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आस्था नहीं, सनातन धर्म के विरुद्ध एक सुनियोजित षड्यंत्र

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2013

हिंदू मंदिरों में साईं बाबा की प्रतिमा स्थापना : प्रश्न आस्था का नहीं, धर्म की मर्यादा का है

पिछले कुछ वर्षों में हिंदू समाज के सामने एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति उत्पन्न हुई है—
प्राचीन हिंदू मंदिरों में साईं बाबा की प्रतिमा की स्थापना।

यह विषय किसी व्यक्ति की निजी श्रद्धा का नहीं है, बल्कि
👉 हिंदू धर्म की मूल संरचना,
👉 शास्त्रीय परंपरा,
👉 देव–तत्व की वैदिक परिभाषा,
👉 और मंदिर व्यवस्था की पवित्रता
से सीधा जुड़ा हुआ है।

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सनातन धर्म में यह प्रश्न स्पष्ट है—
क्या किसी जीव (मनुष्य) को देवता बनाकर मंदिर में प्रतिष्ठित किया जा सकता है?
उत्तर है— नहीं।

इसी कारण चारों शंकराचार्य, काशी विद्वत परिषद, अखाड़ा परिषद और अनेक धर्माचार्यों ने साईं प्रतिमा स्थापना को धर्म-विरुद्ध और सनातन पर आघात बताया है।

सनातन धर्म में “देव” कौन होता है?

सनातन धर्म में “देव” कोई भावनात्मक उपाधि नहीं, बल्कि शास्त्रीय सत्य है।

देव वही हो सकता है—

  1. जिसका उल्लेख वेदों में हो

  2. जिसका वर्णन उपनिषद, पुराण, स्मृति और आगम शास्त्रों में हो

  3. जो अजन्मा, अविनाशी, सर्वव्यापक हो

  4. या जिसे शास्त्रों ने अवतार घोषित किया हो

उदाहरण

  • श्रीराम – विष्णु अवतार

  • श्रीकृष्ण – पूर्णावतार

  • शिव – महादेव

  • गणेश, दुर्गा, हनुमान – शास्त्र सिद्ध देवता

साईं बाबा का नाम किसी भी वेद, उपनिषद, पुराण, स्मृति या आगम में नहीं है।

साईं बाबा : जीवात्मा, परमात्मा नहीं

यह तथ्य असंदिग्ध है—

  • साईं बाबा का जन्म हुआ

  • वे एक निश्चित काल (1838–1918) में रहे

  • उन्होंने देह त्याग किया

  • उनकी समाधि है

अर्थात वे जीवात्मा थे।

सनातन दर्शन स्पष्ट कहता है—

  • जीवात्मा → जन्म लेने वाला, कर्म करने वाला, मृत्यु को प्राप्त

  • परमात्मा → अजन्मा, अविनाशी, सर्वशक्तिमान

👉 किसी जीवात्मा को परमात्मा के स्थान पर प्रतिष्ठित करना शास्त्रों में निषिद्ध है।

शंकराचार्यों का एकमत और निर्णायक विरोध

चारों शंकराचार्यों ने अनेक बार स्पष्ट शब्दों में कहा है—

“साईं बाबा न तो भगवान हैं, न अवतार और न ही उनकी पूजा शास्त्रसम्मत है।”

द्वारका पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती

  • साईं बाबा को देवता मानना धर्म के विरुद्ध

  • इसे हिंदू समाज को भ्रमित करने की साजिश बताया

  • कहा कि मंदिरों में उनकी मूर्ति हटनी चाहिए

ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) के शंकराचार्य

  • “हिंदू मंदिर केवल वैदिक देवताओं के लिए हैं”

  • साईं प्रतिमा को अवैध धार्मिक हस्तक्षेप कहा

काशी विद्वत परिषद

  • प्रस्ताव पारित कर कहा—

    “साईं की पूजा का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है”

👉 इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि चारों शंकराचार्य एक साथ किसी विषय पर एकमत हों—यह अपने आप में निर्णायक है।

मंदिर क्या है? — यह बुनियादी सत्य समझना होगा

हिंदू मंदिर—

  • सर्वधर्म सभा नहीं

  • सामाजिक केंद्र नहीं

  • भावनात्मक प्रयोगशाला नहीं

मंदिर है—

  • देव–ऊर्जा का केंद्र

  • आगम शास्त्रों से निर्मित स्थल

  • विशिष्ट देवता की साधना भूमि

👉 मंदिर की मूर्ति प्रतिष्ठा संविधान नहीं, शास्त्र तय करते हैं

साईं प्रतिमा स्थापना : संयोग नहीं, पैटर्न

यदि यह केवल श्रद्धा होती—

  • साईं के अलग मंदिर बनते

  • निजी पूजा तक सीमित रहती

लेकिन वास्तविकता क्या है?

  1. प्राचीन शिव, गणेश, हनुमान मंदिरों में साईं मूर्ति

  2. मूल देवता से पहले साईं की आरती

  3. शास्त्रविहीन पूजा पद्धति

  4. मंदिर प्रबंधन पर दबाव

❗ यह स्वाभाविक आस्था नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक घुसपैठ है।

वाराणसी का गणेश मंदिर प्रकरण : धर्म की पुनः स्थापना

कुछ समय पूर्व वाराणसी के प्राचीन गणेश मंदिर से साईं बाबा की प्रतिमा हटाई गई।

कारण स्पष्ट थे—

  • शास्त्रों में साईं पूजा का निषेध

  • मंदिर गणेश जी का, साईं का नहीं

  • विद्वानों और संतों का समर्थन

महंतों का कथन

“अज्ञानवश मूर्ति लगी थी, धर्म समझ में आने पर हटाई गई।”

👉 यह घटना प्रमाण है कि
साईं मूर्ति हटाना अधर्म नहीं, धर्म की रक्षा है।

“श्रद्धा सबसे बड़ी” — यह तर्क क्यों खतरनाक है?

यह तर्क बार-बार दिया जाता है—

“श्रद्धा हो तो सब ठीक है”

लेकिन—

  • बिना शास्त्र की श्रद्धा = अंधविश्वास

  • बिना मर्यादा की पूजा = धर्म का पतन

❗ सनातन धर्म में श्रद्धा शास्त्र के अधीन होती है, शास्त्र श्रद्धा के नहीं।

यह षड्यंत्र क्यों कहा जा रहा है?

विद्वानों के अनुसार इसके पीछे—

  1. देव–अवतार व्यवस्था को धुंधला करना

  2. राम–कृष्ण–शिव की विशिष्टता समाप्त करना

  3. मंदिर व्यवस्था को धर्मनिरपेक्ष प्रयोगशाला बनाना

  4. सनातन पहचान को कमजोर करना

👉 जब हर बाबा देव बन जाएगा,
तो सनातन का ढांचा ढह जाएगा।

स्पष्ट घोषणा : साईं भक्ति और साईं प्रतिमा में अंतर

यह लेख व्यक्ति की निजी आस्था के विरुद्ध नहीं है।

  • कोई साईं को माने—निजी अधिकार

  • साईं की शिक्षा पढ़े—स्वतंत्रता

❌ लेकिन—

  • हिंदू मंदिर में

  • शास्त्रविहीन रूप से

  • देवता बनाकर

  • प्रतिमा प्रतिष्ठित करना

👉 यह स्वीकार्य नहीं।

 यह आस्था का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है

  • साईं बाबा जीव थे, परमात्मा नहीं

  • उनका शास्त्रीय आधार नहीं

  • मंदिरों में उनकी मूर्ति धर्म विरुद्ध है

👉 सनातन धर्म भावुकता से नहीं, विवेक से चलता है।

आज यदि विरोध नहीं किया गया,
तो कल हिंदू मंदिरों की पहचान समाप्त हो जाएगी।

हिन्दू मंदिरों में साईं की प्रतिमा लगाना क्यों अधर्म

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