सनातन धर्म के इतिहास में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शंकराचार्यों की एकता स्वयं एक संदेश बन जाती है। ऐसा ही एक प्रसंग उस समय सामने आया था, जब साईं बाबा की प्रतिमा को हिंदू मंदिरों में स्थापित करने का प्रयास हुआ। उस विषय पर देश के चारों शंकराचार्य—गोवर्धन पीठ, द्वारका शारदा पीठ, ज्योतिर्मठ और श्रृंगेरी पीठ—अपने आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर एक स्वर में खड़े हुए थे।
उन्होंने स्पष्ट कहा था कि सनातन परंपरा के अनुसार मंदिरों की मर्यादा, देवस्वरूप और आगम परंपरा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह एक दुर्लभ उदाहरण था, जब शंकराचार्य परंपरा ने समाज को यह अनुभूति कराई कि जब धर्म पर आघात होता है, तब मतभेद गौण हो जाते हैं और धर्म सर्वोपरि हो जाता है।
आज पुनः वही परिस्थिति सामने खड़ी है, किंतु इस बार संकट अधिक व्यापक और गहराई लिए हुए है। सनातन धर्म केवल बाहरी आक्रमणों से नहीं, बल्कि आंतरिक शिथिलता, भ्रम और दिशाहीनता से जूझ रहा है। ऐसे समय में शंकराचार्यों की भूमिका केवल आध्यात्मिक प्रतीक तक सीमित रह जाना चिंता का विषय है। हिंदू समाज आज यह जानना चाहता है कि शंकराचार्य केवल परंपरा के संरक्षक हैं या जीवंत मार्गदर्शक भी।
आवश्यकता इस बात की है कि चारों शंकराचार्य अपने वैचारिक मतभेदों को सीमित दायरे में रखकर धर्मरक्षा के व्यापक लक्ष्य पर केंद्रित हों। यदि वे प्रत्येक माह में एक बार किसी एक पीठ पर या किसी तटस्थ स्थान पर मिलकर धर्म चर्चा करें, समसामयिक धार्मिक चुनौतियों पर विचार करें और समाज को स्पष्ट दिशा दें, तो उसका प्रभाव दूरगामी होगा। यह केवल बैठक भर नहीं होगी, बल्कि यह हिंदू चेतना के पुनर्जागरण की प्रक्रिया बन सकती है। आज हिंदू समाज में भ्रम की स्थिति है। कौन सा मार्ग शास्त्रसम्मत है और कौन सा परंपरा से विचलन—यह स्पष्ट करने वाला कोई केंद्रीय नैतिक स्वर दिखाई नहीं देता। शंकराचार्य यदि सामूहिक रूप से कुछ निर्णय लें, चाहे वह शिक्षा, पूजा पद्धति, सामाजिक आचरण, धर्मांतरण या सांस्कृतिक विकृति से जुड़े हों, तो साधारण हिंदू को यह अनुभूति होगी कि उसके पीछे एक सशक्त बौद्धिक और आध्यात्मिक नेतृत्व खड़ा है।
यह भी समझना आवश्यक है कि शंकराचार्यों की एकता का अर्थ यह नहीं कि वे अपने सिद्धांतों का त्याग करें। अपितु इसका अर्थ यह है कि वे सनातन धर्म के मूल तत्वों—वेद, उपनिषद, गीता, ब्रह्मसूत्र और आगम—की रक्षा के लिए साझा मंच पर संवाद करें। आंतरिक वैचारिक मतभेद विद्वानों के बीच संवाद का विषय हो सकते हैं, किंतु समाज के सामने एक स्पष्ट और दृढ़ संदेश जाना चाहिए।
आदि शंकराचार्य के काल में परिस्थितियाँ आज से कहीं अधिक कठिन थीं। बौद्ध मत का प्रभाव व्यापक था, वैदिक परंपराएँ कमजोर पड़ चुकी थीं और समाज बिखरा हुआ था। उस समय मठ केवल साधना के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे शिक्षण, शास्त्रार्थ और सामाजिक मार्गदर्शन के जीवंत केंद्र थे। आदि शंकराचार्य स्वयं पदयात्रा करते हुए भारतवर्ष में घूमे, शास्त्रार्थ किए, शिष्यों को प्रशिक्षित किया और चार मठों की स्थापना कर एक वैचारिक एकता की नींव रखी। यह कार्यशैली आज भी प्रेरणा देती है कि धर्म केवल ग्रंथों में सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि सक्रिय नेतृत्व से जीवित रहता है।
आज के समय में शंकराचार्यों से समाज केवल प्रवचन नहीं, बल्कि दिशा चाहता है। यदि उनके अनुयायियों के जीवन में प्रकाश आना है, तो वह केवल व्यक्तिगत साधना से नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना से आएगा। शंकराचार्यों का नियमित मिलना, धर्म पर खुली चर्चा करना और समाज के प्रश्नों पर मौन न रहना—यह सब सनातन धर्म के भविष्य के लिए अनिवार्य हो चुका है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब शंकराचार्यों ने एकता दिखाई है, तब-तब समाज में स्थिरता और आत्मविश्वास आया है। आज आवश्यकता है कि उसी इतिहास की पुनरावृत्ति हो। यह केवल शंकराचार्यों की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज के आत्मसम्मान और अस्तित्व का प्रश्न है।
प्रस्तुत- भृगु नागर










