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ईशनिंदा के नाम पर हिंदू नरसंहार का खुला खेल, नपुंसकता का वीभत्स चेहरा

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ईशनिंदा के नाम पर हिंदुओं का संगठित शिकार, बांग्लादेश सरकार मूक-बधिर—6 महीनों में 71 हमले 

ढाका से दिल्ली तक सन्नाटा है, लेकिन बांग्लादेश की धरती पर हिंदुओं की चीखें लगातार गूंज रही हैं।
ईशनिंदा—एक ऐसा शब्द जिसे अब बांग्लादेश में कानून नहीं, बल्कि हिंदुओं को कुचलने का औजार बना दिया गया है। बांग्लादेश अल्पसंख्यक मानवाधिकार कांग्रेस (HRCBM) की ताज़ा रिपोर्ट ने उस कड़वी सच्चाई को सार्वजनिक कर दिया है, जिसे ढाका की सत्ता, वैश्विक मानवाधिकार संगठन और तथाकथित प्रगतिशील दुनिया वर्षों से ढंकती आ रही थी।

6 महीने, 71 घटनाएं और एक ही समुदाय निशाने पर

जून से दिसंबर 2025 के बीच कम से कम 71 घटनाएं, जिनमें

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  • मनगढ़ंत ईशनिंदा आरोप

  • पुलिस द्वारा त्वरित गिरफ्तारी

  • उन्मादी भीड़ की हिंसा

  • हिंदू घरों की तोड़फोड़

  • छात्रों का निलंबन व निष्कासन

  • और कुछ मामलों में मौतें तक शामिल हैं

ये आंकड़े किसी अफवाह या सोशल मीडिया पोस्ट का हिस्सा नहीं, बल्कि 30 से अधिक जिलों में फैले घटनाक्रम का दस्तावेजी प्रमाण हैं—रंगपुर, चांदपुर, चटोग्राम, दिनाजपुर, लालमोनिरहाट, सुनामगंज, खुलना, कोमिला, गाजीपुर, तंगेल, सिलहट और अन्य जिले।

मानवाधिकार समूहों का स्पष्ट निष्कर्ष है—

“यह कोई आकस्मिक हिंसा नहीं, बल्कि धार्मिक रूप से गढ़े गए आरोपों के जरिए अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की व्यवस्थित और दोहराई जाने वाली रणनीति है।”

व्यक्ति नहीं, पूरा समुदाय आरोपी

बांग्लादेश में ईशनिंदा का आरोप किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। यह आरोप पूरे हिंदू समुदाय के खिलाफ सजा का फरमान बन जाता है।

27 जुलाई 2025 को रंगपुर के बेतगरी यूनियन की घटना इसका ज्वलंत उदाहरण है।
17 वर्षीय रंजन रॉय को कथित अपमानजनक टिप्पणी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद क्या हुआ?
➡️ 22 हिंदू घरों पर हमला
➡️ संपत्ति की तोड़फोड़
➡️ परिवारों का पलायन

यह स्पष्ट संदेश था—“अगर एक हिंदू पर आरोप लगेगा, तो पूरा मोहल्ला जलेगा।”

नाबालिग भी सुरक्षित नहीं

रिपोर्ट का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि
नामजद आरोपियों में 90% से अधिक हिंदू हैं,
जिनमें 15 से 17 वर्ष के नाबालिग बच्चे भी शामिल हैं।

सोचिए—
बच्चे स्कूल जाने की उम्र में हैं, लेकिन उन्हें हथकड़ी पहनाकर थानों में घसीटा जा रहा है।
क्या यही “धर्मनिरपेक्ष बांग्लादेश” का चेहरा है?

पुलिस कानून नहीं, भीड़ के इशारे पर चलती है

एचआरसीबीएम की रिपोर्ट साफ बताती है कि कई मामलों में

  • कोई फोरेंसिक जांच नहीं

  • कोई डिजिटल सत्यापन नहीं

  • कोई निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं

बस भीड़ का दबाव, और पुलिस तुरंत गिरफ्तारी कर लेती है।

19 जून 2025 को बारीसाल में तमाल बैद्य (22)
22 जून को चांदपुर में शांतो सूत्रधार (24)
दोनों मामलों में आरोप वही—ईशनिंदा, सबूत शून्य, कार्रवाई तत्काल।

यह पुलिस नहीं, भीड़ का विस्तार विभाग बन चुकी है।

सोशल मीडिया: झूठ, साजिश और आतंक

रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश मामलों की जड़

  • कथित फेसबुक पोस्ट

  • हैक किए गए अकाउंट

  • फर्जी स्क्रीनशॉट

  • या बिना किसी डिजिटल फोरेंसिक के मौखिक आरोप हैं

इसके बावजूद
➡️ FIR दर्ज
➡️ गिरफ्तारियां
➡️ छात्रों का भविष्य तबाह

यह न कानून है, न न्याय—यह डिजिटल जिहाद के सामने राज्य का समर्पण है।

शिक्षा संस्थान बन गए शिकारगाह

बांग्लादेश के विश्वविद्यालय अब ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि धार्मिक उन्माद के अखाड़े बन चुके हैं।

  • पीयूएसटी के प्रणय कुंडू

  • खुलना विश्वविद्यालय के टोनॉय रॉय

  • नॉर्थ साउथ यूनिवर्सिटी के अपूर्बो पाल

इन सभी पर इस्लाम के अपमान के आरोप लगे और
➡️ निलंबन
➡️ निष्कासन
➡️ पुलिस हिरासत

यह शिक्षा व्यवस्था नहीं, आस्था के नाम पर आतंक का पाठ्यक्रम है।

बांग्लादेश सरकार: सबसे बड़ा आरोपी

इन 71 घटनाओं में सबसे बड़ा नाम जो बार-बार उभरता है—
बांग्लादेश सरकार की चुप्पी।

ना ठोस जांच
ना दोषियों पर कार्रवाई
ना अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

जब राज्य अपने नागरिकों की रक्षा न कर सके,
तो वह सरकार नहीं, भीड़ का गुलाम प्रशासन होता है।

यह नपुंसकता नहीं तो और क्या है?

अंतरराष्ट्रीय पाखंड

संयुक्त राष्ट्र, एमनेस्टी, ह्यूमन राइट्स वॉच—
सबकी जुबान तब चलती है जब आरोप भारत या किसी हिंदू बहुल देश पर लगाने हों।
लेकिन जब बांग्लादेश में

  • हिंदू मारे जाते हैं

  • घर जलते हैं

  • बच्चे जेल जाते हैं

तो दुनिया अचानक अंधी, बहरी और गूंगी हो जाती है।

यह सिर्फ हिंदुओं का मुद्दा नहीं

यह मामला
➡️ मानवाधिकार
➡️ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
➡️ कानून के शासन
➡️ अल्पसंख्यक सुरक्षा
का है।

आज हिंदू निशाने पर हैं,
कल कोई और होगा।

लेकिन सवाल वही रहेगा—
क्या दुनिया तब भी खामोश रहेगी?

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