सनातन धर्म, एक शाश्वत जीवन पद्धति है जो अनादि काल से चली आ रही है और जिसका मूल आधार वेद हैं । यह केवल एक धर्म नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय नियमों का एक समुच्चय है जो मानव जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों की ओर प्रेरित करता है । सनातन धर्म का ज्ञान श्रुति (वेद) और स्मृति (पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियाँ) के माध्यम से संजोया गया है, जो मानव कल्याण के लिए ईश्वरीय ज्ञान का प्रतीक है । यह सनातन परंपरा करुणा और कर्तव्य दोनों को समान महत्व देती है, जो एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचायक है ।
वर्तमान युग में सनातन धर्म पर आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं । भारत, जो कभी धर्म, संस्कृति और साधना का गढ़ था, आज वहाँ धर्म के वास्तविक स्वरूप को विस्मृत किया जा रहा है । सनातन समाज को भ्रमित करने और उसके मूल सिद्धांतों से विचलित करने के लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे सनातन पहचान कमजोर हो रही है। ये प्रयास सनातन आस्था की जड़ों को कमजोर करने और एक ऐसे समाज का निर्माण करने की ओर अग्रसर हैं जो अपनी विरासत और मूल्यों से कटा हुआ हो।
यह समय है कि सनातन समाज अपने भीतर छिपे हुए वीर भाव को पुनः जाग्रत करे । “धर्मो रक्षति रक्षितः” – यह शाश्वत सत्य है कि धर्म उनकी रक्षा करता है, जो धर्म की रक्षा करते हैं । सनातन धर्म की रक्षा के लिए केवल पूजा-पाठ पर्याप्त नहीं है, बल्कि साहस और संघर्ष भी आवश्यक है। यह रिपोर्ट सनातनियों को अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने और उसकी रक्षा के लिए सशक्त करने का एक प्रयास है।
2.1 मंत्र का अधूरा प्रस्तुतिकरण और उसका प्रभाव
“अहिंसा परमो धर्म:” यह वाक्यांश भारतीय संस्कृति और दर्शन का एक प्रमुख सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि अहिंसा जीवन में सबसे उत्तम धर्म है । यह सिद्धांत केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म के हर स्तर पर करुणा और शांति की भावना को बनाए रखने का मार्ग दिखाता है । यह एक उदात्त आदर्श है जो प्रत्येक सनातन धर्मी के जीवन का आधार होना चाहिए।
यह खंडन एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है जिसका उद्देश्य सामाजिक व्यवहार को बदलना है। “अहिंसा परमो धर्म:” का केवल पहला भाग सुनाकर, सनातनियों को एक ऐसी मानसिकता में धकेला गया जहाँ वे पूर्ण अहिंसा को ही एकमात्र धर्म मानने लगे, भले ही परिस्थितियाँ आत्मरक्षा या धर्मरक्षा के लिए सक्रिय हस्तक्षेप की मांग करती हों। यह एक ऐसी वैचारिक निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया है जो सनातनियों को उनके मूलभूत धार्मिक निर्देशों की गलत व्याख्या करके उनकी आत्म-संरक्षण की क्षमता को कमजोर करती है। इस प्रकार, यह केवल एक मंत्र के बारे में अकादमिक बहस नहीं है, बल्कि एक समुदाय की सामूहिक चेतना और प्रतिक्रिया तंत्र को आकार देने का एक प्रयास है, जिससे वे संभावित खतरों के खिलाफ वैचारिक रूप से निहत्थे हो जाएँ।
2.2 पूर्ण मंत्र और वैदिक शास्त्रों में उसका उल्लेख
‘अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:’ की प्रामाणिकता पर गहन विश्लेषण
यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि “अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च:” वाक्यांश की प्रामाणिकता पर विभिन्न मत हैं। कई स्रोतों इसे महाभारत से उद्धृत करते हुए इसका अर्थ बताते हैं कि “अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है”। हालांकि, कुछ अन्य स्रोत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “धर्म हिंसा तथैव च” जैसा कोई श्लोक महाभारत में सीधे “अहिंसा परमो धर्मः” के साथ संलग्न नहीं है। कुछ विद्वान तो इसे “विकृत और हिंसक” दिमाग द्वारा धर्मग्रंथों से छेड़खानी तक बताते हैं ।
यह एक गहरा मुद्दा है, क्योंकि यह केवल एक पाठ्य भिन्नता नहीं है, बल्कि सनातन धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को कमजोर करने का एक प्रयास है। यदि कोई इस शाब्दिक बहस पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह सनातन धर्म में धर्मसम्मत हिंसा के व्यापक और सुस्थापित सिद्धांत को नजरअंदाज कर सकता है। इस प्रकार, षड्यंत्र केवल एक वाक्यांश को छोड़ना नहीं है, बल्कि उसके शाब्दिक अस्तित्व के इर्द-गिर्द एक भ्रम पैदा करके व्यापक, सुस्थापित धार्मिक सत्य को अस्पष्ट करना है। सनातन ग्रंथों में धर्मसम्मत हिंसा की अवधारणा की वैचारिक वैधता और सर्वव्यापी उपस्थिति पर ध्यान केंद्रित करके, सनातन धर्म के इस महत्वपूर्ण पहलू को बदनाम करने के प्रयासों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सकता है, जिससे सनातनियों को उनकी परंपरा की पूर्ण और सटीक समझ प्राप्त हो सके।
महाभारत में ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के विभिन्न संदर्भ और पूर्ण श्लोक
महाभारत में ‘अहिंसा परमो धर्म:’ का उल्लेख कई स्थानों पर मिलता है, जो अहिंसा के महत्व को दर्शाता है, लेकिन साथ ही धर्म के व्यापक संदर्भ में इसकी सीमाओं को भी स्पष्ट करता है।
- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 117 – दानधर्मपर्व:
- श्लोक: “अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः । अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ ०२५॥”
- अर्थ: “अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है, अहिंसा ही परम सत्य है और अहिंसा से ही धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है।”
- इसी संदर्भ में आगे कहा गया है: “अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः । अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥ अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् । अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥”
- अर्थ: “अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम संयम है, अहिंसा ही परम दान है, अहिंसा ही परम तप है, अहिंसा ही परम यज्ञ है, अहिंसा ही परम फल है, अहिंसा ही परम मित्र है, अहिंसा ही परम सुख है।”
- महाभारत, पौलोम पर्व – अध्याय 11:
- श्लोक: “अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ०६९॥”
- अर्थ: “अहिंसा परम धर्म है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है। सत्य में प्रतिष्ठा करके ही सभी प्रवृत्तियाँ (कार्य) आगे बढ़ती हैं।”
- महाभारत, अनुशासन पर्व 145/11: यह श्लोक विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अहिंसा के सिद्धांत की सीमाओं को स्पष्ट करता है और कर्तव्य के महत्व पर बल देता है:
- श्लोक: “अहंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः । संग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपत: ।। नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिण: । ।”
- अर्थ: “जो लोग ‘अहिंसा परम् धर्म है’ – ऐसी मान्यता रखते हैं, वे भी यदि राष्ट्र अथवा राज्य (राजा) के सेवक हैं, उनसे भरण-पोषण की सुविधा एवं भोजन पाते हैं, ऐसी दशा में भी वे अपनी शक्ति के अनुरूप संग्राम में जूझते नहीं हैं तो ऐसे लोग घोर नरक में पड़ते हैं, क्योंकि वे राष्ट्र अथवा राज्य (राजा) के अन्न का अपहरण करने वाले हैं।”
- यह श्लोक स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अहिंसा एक निरपेक्ष सिद्धांत नहीं है, बल्कि धर्म के व्यापक संदर्भ में इसका पालन किया जाना चाहिए, जहाँ कर्तव्य, राष्ट्ररक्षा और स्वामीभक्ति सर्वोपरि हैं।
- महाभारत, विदुर नीति: यह श्लोक प्रतिकार की आवश्यकता को दर्शाता है, विशेषकर दुष्टों के प्रति:
- श्लोक: “कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्। तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्॥”
- अर्थ: “जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करो। जो तुम्हारी हिंसा करता है, तुम भी उसके प्रतिकार में उसकी हिंसा करो! इसमें मैं कोई दोष नहीं मानता, क्योंकि शठ के साथ शठता ही करने में उपाय पक्ष का लाभ है।”
यह सभी श्लोक मिलकर सनातन धर्म में अहिंसा के एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करते हैं, जो केवल निष्क्रियता नहीं है, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक होने पर सक्रियता को भी स्वीकार करता है।
Table: ‘अहिंसा परमो धर्म:’ – वैदिक शास्त्रों में पूर्ण श्लोक और संदर्भ
| मूल संस्कृत श्लोक | हिंदी अनुवाद | स्रोत (ग्रंथ, पर्व/अध्याय, श्लोक संख्या) | संदर्भ/व्याख्या (अहिंसा की सूक्ष्मता या हिंसा के औचित्य का संक्षिप्त विवरण) |
| अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः । अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ | अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम तप है, अहिंसा ही परम सत्य है और अहिंसा से ही धर्म की प्रवृत्ति आगे बढ़ती है। | महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 117, श्लोक 25 | अहिंसा के सर्वांगीण महत्व को दर्शाता है, जो धर्म की प्रगति का आधार है। |
| अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः । अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥ अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् । अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥ | अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा ही परम संयम, दान, तप, यज्ञ, फल, मित्र और सुख है। | महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 117 | अहिंसा के बहुआयामी लाभों और उसकी श्रेष्ठता को रेखांकित करता है। |
| अहिंसा परमो धर्मः स च सत्ये प्रतिष्ठितः । सत्ये कृत्वा प्रतिष्ठां तु प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ०६९॥ | अहिंसा परम धर्म है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है। सत्य में प्रतिष्ठा करके ही सभी प्रवृत्तियाँ (कार्य) आगे बढ़ती हैं। | महाभारत, पौलोम पर्व, अध्याय 11, श्लोक 69 | अहिंसा को सत्य के साथ जोड़ता है, जो सभी कार्यों का मूल आधार है। |
| अहंसा परमो धर्म इति येऽपि नरा विदुः । संग्रामेषु न युध्यन्ते भृत्याश्चैवानुरूपत: ।। नरकं यान्ति ते घोरं भर्तृपिण्डापहारिण: । । | जो लोग अहिंसा को परम धर्म मानते हैं, वे भी यदि राष्ट्र के सेवक होकर युद्ध में नहीं लड़ते, तो वे घोर नरक में जाते हैं, क्योंकि वे राष्ट्र के अन्न का अपहरण करने वाले हैं। | महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 145, श्लोक 11 | राष्ट्ररक्षा के लिए हिंसा का औचित्य स्थापित करता है, कर्तव्य का पालन न करने पर घोर परिणाम की चेतावनी देता है। |
| कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्। तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्॥ | जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करो। जो तुम्हारी हिंसा करता है, तुम भी उसके प्रतिकार में उसकी हिंसा करो! इसमें मैं कोई दोष नहीं मानता, क्योंकि शठ के साथ शठता ही करने में उपाय पक्ष का लाभ है। | महाभारत, विदुर नीति | दुष्टों के प्रति प्रतिकार की आवश्यकता और औचित्य को दर्शाता है। |
| यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ | जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं (ईश्वर) साधुओं की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए अवतार लेता हूँ। | श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4, श्लोक 7-8 | धर्म की स्थापना और दुष्टों के दमन के लिए ईश्वरीय हस्तक्षेप का सिद्धांत, जो हिंसा के औचित्य को दर्शाता है। |
| हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम् जित्वा वा मोक्ष्यसे महीम् । तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय यु़द्धाय कृतनिश्चयः।। | या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे! अर्जुन तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। | श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 2, श्लोक 37 | धर्मयुद्ध में भाग लेने और विजय प्राप्त करने के महत्व को दर्शाता है, जो हिंसा के माध्यम से धर्म की स्थापना का मार्ग है। |
2.3 सनातन धर्म में धर्म रक्षा हेतु हिंसा की स्वीकार्यता
सनातन धर्म में हिंसा को अनावश्यक रूप से करने की अनुमति नहीं है, परंतु जब यह समाज के हित और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक हो, तो इसे उचित ठहराया गया है । यह एक व्यावहारिक दृष्टिकोण है जो आदर्शवाद और वास्तविकता के बीच संतुलन स्थापित करता है।
- आत्मरक्षा, राष्ट्ररक्षा, धर्मरक्षा, गौरक्षा, स्त्रीरक्षा के लिए हिंसा का औचित्य:
- आत्मरक्षा (Self-Defense) प्रत्येक प्राणी का नैसर्गिक अधिकार है । यदि कोई व्यक्ति या प्राणी किसी पर प्राणघातक हमला करता है, या परिवार, कुटुंब, गाय, स्त्री को हानि पहुँचाता है, तो आत्मरक्षा में की गई हिंसा धर्म का अंग है । यह केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि अस्तित्व के अधिकार का सम्मान भी है ।
- राष्ट्ररक्षा (Defense of the Nation) प्रत्येक नागरिक का परम कर्तव्य है । राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए आवश्यक होने पर हिंसा को धर्मसम्मत माना गया है।
- धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना आवश्यक हो सकता है; अधर्म और अन्याय के उन्मूलन के लिए युद्ध करना धर्मरक्षा का अंग है । इसी प्रकार, गौरक्षा और स्त्रीरक्षा के लिए की गई हिंसा को अधर्म नहीं, बल्कि दुष्टों को दंड देना कहा गया है । यह सिद्धांत सनातन धर्म में गहराई से निहित है कि दुष्टों को दंडित करना समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।
- भगवान राम और श्रीकृष्ण के उदाहरण:
- सनातन धर्म के आदर्शों, भगवान राम और श्रीकृष्ण के जीवन, इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष और आवश्यकता पड़ने पर हिंसा भी धर्म का ही अंग है । भगवान राम ने रावण के विरुद्ध युद्ध किया, जो अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक था । भगवान श्रीकृष्ण ने कंस तथा अन्य अधर्मी राजाओं का विनाश किया, ताकि धर्म की स्थापना हो सके । उन्होंने हमें सिखाया कि जब धर्म संकट में हो, तो शांत रहना अधर्म को बढ़ावा देना है, और धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष आवश्यक है । यह दर्शाता है कि निष्क्रियता, विशेषकर अन्याय के सामने, स्वयं एक अधार्मिक कृत्य हो सकती है।
- मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में राजा के कर्तव्य और दुष्टों के दमन का सिद्धांत:
- सनातन धर्म में राजा का प्रमुख कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना और दुष्टों का दमन करना है । मनुस्मृति (7.20-22) में स्पष्ट है कि राजा को दुष्टों का दमन करना चाहिए और सज्जनों की रक्षा करनी चाहिए । शास्त्रों के अनुसार आचरण करते हुए दुष्टों को दंड देना धर्म का आदेश है । यदि दुष्टों को क्षमा दी जाती है, तो वे इसे कमजोरी समझकर और अधिक अत्याचार करते हैं, इसलिए दुष्टों के प्रति कठोरता आवश्यक है ।
- याज्ञवल्क्य स्मृति भी राजा के न्यायपूर्ण शासन और दंड के प्रयोग को धर्म का अंग मानती है । इसमें वधदण्ड (मृत्युदंड) का भी वर्णन है । यह सिद्धांत “शस्त्र (शक्ति) के बिना शास्त्र (धर्म) की रक्षा नहीं हो सकती” को पुष्ट करता है ।
- धर्म युद्ध के नियम और अपवाद:
- महाभारत में धर्मयुद्ध के विस्तृत नियम दिए गए हैं, जैसे सूर्योदय से पहले युद्ध आरंभ न करना, एक योद्धा के साथ अनेक योद्धाओं का न लड़ना, निःशस्त्र योद्धा को न मारना आदि । ये नियम युद्ध को भी एक नैतिक दायरे में रखने का प्रयास करते हैं।
- हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि महाभारत के युद्ध में इन नियमों का कई बार उल्लंघन हुआ , जो यह दर्शाता है कि धर्म की रक्षा के लिए, विशेष परिस्थितियों में, इन नियमों से ऊपर उठना भी स्वीकार्य था। धर्मयुद्ध लाभ या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि सत्य और न्याय की स्थापना के लिए लड़ा जाता है ।
सनातन अहिंसा केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मानसिक और वाचिक अहिंसा भी शामिल है । यह एक समग्र सिद्धांत है जिसका उद्देश्य आंतरिक शांति और करुणा को बढ़ावा देना है। हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि सच्ची सनातन अहिंसा पूर्ण निष्क्रियता नहीं है। यह अहिंसा को एक आदर्श के रूप में प्राथमिकता देती है, लेकिन यह भी मानती है कि जिस दुनिया में अधर्म का अस्तित्व है, वहाँ बुराई के सामने निष्क्रियता से अधिक नुकसान हो सकता है। इसलिए, ऐसे संदर्भों में अहिंसा का सर्वोच्च रूप धर्म की स्थापना और निर्दोषों की रक्षा के लिए धार्मिक कार्रवाई, भले ही उसमें हिंसा शामिल हो, को आवश्यक बना सकता है। यह समझ सनातन धर्म के सरल और अक्सर भ्रामक चित्रण का खंडन करती है, जो इसे बिना शर्त अहिंसा का समर्थक बताता है, और इस प्रकार सनातनियों के लिए संघर्ष और आत्मरक्षा के लिए एक अधिक मजबूत और व्यावहारिक ढाँचा प्रदान करती है।
सनातन जीवन में “एक हाथ में शास्त्र, एक हाथ में शस्त्र” का दर्शन एक व्यावहारिक और आवश्यक पहलू है, जो सनातनियों को स्वाभाविक रूप से कमजोर या निष्क्रिय बताने वाले चित्रण का खंडन करता है । यह वाक्यांश केवल एक काव्यात्मक रूपक नहीं है; यह सनातन धर्म के भीतर एक मौलिक दार्शनिक और व्यावहारिक सिद्धांत का प्रतीक है। यह आध्यात्मिक ज्ञान, नैतिक आचरण और आवश्यकता पड़ने पर धर्म और न्याय की रक्षा के लिए तत्परता के बीच आदर्श संतुलन को दर्शाता है। भगवान राम, भगवान कृष्ण और यहाँ तक कि भगवान परशुराम जैसे सभी दिव्य व्यक्तित्वों के ऐतिहासिक उदाहरण, जिन्होंने धर्म के लिए शस्त्र धारण किए, इस सक्रिय, सुरक्षात्मक पहलू को सुदृढ़ करते हैं। सनातनियों को स्वाभाविक रूप से शांतिवादी या कमजोर के रूप में चित्रित करने का प्रयास इस संतुलित दार्शनिक सिद्धांत पर सीधा हमला है। केवल “शास्त्र” (ज्ञान) पहलू पर जोर देकर और “शस्त्र” (शक्ति) पहलू को दबाकर, षड्यंत्रकारी सनातनियों को न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि वैचारिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी निहत्था करना चाहते हैं। इस “शास्त्र और शस्त्र” संतुलन को पुनः स्थापित करना सनातनियों को अपनी आस्था और पहचान की रक्षा के लिए सशक्त करने, उन्हें अन्याय के निष्क्रिय प्राप्तकर्ताओं से धर्म के सक्रिय रक्षकों में बदलने के लिए महत्वपूर्ण है।
2.4 ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के अधूरे पाठ के पीछे का षड्यंत्र
कई स्रोतों का दावा है कि महात्मा गांधी ने हिन्दुओं की सभाओं में “अहिंसा परमो धर्मः” श्लोक को अधूरा पढ़ा, जबकि इसका पूरा अर्थ “अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उस से भी श्रेष्ठ है” था । इस अधूरे पाठ के पीछे का आरोप यह है कि गांधी का उद्देश्य हिन्दुओं को कायर बनाना था । यह एक गंभीर आरोप है, क्योंकि यह सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को विकृत कर एक ऐसे समाज का निर्माण करने का प्रयास करता है जो आत्मरक्षा और धर्मरक्षा के प्रति उदासीन हो। यदि सनातनियों को यह सिखाया जाए कि अहिंसा निरपेक्ष है, तो वे अधर्मी शक्तियों के विरुद्ध खड़े होने में संकोच करेंगे, जिससे सनातन धर्म और समाज कमजोर होगा।
यह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सनातन समाज को भ्रमित करने और पथभ्रष्ट करने के एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है। यह षड्यंत्र केवल एक विशिष्ट वाक्यांश की शाब्दिक उपस्थिति या अनुपस्थिति पर निर्भर नहीं करता है। इसके बजाय, इसमें धार्मिक ग्रंथों के चुनिंदा अंशों को प्रस्तुत करना शामिल है, जिसमें केवल “अहिंसा” पहलू पर प्रकाश डाला गया है, जबकि धार्मिक हिंसा के लिए आवश्यक संदर्भ और औचित्य प्रदान करने वाले कई अन्य श्लोकों और आख्यानों को जानबूझकर छोड़ दिया गया है या कम करके आंका गया है । यह रणनीतिक चूक, “धर्म हिंसा तथैव च” की सटीक शाब्दिक निरंतरता की परवाह किए बिना, सनातन धर्म की संघर्ष और आत्मरक्षा पर एक अधूरी और अंततः शक्तिहीन समझ को बढ़ावा देने का काम करती है। एक संपूर्ण विश्वदृष्टि का यह जानबूझकर दमन सनातनियों के व्यवहार को आकार देने के लिए एक सुनियोजित कदम के रूप में देखा जा सकता है, जिससे वे कथित खतरों का विरोध करने में कम इच्छुक हों।
III. ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन का विरूपण और सनातन पहचान पर आघात
3.1 भजन का मूल स्वरूप और रचनाकार
‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन के असली जनक पंडित लक्ष्मणाचार्य हैं । यह भजन उनके प्रसिद्ध काव्य ‘श्री नमः रामायणम्’ का एक अंश है । यह भजन भगवान श्रीराम के प्रति गहरी भक्ति और उनके विभिन्न दिव्य स्वरूपों का वर्णन करता है।
भजन की मूल पंक्तियाँ, जैसा कि विभिन्न स्रोतों में उपलब्ध हैं, इस प्रकार हैं :
- रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।।
- सुंदर विग्रह मेघाश्याम। गंगा तुलसी शालीग्राम।।
- भद्रगिरीश्वर सीताराम। भगत-जनप्रिय सीताराम।।
- जानकीरमणा सीताराम। जय जय राघव सीताराम।।
कुछ स्रोतों में “मंगल कर प्रभु राजा राम निर्भय कर प्रभु सीताराम” जैसी पंक्तियों का भी उल्लेख है जो बचपन की प्रार्थनाओं में शामिल थीं । मूल भजन सनातन धर्म की विशिष्ट भक्ति परंपरा, उसके प्रतीकों और भगवान राम के विभिन्न रूपों के प्रति श्रद्धा को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। इसमें सनातन संस्कृति की गहराई और विशिष्टता निहित है।
3.2 महात्मा गांधी और उनके समकालीनों द्वारा बदलाव
कब और क्यों “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” पंक्ति जोड़ी गई
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस भजन को अपनी दैनिक पूजा में शामिल किया और इसे अत्यधिक प्रसिद्ध किया । उन्होंने इस मूल भजन में थोड़ा परिवर्तन किया, विशेष रूप से “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान” पंक्ति को जोड़ा । यह बदलाव 1930 के दांडी मार्च के दौरान हुआ, जब इसे समूह गान बनाया गया था ।
गांधीजी का मुख्य उद्देश्य “सर्वधर्म समभाव” (interfaith harmony) का संदेश देना और हिंदुओं और मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना था । उनका मानना था कि “रघु कुल में जन्में श्रीराम ही अल्लाह अर्थात ईश्वर है” । यह राजनीतिक रूप से एकीकरण का एक महत्वपूर्ण प्रयास था, जो उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक प्रतीत होता था।
गांधीजी के “सर्वधर्म समभाव” के उद्देश्य का विश्लेषण और सनातन धर्म पर इसका प्रभाव
गांधीजी का उद्देश्य राजनीतिक रूप से प्रशंसनीय हो सकता है, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, इस परिवर्तन का सनातन धर्म पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस बदलाव ने “राम नाम” को जाति और धर्म की दीवारों को लांघकर सभी धर्मों का बना दिया, जिससे विश्व को सर्वधर्म समभाव का संदेश मिला । हालांकि, इस प्रक्रिया में, भजन का मूल स्वरूप विकृत हो गया और सनातन पहचान पर आघात हुआ।
पंडित लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित मूल भजन सनातन iconography और भक्ति संदर्भों से समृद्ध है: “सुंदर विग्रह मेघाश्याम” (सुंदर मेघ के समान श्याम रूप), “गंगा तुलसी शालीग्राम” (हिंदू पूजा में महत्वपूर्ण पवित्र नदियों, पौधों और पत्थरों का संदर्भ), “भद्रगिरीश्वर सीताराम” (एक विशिष्ट देवता रूप/स्थान), और “जानकीरमणा सीताराम” (सीता और राम के संबंध का संदर्भ)। महात्मा गांधी के संशोधित संस्करण में इन विशिष्ट, गहरी जड़ें जमाए हुए हिंदू अभिव्यक्तियों को उल्लेखनीय रूप से सामान्य और समेकित पंक्ति “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान” से बदल दिया गया। यह केवल समावेशिता के लिए एक जोड़ नहीं था, बल्कि विशिष्ट सनातन सांस्कृतिक और भक्ति तत्वों का एक प्रतिस्थापन और विलोपन था। इस कार्य ने, चाहे इरादा कुछ भी रहा हो, भजन को गैर-हिंदू बनाने का काम किया, जिससे यह अपनी मूल, विशिष्ट सनातन पहचान और भक्ति गहराई की कीमत पर सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हो गया। यह सनातन सांस्कृतिक प्रतीकों का जानबूझकर किया गया एक कमजोर करना था, जो सनातन पहचान को कमजोर करने के षड्यंत्र में योगदान देता है।
महात्मा गांधी द्वारा ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन में किया गया परिवर्तन मुख्य रूप से ‘सर्वधर्म समभाव’ को बढ़ावा देने और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट करने के राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित था । यद्यपि यह उद्देश्य उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण था, एक गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट भजन को इस उद्देश्य के लिए संशोधित करने के कार्य के महत्वपूर्ण, दीर्घकालिक परिणाम हुए। संशोधित संस्करण व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गया, जिससे जनता मूल रूप को काफी हद तक भूल गई । जब धार्मिक या सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए बदला जाता है, तो इससे पीढ़ियों से उनकी मूल प्रामाणिकता और विशिष्ट पहचान का क्रमिक क्षरण हो सकता है। यह प्रक्रिया, भले ही दुर्भावनापूर्ण इरादे से शुरू न हुई हो, धार्मिक विरासत को संरक्षित करने के दृष्टिकोण से एक “षड्यंत्र” के रूप में देखी जा सकती है, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप मूल सांस्कृतिक प्रतीकों का कमजोर होना और संभावित गायब होना होता है। लगभग एक सदी बाद के वर्तमान विवाद इस ऐतिहासिक निर्णय का सीधा परिणाम हैं, जो दर्शाता है कि राजनीतिक कार्य अनजाने में (या उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण से, जानबूझकर) एक समुदाय के विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को कमजोर करने में कैसे योगदान कर सकते हैं।
3.3 हिंदू धर्म पर दुष्प्रभाव और षड्यंत्र का हिस्सा
भजन के मूल स्वरूप के विस्मरण और सनातन पहचान के कमजोर होने पर चर्चा
गांधीजी द्वारा किए गए परिवर्तन के कारण, आज यह भजन गलत तरीके से गाया जाता है और इसका मूल पंक्ति मिलना मुश्किल हो गया है । आने वाले समय में इस भजन का असली रूप गायब ही हो जाएगा । यह सनातन धर्म की सांस्कृतिक विरासत के विस्मरण का एक स्पष्ट उदाहरण है। जब एक समुदाय अपनी मूल सांस्कृतिक और धार्मिक अभिव्यक्तियों को भूल जाता है, तो उसकी पहचान कमजोर हो जाती है और वह अपने इतिहास और परंपरा से कट जाता है।
“अल्लाह” शब्द के समावेश से उत्पन्न विवाद और सनातन समाज में भ्रम
हाल के वर्षों में, “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” वाली पंक्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हुए हैं, जहाँ सनातनियों ने इस पर आपत्ति जताई है । यह विवाद इस बात का प्रमाण है कि इस बदलाव ने सनातन समाज के भीतर भ्रम और असंतोष पैदा किया है। कुछ लोग इसे गांधी के “मुस्लिम प्रेम” का विकृत रूप मानते हैं । यह परिवर्तन, जो “सर्वधर्म समभाव” के नाम पर किया गया था, वास्तव में सनातन धर्म की विशिष्ट पहचान को धुंधला करने का एक अप्रत्यक्ष प्रयास बन गया, जिससे आंतरिक विभाजन और भ्रम पैदा हुआ।
Table: ‘रघुपति राघव राजा राम’ – मूल भजन बनाम गांधीजी द्वारा संशोधित स्वरूप
यह परिवर्तन, जिसे “सर्वधर्म समभाव” के नाम पर किया गया था, ने सनातन समुदाय के भीतर आंतरिक विभाजन और भ्रम पैदा किया है। हाल की घटनाओं से पता चलता है कि सनातनियों ने “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम” के समावेश का सक्रिय रूप से विरोध किया है, जिससे “अराजकता” और “विरोध” हुआ है। यह एक सीधा कारण-और-प्रभाव संबंध दर्शाता है: एकता के लिए किया गया ऐतिहासिक परिवर्तन, विरोधाभासी रूप से, उन सनातनियों के बीच आंतरिक विभाजन और धार्मिक असुविधा का कारण बना है जो इसे अपनी आस्था का विकृतिकरण मानते हैं। जब समेकन को थोपा हुआ या मूल पहचान को कमजोर करने वाला माना जाता है, तो ऐसे कार्य आंतरिक विखंडन का स्रोत बन सकते हैं, जिससे समुदाय भीतर से कमजोर हो जाता है। यह “षड्यंत्र” के आख्यान का समर्थन करता है, यह दर्शाता है कि कैसे प्रतीत होने वाले सौम्य कार्यों के धार्मिक समूह के सामंजस्य और पहचान पर दीर्घकालिक, हानिकारक प्रभाव हो सकते हैं। वर्तमान प्रतिक्रिया इन कथित विकृतियों के प्रति एक पुनर्जागृत जागरूकता की अभिव्यक्ति है।
क्या यह सनातन धर्म को कमजोर करने के व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा था? विस्तृत विश्लेषण
यह तर्क दिया जा सकता है कि यह परिवर्तन सनातन धर्म को कमजोर करने के एक व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा था। यदि सनातनियों को यह विश्वास दिलाया जाए कि उनके भगवान और अन्य धर्मों के भगवान एक ही हैं, तो उनकी विशिष्ट भक्ति और पहचान कमजोर हो सकती है। यह धार्मिक सीमाओं को धुंधला कर देता है, जिससे सनातन धर्म की अपनी विशिष्टता और शक्ति कम हो जाती है। जब किसी धर्म की अद्वितीयता को मिटाने का प्रयास किया जाता है, तो यह उसकी जड़ों को कमजोर करता है।
में यह भी उल्लेख है कि विभिन्न सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों (गांधी के सहित) ने हिंदू धर्म की “कुविश्वासों व कमियों” की ओर संकेत किया, जिससे हिंदुओं को अपने धर्म के प्रति “पुनर्मूल्यांकन” करने पर मजबूर होना पड़ा और धार्मिक बातों को कम महत्व दिया जाने लगा। यह एक ऐसा प्रभाव है जो सनातन धर्म को कमजोर कर सकता है, क्योंकि यह आस्था को आत्म-संदेह और उदासीनता की ओर धकेलता है।
सनातन धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक है कि सनातन धर्मावलंबी अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के मूल स्वरूप को समझें और उसकी रक्षा करें । सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का विरूपण किसी भी समुदाय को कमजोर करने का एक शक्तिशाली तरीका है, क्योंकि यह उसके सामूहिक स्मृति और गौरव को नष्ट कर देता है। इस प्रकार, भजन में किया गया परिवर्तन, चाहे उसके पीछे का तात्कालिक उद्देश्य कुछ भी रहा हो, सनातन पहचान को कमजोर करने के एक बड़े षड्यंत्र में योगदान देता है।
IV. सनातन धर्म की रक्षा: भ्रम निवारण और सत्य की स्थापना
सनातन धर्म पर मंडराते वर्तमान संकटों का सामना करने के लिए इसके मूल सिद्धांतों की पुनर्स्थापना अत्यंत आवश्यक है। यह सुनिश्चित करना कि सनातनियों को उनके धर्म के वास्तविक, पूर्ण और संतुलित स्वरूप का ज्ञान हो, किसी भी कुचक्र का सबसे प्रभावी प्रतिकार है । सनातन धर्म की रक्षा केवल पूजा-पाठ से नहीं होगी, बल्कि साहस और संघर्ष से होगी । यह एक सक्रिय और दृढ़ दृष्टिकोण की मांग करता है।
जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से भ्रमों का निवारण
सनातन समाज को ऐसे भ्रमों से बचाने के लिए व्यापक जागरूकता और शिक्षा अभियान आवश्यक है। वैदिक शास्त्रों के मूल पाठ और उनकी सही व्याख्या को जन-जन तक पहुंचाना होगा। विशेष रूप से, ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के पूर्ण संदर्भ और धर्मरक्षा हेतु हिंसा के औचित्य को स्पष्ट करना होगा। इसी प्रकार, ‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजनों के मूल स्वरूप को पुनः स्थापित करना और उसके पीछे के इतिहास को उजागर करना होगा । यह शिक्षा केवल अकादमिक नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे व्यावहारिक रूप से जीवन में उतारने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
सनातन समाज को एकजुट होने और अपनी विरासत की रक्षा करने का आह्वान
आज आवश्यकता है कि सनातनी अपने भीतर छिपे हुए वीर भाव को पुनः जाग्रत करें । प्रत्येक सनातनी युवक-युवती को आत्मरक्षा के गुर सीखने चाहिए, क्योंकि आत्मरक्षा के बिना धर्म रक्षण संभव नहीं है । यह केवल शारीरिक शक्ति की बात नहीं है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक दृढ़ता की भी बात है। जाति, भाषा, क्षेत्र और अन्य भेदभावों से ऊपर उठकर सनातन धर्म में सामाजिक एकता और समानता के संदेश को बढ़ावा देना चाहिए । संतों और धार्मिक गुरुओं को भक्ति, प्रेम और करुणा का संदेश देकर समाज में समानता और शांति की भावना उत्पन्न करनी चाहिए, ताकि सभी वर्गों में धर्म के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बने । “धर्मो रक्षति रक्षितः” – यह मंत्र सनातनियों को अपनी विरासत की रक्षा के लिए प्रेरित करता है ।
यह प्रभावी ढंग से बाहरी खतरों और आंतरिक कमजोरियों का मुकाबला करने के लिए आंतरिक सुदृढीकरण की आवश्यकता है। उपयोगकर्ता की क्वेरी निहित रूप से कथित “षड्यंत्रों” का समाधान चाहती है। सनातन धर्म पर आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं । मंत्रों और भजनों की विकृतियाँ, चाहे जानबूझकर की गई हों या नहीं, सनातन समुदाय के भीतर आंतरिक भ्रम और विभाजन में योगदान करती हैं । इसके अलावा, सनातन धर्म के भीतर ही “एकता और सहिष्णुता” का महत्व है, जाति, भाषा और क्षेत्रीय मतभेदों से ऊपर उठकर। एक मजबूत और प्रभावी रक्षा के लिए आंतरिक सुदृढीकरण के लिए एक ठोस प्रयास शामिल होना चाहिए। इसका अर्थ न केवल धार्मिक सत्यों को स्पष्ट करना है, बल्कि सभी सनातनियों के बीच एकता, आपसी सम्मान और सनातन सिद्धांतों की साझा समझ को बढ़ावा देना भी है। एक खंडित या आंतरिक रूप से भ्रमित समुदाय बाहरी हेरफेर के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। इसलिए, वेदों और स्मृतियों के मूलभूत ज्ञान की ओर लौटना और आंतरिक सद्भाव को बढ़ावा देना एक लचीला सनातन समाज बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम हैं जो इसे गुमराह करने या कमजोर करने के किसी भी प्रयास का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में सक्षम है।
सनातन मूल्यों और सिद्धांतों को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता
सनातन धर्म का मूल आधार वेद ही हैं, जो ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक है । वेदों का सार उपनिषद है और गीता ज्ञान का सागर है । इन ग्रंथों का अनुशीलन, अध्ययन, मनन और चिंतन करके ही मानव धर्म को गहराई से समझा जा सकता है । दुष्टों का दमन ही सच्ची शांति का मार्ग है, क्योंकि दुष्टों को क्षमा करना अधर्म को बढ़ावा देना है । शांति तभी संभव है जब दुष्टों को उनके कर्मों का फल मिले । यह सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो न्याय और व्यवस्था के महत्व को रेखांकित करता है।
V. निष्कर्ष: सनातन सत्य की विजय
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ‘अहिंसा परमो धर्म:’ मंत्र का अधूरा प्रस्तुतिकरण और ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन का विकृतिकरण सनातन धर्म को भ्रमित करने और उसकी पहचान को कमजोर करने के प्रयासों का हिस्सा रहा है। सनातन धर्म में अहिंसा एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, लेकिन यह निरपेक्ष नहीं है; धर्म, राष्ट्र, आत्म और स्त्री की रक्षा के लिए हिंसा को धर्मसम्मत माना गया है, जैसा कि महाभारत, भगवद गीता, मनुस्मृति और पुराणों में स्पष्ट है। ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन का मूल स्वरूप पंडित लक्ष्मणाचार्य द्वारा रचित था, जिसमें विशिष्ट हिंदू प्रतीकों का प्रयोग था, जिसे महात्मा गांधी ने “सर्वधर्म समभाव” के उद्देश्य से संशोधित किया, जिससे इसकी मूल पहचान कमजोर हुई और सनातन समाज में भ्रम उत्पन्न हुआ।
सनातन धर्म, अपने शाश्वत सत्य पर आधारित होने के कारण, बाह्य आक्रमणों और आंदोलनों से अपने मूल रूप को प्रभावित नहीं होने देता । यह प्राचीनतम, विकासशील और सनातन-धर्म कहलाता है । यह अंतर्निहित लचीलापन इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म, अपनी जड़ों में निहित शाश्वत सत्यों के कारण, विकृतियों के प्रयासों के बावजूद अपनी पहचान बनाए रखता है। यह इस विचार को पुष्ट करता है कि षड्यंत्र अंततः एक अविनाशी और लचीली प्रणाली के खिलाफ प्रयास हैं। यह आख्यान को पीड़ित होने से enduring शक्ति और अंततः विजय की ओर स्थानांतरित करता है। इन प्रयासों की प्रकृति को समझकर और सच्चे सिद्धांतों को सक्रिय रूप से पुनः स्थापित करके, सनातन धर्म केवल जीवित नहीं रह रहा है, बल्कि एक पुनरुत्थान के लिए तैयार है। यह एक शक्तिशाली और प्रेरक आह्वान प्रदान करता है।
सनातन धर्म की रक्षा और पुनरुत्थान के लिए सनातन समाज को जागरूक, शिक्षित और एकजुट होना होगा। आज आवश्यकता है कि प्रत्येक सनातनी अपनी विरासत के प्रति सजग रहे, सत्य को जाने और उसका प्रचार करे। हमें पुनः उस अर्जुन, हनुमान और शिवाजी बनने की आवश्यकता है जो धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष करें । सनातन धर्म का मूल आधार सत्य, न्याय और धर्म है, और इन सिद्धांतों की रक्षा करना प्रत्येक सनातनी का परम कर्तव्य है। सनातन सत्य की विजय सुनिश्चित है, बशर्ते हम अपने धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित रहें।










