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अयोध्या की परिक्रमाएँ—भक्ति, परंपरा और मोक्ष का मार्ग

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अयोध्या, भगवान श्रीराम की जन्मभूमि, भारतीय संस्कृति में केवल एक नगर नहीं, बल्कि भक्ति, धर्म और आदर्शों की धरा है। यहाँ की परिक्रमा परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। परिक्रमा का मूल अर्थ है—दैवीय शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण। जब भक्त किसी देवस्थान की परिक्रमा करते हैं, तो वे न केवल शारीरिक रूप से चल रहे होते हैं, बल्कि आत्मा को भी पवित्र कर रहे होते हैं। अयोध्या की परिक्रमाएँ इस अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव का सर्वोच्च उदाहरण हैं।

अयोध्या में मुख्यतः तीन प्रकार की परिक्रमाएँ प्रसिद्ध हैं—पंचकोसी परिक्रमा, चौदह कोसी परिक्रमा और चौरासी कोसी परिक्रमा। इन तीनों परिक्रमाओं का महत्व अपनी-अपनी विशेषताओं के अनुरूप अलग है, लेकिन उद्देश्य एक ही—श्रीराम की भक्ति और उनके आदर्शों का अनुशीलन।

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अयोध्या की परिक्रमाएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि श्रीराम के आदर्शों को जीवन में उतारने का मार्ग हैं। इस पवित्र यात्रा में भक्ति, अनुशासन, त्याग, दया और मर्यादा—ये सभी गुण स्वतः विकसित होते हैं। जो भक्त इन परिक्रमाओं को श्रद्धा और समर्पण से पूरा करता है, उसे जीवन में सुख, शांति और मोक्ष की दिशा मिलती है।

अयोध्या आज भी वही दिव्य धरा है जहाँ रामनाम की गूँज अनादि काल से चली आ रही है। यहाँ की परिक्रमा करना वास्तव में जीवन को पवित्र करने जैसा है।

1. पंचकोसी परिक्रमा—अयोध्या की नगर-सीमा का पवित्र पथ

पंचकोसी परिक्रमा लगभग 16 किलोमीटर लंबी होती है। यह परिक्रमा अयोध्या की पारंपरिक सीमा का प्रतीक है। भक्त इसे एक ही दिन में पूरी करते हैं। इस परिक्रमा का मार्ग अयोध्या के प्रमुख मंदिरों और पवित्र स्थलों से होकर गुजरता है।

मार्ग में प्रमुख स्थल—

हनुमानगढ़ी

कनक भवन

रामकोट

राजघाट

नवाबगंज

नाका हनुमानगढ़ी

पंचकोसी परिक्रमा की विशेषता है इसकी सरलता और आध्यात्मिक शांति। रास्ते में भगवान श्रीराम, जानकी और हनुमानजी के भव्य मंदिर मिलते हैं, जहाँ भक्तों का मन भक्ति से भर उठता है। कार्तिक पूर्णिमा और चैत्र मास में यह परिक्रमा अत्यंत पुण्यदायी मानी गई है।

2. चौदह कोसी परिक्रमा—मर्यादा और तप का अनुष्ठान

चौदह कोसी परिक्रमा लगभग 42 किलोमीटर लंबी होती है। इसे चैत्र और कार्तिक महीने में किया जाता है। इस परिक्रमा को अयोध्या की विस्तृत आध्यात्मिक सीमा माना जाता है। यह परिक्रमा श्रद्धालुओं के लिए तप, संकल्प और मर्यादा का व्रत मानी जाती है।

भक्त प्रायः रात्रि भर चलते हुए इस परिक्रमा को पूरा करते हैं। रास्ते में भजन-कीर्तन, रामधुन और सत्संग से वातावरण अत्यंत दिव्य हो उठता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए चौदह कोसी परिक्रमा करता है, उसके जीवन के बड़े दोष समाप्त हो जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है।

3. चौरासी कोसी परिक्रमा—मोक्ष का महायात्रा-पथ

अयोध्या की सबसे विस्तृत और कठिन परिक्रमा है—चौरासी कोसी परिक्रमा। यह लगभग 250 किलोमीटर लंबी होती है और इसे पूरा करने में 6 से 15 दिन तक लग जाते हैं। यह परिक्रमा केवल अयोध्या तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस विशाल क्षेत्र को समेटती है जहाँ हजारों वर्षों पहले ऋषि-मुनियों ने तप किया, जहाँ रामायण काल के अनेक प्रसंग घटित हुए और जहाँ श्रीराम के चरित्र का विस्तार हुआ।

मुख्य स्थल—

सुहावनपुर

भरतकुंड

महाराजगंज

मदारपुर

खीरों

राजापुर (गोस्वामी तुलसीदासजी की जन्मस्थली)

सोंधा

हरिगढ़ी

यह परिक्रमा भक्तों को न केवल शारीरिक परीक्षा देती है, बल्कि आध्यात्मिक तप और मनोबल की भी परीक्षा लेती है। रामचरित मानस में वर्णित वन-प्रदेशों की अनुभूति इस मार्ग पर आज भी होती है। इसी कारण इसे मोक्षदायिनी परिक्रमा कहा गया है।

4. परिक्रमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

अयोध्या की परिक्रमा केवल पैदल यात्रा नहीं है; यह मन, वचन और कर्म की शुद्धि का मार्ग भी है। परिक्रमा से—

नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है

मन में शांति और स्थिरता आती है

जीवन में भक्ति और धर्म के प्रति दृढ़ता बढ़ती है

पूर्व जन्मों के दोष समाप्त होते हैं

अहंकार और व्यसन का नाश होता है

श्रीराम के आदर्शों का स्मरण होता है

परिक्रमा के दौरान भक्त निरंतर रामनाम का जप करते हैं—
“श्रीराम जय राम जय जय राम”
इस मंत्र की शक्ति मन को सात्त्विक बनाती है और वातावरण को पवित्र कर देती है।

5. परिक्रमा पर्व और परंपराएँ

अयोध्या में परिक्रमा वर्ष के अनेक पर्वों पर होती है, लेकिन मुख्य समय—

कार्तिक पूर्णिमा

चैत्र शुक्ल नवमी (रामनवमी)

दीपावली

देवोत्थान एकादशी

इन अवसरों पर लाखों श्रद्धालु अयोध्या पहुँचते हैं। पूरा शहर भक्ति, दीपों, भजन-कीर्तन और उत्साह से भर जाता है।

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