्यों से पर्दा उठाने के प्रयास किए जा रहे हैं, अंतरिक्ष की गहराइयों में उतरने का प्रयास किया जा रहा है, पहले चांद, फिर मंगल ग्रह में पहुंचने और बसने की तैयारियां चल रही हैं, गॉड पार्टीकल को पहचानने व बनाने के दावे किए जा रहे हैं, अब तो मानवों के क्लोन बनाए जा रहे हैं, हालांकि फिलहाल बहुत सी कल्पनाएं हैं, जिन्हें साकार भी किया जा चुका है और बहुत सारी कल्पनाओं के साकार होने का इंतजार किया जा रहा है, ठीक वैसे ही वेद भी वैदिक काल में चमत्कृत करते थे। उस समय से वेद ही विशुद्ध ज्ञान के द्योतक रहे है। साथ ही मनीषियों की साधना और ज्ञान का आधार भी। वेदों का अवतरण सृष्टि के आरंभकाल में ही हो गया था।

आरम्भिक काल में वेद श्रुति के रूप में व्यवहार में रहे, लेकिन कालांतर में इन्हें लिपिबद्ध किया गया। माना जाता है कि वेदों को संरक्षित करने और भलीभांति समझने के लिए वेदों से ही वेदांगों का आविष्कार किया गया था। मध्ययुग में भी इसके भाष्य (व्याख्या) को लेकर विभिन्न शास्त्रार्थ हुए थे। आरम्भिक काल में वेदों को वेदत्रयी के नाम से जाना जाता था। हालांकि आरम्भ में वेद एक ही ग्रंथ था लेकिन कालांतर में वेद को पढ़ना बहुत कठिन लगने लगा, इसलिए उसी एक वेद के तीन या चार विभाग किए गए। बहुत समय बाद इन्हें चतुर्वेद कहा जाने लगा। वर्तमान में चार वेद हैं। वास्तव में देखा जाए तो वेद सनातन धर्म का आधार हैं, वेदों को सनातन परम्परा में ईश्वरीय वाणी माना गया है। वेद संस्कृत भाषा के विद् शब्द से लिया गया है। विद् अर्थात ज्ञान। वेदों का आशय है ज्ञान के ग्रंथ। वर्तमान में ये चतुर्वेद के स्परूप में हैं। पहला वेद है ऋग्वेद, दूसरा है सामवेद, तीसरा है यजुर्वेद और चौथा है अथर्ववेद। वेदों को अपौरुषेय माना गया है।

यानी इन्हें ईश्वरकृत माना गया है। यह परमज्ञान विराटपुरुष से श्रुतिपरम्परा के जरिए सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी ने प्रा’ किया था, इसीलिए इसे श्रुति भी कहते हैं, अर्थात सुना हुआ ज्ञान। जबकि अन्य हिन्दू ग्रंथों को स्मृति माना गया हैं अर्थात स्मृति पर आधारित ग्रंथ। वैदिक युग में वेदों को पढ़ाने के लिए छह उपांगों की व्यवस्था की गई थी। इस क्रम में शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, व्याकरण और ज्योतिष के अध्ययन के बाद ही प्राचीन काल में वेदों के अध्ययन को पूरा माना जाता था। प्राचीन काल में ब्रह्मा,जैमिनी, वशिष्ठ, कात्यायन, शक्ति,पराशर, वेदव्यास, याज्ञवल्क्य आदि ऋषि वेदों के अच्छे ज्ञाता रहे हैंं। चारों वेदों के उपवेद भी बताए गए हैं। पहला है स्थापत्यवेद, इसमें वास्तु शास्त्र या वास्तुकला का उल्लेख है। दूसरा है धनुर्वेद, इसमें युद्ध कला का विवरण है। यह ग्रंथ विलु’ प्राय हैं। तीसरा है गन्धर्वेद। इसमें गायन कला। चौथा है आयुर्वेद। इसमें स्वास्थ्य विज्ञान का उल्लेख है। ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद उपवेद माने गए हैं।

मनु स्मृति के अनुसार तपस्वियों ने समाधि में महाज्ञान प्राप्त किया था, इसे सृष्टि के आध्यात्मिक अभ्युदय के लिए प्रकट किया गया था, उसी महाज्ञान को श्रुति कहते हैं, मूलत: श्रुति के दो विभाग हैं, 1- वैदिक और दूसरा तांत्रिक, वहीं मुख्य तंत्र के तीन भाग माने गए हैं, 1- महानिर्वाण तंत्र, 2- नारद पंचरात्र तंत्र, और कुलार्णव तंत्र। इसी प्रकार वेद के दो विभाग बतलाए गए हैं। 1- मंत्र विभाग और 2- ब्राह्मण विभाग। वेद के मंत्र विभाग का आशय हुआ संहिता। संहितापरक विवेचना को अरण्यक और संहितापरक भाष्य को ब्राह्मण ग्रंथ कहते है। वेदों के ब्राह्मण विभाग में अरण्यक और उपनिषद का भी समावेश है। ब्राह्मण महागंथ संख्या 13 है। ऋग्वेद के 2, यजुर्वेद के 2, सामवेद के 8 और अथर्ववेद के एक है। वैसे ब्राह्मण ग्रंथ 24 बताए जाते हैं। मुख्य ब्राह्मण ग्रंथ 5 हैं। ऋग्वेद का वरण है-1- ऐतरेव ब्राह्मण, 2- तैत्तिरीय ब्राह्मण, 3- तलवकार ब्राह्मण, 4- शतपथ ब्राह्मण और अंतिम 5- तंडय ब्राह्मण।

1-ऋग्वेद –

ऋग्वेद की रिचाओं में देवताओं की प्रार्थनाओं, स्तुतियों और देवलोक में उनकी स्थितियों का उल्लेख है। ऋग्वेद को दो तरह से बांटा गया है। पहले तरीके में इसे 1० मण्डलों में बांटा गया है। मंडलों को सूक्तों में और सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। ऋचाएं 1०52० हैं। दूसरे तरीके से ऋग्वेद में 64 अध्याय होते हैं। आठ-आठ अध्यायों को मिलाकर एक अष्टक बना है। ऐसे में आठ अष्टक बने हैं। फिर प्रत्येक अध्याय को वर्गों में बांटा गया है। वर्गों की संख्या अलग-अलग अध्यायों में अलग ही है। वर्ग संख्या 2०24 है। प्रत्येक वर्ग में कुछ मंत्र होते हैं। सृष्टि के अनेक रहस्यों का इनमें उद्घाटन किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं लेकिन वर्तमान में इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।

2- यजुर्वेद –

यजुर्वेद में यज्ञ कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 1०1 शाखाएं थीं लेकिन अब कÞवल पांच शाखाएं बची हैं, जोकि काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी। इस वेद के दो भेद हैं – कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन महर्षि वेद व्यास ने किया। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय संहिता भी है। इसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित हैं। दूसरा भेद है शुक्ल यजुर्वेद। इसे सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में दिया था। इसकी 15 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में माध्यन्दिन को जिसे वाजसनेयी भी कहते हैं मात्र प्रा’ हैं। इसमें 4० अध्याय, 3०3 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं।

3- सामवेद

वास्तव में सामवेद भारतीय संगीत का मूल ही माना जाता है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी 1००1 शाखाएं थीं, लेकिन वर्तमान में तीन ही प्रचलित हैं – कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं – आग्नेय काण्ड, ऐन्द्ग काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में 64० मंत्र हैं। महानाम्न्यार्चिक कÞ 1० मंत्र हैं। इस तरह पूर्वार्चिक में 65० मंत्र हैं। छह प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें 1225 मंत्र हैं। इसी तरह से सामवेद में 1875 मंत्र हैं।

4- अथर्ववेद

अथर्ववेद में समाजशास्त्र, विज्ञान, गणित, आयुर्वेद, कृषि विज्ञान, आदि विषयों का उल्लेख हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करता है, वहीं मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे ब्रह्म वेद भी कहते हैं। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं और चमत्कारों का भी उल्लेख किया गया है। यह 2० काण्डों में विभक्त किया गया है। अलग काण्ड में अलग-अलग सूत्र हैं और सूत्रों में मंत्र हैं। इसमें 5977 मंत्र हैं। इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हैं। अथर्ववेद का विद्बान चारों वेदों का ज्ञाता होता है।

-भृगु नागर

गुरुतत्व का वैदिक रहस्य – एक वैदिक कालीन प्रसंग

सनातन लेख

वेद पीडीऍफ़ एवं ऑडियो लिंक

१. ऋग्वेद संहिता (हिंदी -संस्कृत पीडीऍफ़ )   
२. यजुर्वेद संहिता (हिंदी -संस्कृत पीडीऍफ़ )  
३. सामवेद संहिता (हिंदी -संस्कृत पीडीऍफ़ )   
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१. ऋग्वेद  (हिंदी -संस्कृत पीडीऍफ़ ) – Part-1 / Part-2 / Part-3 / Part-4 / Part-5 / Part-6 / Part-7  
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