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मौन में लिपटी परंपरा: क्या शंकराचार्य धर्म-जागरण की भूमिका से पीछे हटे?

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वेदांत का ज्ञान है, जनसंवाद कहाँ है?

सनातन धर्म की परंपरा में शंकराचार्य का स्थान केवल एक मठाधीश का नहीं, बल्कि धर्मबोध, बौद्धिक नेतृत्व और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का रहा है। आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में जब चार आम्नाय पीठों की स्थापना की, तब उनका उद्देश्य केवल वेदांत का संरक्षण नहीं था, बल्कि समाज को वैचारिक रूप से एकसूत्र में बाँधना था। प्रश्न यह है कि आज, इक्कीसवीं सदी में, क्या शंकराचार्य उस भूमिका का निर्वहन कर पा रहे हैं, जिसकी अपेक्षा सनातन समाज उनसे करता है?

यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज धर्म केवल आस्था का विषय नहीं रहा; वह पहचान, संस्कृति, शिक्षा और सामाजिक आत्मविश्वास से जुड़ चुका है। ऐसे समय में यदि सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित धार्मिक पद मौन या सीमित भूमिका में दिखाई दे, तो शंका स्वाभाविक है।

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आज यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शंकराचार्य अपने शास्त्रीय दायित्वों का निर्वहन तो कर रहे हैं, लेकिन सामाजिक और वैचारिक नेतृत्व के स्तर पर उनकी सक्रियता अपेक्षा से कम है।
धर्म का पुनर्जागरण केवल मंदिरों और अनुष्ठानों से नहीं होगा; उसके लिए स्पष्ट विचार, निर्भीक वाणी और जनसंवाद आवश्यक है। यदि शंकराचार्य पुनः उस भूमिका को स्वीकार करें, जो आदि शंकराचार्य ने स्वयं निभाई थी, तो सनातन समाज को किसी बाहरी नेतृत्व की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

धर्म मौन से नहीं, बोध से जीवित रहता है।

शास्त्रीय कर्तव्य बनाम सामाजिक दायित्व

निस्संदेह, आज भी चारों शंकराचार्य पीठों में वेद, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता का अध्ययन चल रहा है। संन्यास परंपरा, गुरु-शिष्य व्यवस्था और मठीय अनुशासन जीवित हैं। शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो शंकराचार्य अपने दायित्वों का पालन कर रहे हैं।

लेकिन प्रश्न यहीं समाप्त नहीं होता।

आदि शंकराचार्य केवल ग्रंथों के व्याख्याता नहीं थे; वे सक्रिय वैचारिक योद्धा थे। उन्होंने बौद्ध, मीमांसक, शैव, वैष्णव—सभी से शास्त्रार्थ किए, समाज में भ्रम और विसंगतियों को खुलकर चुनौती दी और आवश्यकता पड़ने पर तत्कालीन सत्ता-संरचनाओं से भी टकराए। उनका सन्यास पलायन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक हस्तक्षेप था।

आज की स्थिति इससे भिन्न प्रतीत होती है।

आधुनिक समाज की अपेक्षाएँ और शंकराचार्य

आज सनातन समाज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, वे केवल दार्शनिक नहीं हैं—

  • धर्मांतरण

  • मंदिरों का सरकारी नियंत्रण

  • पाठ्यक्रमों से भारतीय दृष्टि का निष्कासन

  • इतिहास का विकृतिकरण

  • धर्म को लेकर फैली भ्रांतियाँ और आंतरिक मतभेद

इन विषयों पर समाज स्पष्ट और निर्भीक मार्गदर्शन चाहता है। अपेक्षा यह है कि शंकराचार्य—

  • धर्म संबंधी शंकाओं पर खुलकर बोलें

  • वैचारिक भ्रम को स्पष्ट करें

  • सामान्य जन के लिए धर्म को व्यवहारिक भाषा में प्रस्तुत करें

लेकिन व्यवहार में शंकराचार्य अक्सर—

  • सीमित वक्तव्य देते हैं

  • विवाद से दूरी बनाए रखते हैं

  • आधुनिक माध्यमों (मीडिया, डिजिटल मंच) से लगभग कटे हुए दिखते हैं

यहीं से यह भावना जन्म लेती है कि वे उतने सक्रिय नहीं हैं, जितना उन्हें होना चाहिए।

 कई सौ वर्षों की निष्क्रियता का प्रश्न

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पिछले लगभग पाँच सौ वर्षों में शंकराचार्य संस्था का प्रभाव सामाजिक नेतृत्व के स्तर पर क्रमशः सिमटता गया। इसके कई कारण हैं—

पहला, विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के दौरान धार्मिक संस्थाओं का आत्मरक्षण में सिमट जाना।
दूसरा, सत्ता और धर्म के बीच बढ़ती दूरी, जिससे मठ समाज-नेतृत्व से कटते गए।
तीसरा, आधुनिक शिक्षा और लोकतांत्रिक ढाँचे में धार्मिक नेतृत्व की भूमिका का पुनर्परिभाषित न हो पाना।

परंतु कारण चाहे जो भी हों, परिणाम स्पष्ट है—
शंकराचार्य अब समाज के वैचारिक केंद्र में नहीं हैं, बल्कि परिधि में खड़े दिखाई देते हैं।

क्या मौन भी एक नीति है?

कुछ विद्वान कहते हैं कि शंकराचार्य का मौन ही उनका संदेश है; वे राजनीति या भीड़-नेतृत्व के लिए नहीं बने। यह तर्क आंशिक रूप से सही है। शंकराचार्य न तो राजनेता हैं, न आंदोलनकारी।

लेकिन यहाँ एक मौलिक प्रश्न उठता है—
जब समाज दिशाहीन हो, जब धर्म को लेकर भ्रम फैला हो, तब क्या मार्गदर्शक का मौन भी धर्मसम्मत कहा जा सकता है?

उपनिषद कहते हैं— “अविद्याया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।”
यदि समाज अविद्या में भटक रहा है, तो विद्या के धारक का दायित्व केवल स्वयं तक सीमित नहीं हो सकता।

आवश्यकता: भूमिका का पुनर्जागरण

समस्या व्यक्तियों की नहीं, संस्था की भूमिका-समझ की है। आज आवश्यकता है—

  • चारों शंकराचार्यों के बीच वैचारिक समन्वय की

  • समकालीन मुद्दों पर सामूहिक वक्तव्य की

  • युवाओं और सामान्य जन से संवाद की

  • धर्म को जटिल संस्कृत शब्दों से निकालकर जीवन से जोड़ने की

शंकराचार्य यदि आगे आकर यह स्पष्ट करें कि—

  • सनातन धर्म क्या है और क्या नहीं

  • परंपरा और कुरीति में अंतर क्या है

  • आधुनिक जीवन में धर्म की प्रासंगिकता क्या है

तो धर्म का पुनर्जागरण स्वतः संभव है।

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