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हिंदुओं की चीखें, बांग्लादेश की खामोशी

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नई दिल्ली / ढाका। बांग्लादेश की धरती एक बार फिर अल्पसंख्यक हिंदुओं के खून से सनी दिखाई दे रही है। यह कोई एक घटना नहीं, कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक भयावह सिलसिला है, जो लगातार आगे बढ़ता जा रहा है। भारत सरकार ने अब चुप्पी तोड़ते हुए बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों की 2900 से अधिक घटनाओं की सूची बांग्लादेश सरकार के सामने रख दी है। यह सूची केवल आंकड़ों का पुलिंदा नहीं, बल्कि उन टूटे घरों, उजड़े परिवारों और बुझती हुई जिंदगियों की कहानी है, जिनकी आवाज़ अब तक दबाई जाती रही।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी हिंसा और शत्रुता को लेकर गंभीर रूप से चिंतित है। उन्होंने हाल ही में मयमनसिंह में एक हिंदू युवक की जघन्य हत्या की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा कि दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना अनिवार्य है।
मयमनसिंह से राजबाड़ी तक खून से लिखी जा रही दास्तान
बांग्लादेश के मयमनसिंह में 19 दिसंबर को ईशनिंदा के झूठे आरोप में दलित हिंदू युवक दीपूचंद्र दास को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इतना ही नहीं, उसकी मौत के बाद भी नफरत का उन्माद शांत नहीं हुआ। शव को पेड़ से लटकाकर जला दिया गया। यह घटना मानवता को शर्मसार करने वाली थी, लेकिन इसके बाद भी अत्याचार थमे नहीं।
एक हफ्ते के भीतर ही राजबाड़ी जिले के हुसैनडांगा गांव में 29 वर्षीय अमृत मंडल की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। वह अपने एक मुस्लिम मित्र सलीम शेख के साथ बाइक से जा रहा था। भीड़ ने घेरकर हमला किया। अमृत की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि सलीम गंभीर रूप से घायल है। सवाल यह है कि क्या एक हिंदू का बांग्लादेश की सड़कों पर सुरक्षित रहना अब अपराध बन चुका है?
2900 घटनाएँ: एक रिपोर्ट नहीं, एक चीख
भारत द्वारा उठाया गया यह मुद्दा केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। 2900 घटनाओं में मंदिरों पर हमले, मूर्तियों का तोड़ना, हिंदू घरों को आग लगाना, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, जबरन धर्मांतरण, अपहरण और हत्याएँ शामिल हैं। कई मामलों में पुलिस मूकदर्शक बनी रही, तो कई जगहों पर पीड़ितों को ही आरोपी बना दिया गया।
बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार घट रही है। 1971 में जहाँ हिंदू आबादी लगभग 13-14 प्रतिशत थी, वहीं आज यह सिमटकर 7 प्रतिशत से भी कम रह गई है। यह गिरावट केवल जनसंख्या परिवर्तन नहीं, बल्कि डर, पलायन और दमन की कहानी है।
चुनाव, चरमपंथ और अल्पसंख्यकों का भविष्य
भारत ने साफ कहा है कि वह बांग्लादेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का समर्थन करता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या भय के साये में जी रहे अल्पसंख्यक निष्पक्ष लोकतंत्र का हिस्सा बन सकते हैं? चरमपंथी तत्वों को खुली छूट और राजनीतिक संरक्षण मिलने के आरोप लगातार लगते रहे हैं।
हिंदू, ईसाई और बौद्ध समुदाय के लोग खुद को दूसरे दर्जे का नागरिक महसूस कर रहे हैं। कई इलाकों में त्योहार मनाने पर रोक, मंदिरों में पूजा करने में डर और स्कूलों में बच्चों को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ सामने आ रही हैं।
भारत की सख्त चेतावनी और वैश्विक अपील
रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट कहा कि भारत, बांग्लादेश से अपेक्षा करता है कि वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। भारत का यह भी मानना है कि यह केवल द्विपक्षीय मामला नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का वैश्विक प्रश्न है।
मानवाधिकार संगठनों, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और संयुक्त राष्ट्र को अब इस मुद्दे पर गंभीरता दिखानी होगी। चुप्पी अपराधियों को और साहस देती है।
हिंदुओं की चीखें, जो सीमा पार भी सुनाई दे रही हैं
बांग्लादेश के हिंदू आज पूछ रहे हैं—
क्या हमारा अपराध सिर्फ इतना है कि हम हिंदू हैं?
क्या हमारी आस्था, हमारी पहचान, हमारे मंदिर अब अपराध बन चुके हैं?
इन सवालों का जवाब केवल बांग्लादेश सरकार को ही नहीं, बल्कि पूरी सभ्य दुनिया को देना होगा। अगर आज इन 2900 घटनाओं को नजरअंदाज किया गया, तो कल यह आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है।
भारत ने सच को सामने रख दिया है। अब देखना यह है कि क्या बांग्लादेश सरकार आत्ममंथन करेगी, या फिर इतिहास एक बार फिर गवाह बनेगा कि कैसे एक समुदाय को डर और खून के साये में जीने के लिए मजबूर किया गया।

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