वैष्णो माता से पूर्व करें कौल कन्धोली व देवा माई के भी दर्शन, बाद में करें भैरव मंदिर के दर्शन

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पहला दर्शन स्थल कौल कन्धोली
जम्मू से आठ किलोमीटर दूर नगरोटा में भगवती कौल कन्धोली का मंदिर है। वैष्णो देवी यात्रा में पहला दर्शन इसे माना जाता है। मान्यता है कि यहां भगवती अन्य कन्याओं के साथ क्रीड़ा करती हैं। यह भी बताया जाता है कि गेंद ख्ोलते समय जब कन्याओं को प्यास लगी तो भगवती ने उन्हें एक कौल यानी कटोरा दिया, जिसे सूख्ो स्थान पर हिलाने से पानी निकल आया था।

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दूसरा दर्शन स्थल देवामाई

यह जम्मू से करीब 43 किलोमीटर दूर कटरा मार्ग पर ही नुमाई गांव है। नुमाई से देवमाई तक जाने के लिए पगडंडी है। इसे वैष्णो देवी का दूसरा दर्शन कहा जाता है। हालांकि अब कम ही लोग यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
इन दोनों मंदिरों के दर्शन कर भक्त कटरा पहुचते है, यहां से वैष्णो देवी के दरबार की दूरी 14 किलोमीटर है। कटरा से लगभग दो किलोमीटर दूर पेंथल सड़क पर भूमिका मंदिर है। इस स्थान से वैष्णों देवी की कलयुग की कहानी विश्ोष भूमिका बंधती है। मान्यता है कि सात सौ वर्ष पूर्व यहीं पर पंडित श्रीधर को वैष्णो देवी के कन्या रूप के साक्षात दर्शन में हुए थ्ो। इसके बाद यात्रा के दौरान आता है, वह दर्शनीय दरवाजा है, जहां के लिए मान्यता है कि दिव्य कन्या भंडारे वाले स्थान से लोप होकर इसी दर्शनीय दरवाजे होकर त्रिकूट पर्वत की ओर गई थीं। कटरा से यह स्थान लगभग एक किलोमीटर है।

बाण गंगा

कन्या रूपी महाशक्ति जब इस स्थान से होते हुए आगे बढ़ीं तो एक वानर भी उनके साथ चल रहा था। मार्ग में जब वानर को प्यास लगी तो देवी ने पत्थरों में वाण मारा तो वहां से गंगा निकली। इससे वानर ने अपनी प्यास बुझायी। इसी स्थान पर देवी ने अपने बाल धोकर संवारे थ्ो। इसलिए इसे बाल गंगा भी कहते हैं।

चरण पादुका
इस स्थान पर देवी ने रुकर पीछे की ओर देखा था। यह देखने के लिए कि भ्ौरव आ रहा है या नहीं? इस स्थान पर देवी के चरणों के चिन्ह भी बने हुए हैं।

आदि कुमारी और गर्भजून गुफा
चरण पादुका से कुछ दूर देवी ने एक तपस्वी को अपना दर्शन दिया और कहा था- हे तपस्वी, मैं यहां कुछ देर विश्राम करूंगी। कोई पूछने के लिए आए तो मत बताना। यह कह कर शक्ति पास की एक गुफा में प्रवेश कर गईं और यहां नौ माह तक तपस्या में लीन रहीं। जब भ्ौरोंनाथ कन्या की खोज करता हुआ यहां पहुंचा। उसने तपस्वी से पूछा तो तपस्वी ने कहा कि जिसे तू साधारण कन्या समझ रहा है। वह तो महाशक्ति हैं। वही आदि कुमारी है। इन्होंने सृष्टि की रचना की है। गौरतलब है कि यहां दर्शन करने के बाद वैष्णव देवी के दरबार के दर्शन करने चाहिए।

वैष्णों देवी दरबार
वैष्णो देवी मंदिर में भगवती वैष्णो पिन्डियों के स्वरूप में विराजमान हैं, डुग्गर के शत»ृंग पर्वत के चित्रकूट शिखर पर भगवती विराजमान हैं। यहां पवित्र गुफा में तीन पिन्डियां है। मध्यवर्ती पिंडी माता महालक्ष्मी की है। इन्हें वैष्णवी के नाम से भी जाना जाता है, यह भगवान विष्णु की शक्ति हैं। गुफा में दूसरी पिंडी माता महाकाली की है। महाकाली महाशक्ति का प्रधान अंग हैं। शुम्भ व निशुम्भ के साथ होने वाले युद्ध के समय ये भगवती दुर्गा के ललाट से प्रकट हुई थीं। इन्हें भगवती का आधा अंश माना जाता है। गुफा में तीसरी पिंडी महासरस्वती की है। यह वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। ये सत्वस्वरूपा और शांतिरूपिणी हैं।

भैरव मंदिर
दरबार से लौटते समय भ्ौरव मंदिर के दर्शन किए जाते हैं। यहां भ्ौरव का सिर कट कर गिरा था। मान्यता है कि भ्ौरव के दर्शन के बिना यात्रा सफल नहीं होती है।

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