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बोधगया का महाबोधि मंदिर

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बोधगया का महाबोधि मंदिर
बोधगया का महाबोधि मंदिर

bodhagaya ka mahaabodhi mandirबोधगया का महाबोधि मंदिर ;  बोधगया का महाबोधि मंदिर दुनियाभर में प्रसिद्ध है। जिसे देखने के लिए विश्व के कोने-कोने से लोग आते हैं। यह मंदिर निरंजना नदी के तट पर स्थित है और यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। विश्व भर के बौद्धों का सबसे बड़ा तीर्थ है- बोधगया। बिहार प्रदेश में गया नगर से करीब 13 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में स्थित बोधगया वह पुण्यभूमि है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ और वहीं विश्व के एक बड़े भू – भाग में फैलने वाले बौद्धधर्म का जन्म हुआ।  बुद्ध का जन्म ईसा से 544 वर्ष पूर्व कपिलवस्तु गणराज्य के राजा शुद्धोधन के यहां हुआ था वालक का नाम सिद्धार्थ था। ऐश्वर्यपूर्ण जीवन सुंदर पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल के होते हुए भी उनको संसार का मोह पाश नहीं बांध सका। मानवीय जीवन के अतीव कष्टों को देखकर उन्हें संसार से विरक्ति हो गई और वे ज्ञान की खोज में घर – बार त्याग कर जंगलों में चले गए। उरुवेला नामक स्थान पर निरंजना नदी के पास 5 वर्ष की कड़ी तपस्या करने पर शरीर अस्वस्थ होने के बावजूद भी वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं। उरुबेला के ग्रामप्रधान को पुत्री सुजाता ने उन्हें भोजन कराया। तत्पश्चात् वे पीपल के पेड़ के नीचे बैठे और समाधि लग गई। सात सप्ताह तक समाधि में रहने के बाद सिद्धार्थ को बोध हो गया, वे बुद्ध हो गये। सिद्धार्थ को बोध प्राप्त होने के कारण इस स्थान का नाम बोधगया पड़ा तथा जिस पीपल के नीचे समाधि लगी थी, वह बोधवृक्ष कहलाया। वह पेड़ ढाई हजार वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर भी आज बोध गया में मौजूद है।

सम्राट अशोक ने यहां एक मंदिर बनवाया

सम्राट अशोक ने सर्वप्रथम यहां एक मंदिर बनवाया था। अब उस मंदिर के चिह्न तो नहीं मिलते किंतु अशोक के शिलालेखों से यह पता लगता है कि बौद्धगया का सबसे महत्त्वपूर्ण स्मारक महाबोधि मंदिर है। यह भारतीय वास्तुशिल्प का उत्कृष्ठ नमूना है। इस मंदिर के शिलालेखों में यह अंकित है कि श्रीलंका, चीन और म्यांमार जैसे देशों से 7 वीं और 10 वीं शताब्दी में तीर्थ यात्री आया करते थे। चीनी यात्री फाहियान और हेनसांग ने क्रमशः 409 ई और 637 ई में बोधगया की यात्रा की थी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार महाबोधि मंदिर आज से लगभग साढ़े तेरह सौ साल पहले बना था। 170 फुट ऊंचे इस मंदिर के चार कोनों पर चार शिखर बनाए गए हैं, जो इसकी भव्यता को और भी बढ़ाते हैं। प्रांगण में अनेक स्तूप फैले हैं। मंदिर व प्रवेश द्वार बड़ा आकर्षक है। उसमें हिरण, शेर आदि के चित्र अंकित हैं। प्रांगण पार करने के बाद मुख्य द्वार है। उसके सामने गर्भगृह में भगवान बुद्ध की मूर्ति स्थापित है। बोधि वृक्ष के नीचे का चबूतरा वज्रासन कहलाता है। बोधगया में इन प्राचीन स्मारकों के अलावा कुछ नए मंदिर भी उल्लेखनीय हैं। सन् 1938 ई में तिब्बती मंदिर, सन् 1945 ई में चीनी मंदिर व बौद्ध विहार तथा थाईलैंड और वर्मा के बौद्ध धर्मावलंबियों ने यहां मंदिरों का निमार्ण कराया। ये सब इन देशों की वास्तुकला के सुंदर नमूने हैं। इसके अतिरिक्त सुजाता स्थान या दुर्गेश्वरी मंदिर, प्राचीन रलिंग, अनिमेष लोचन, लोटस टैंक, पुरातत्त्व संग्रहालय, भूटान व श्रीलंका के बौद्ध मठ आदि दर्शनीय पवित्र स्थान हैं।

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