Advertisement
Home Religious Dharm-Sanskriti त्याग और प्रेम का सच्चा मोल

त्याग और प्रेम का सच्चा मोल

0
202

एक दिन देवर्षि नारद भगवान के लोक की ओर जा रहे थे। मार्ग में उन्हें एक संतानहीन, दुःखी मनुष्य मिला। उसने विनम्र होकर कहा— “नारद जी, आशीर्वाद दे दीजिए कि मुझे संतान प्राप्त हो जाए।”
नारद बोले— “मैं भगवान के पास ही जा रहा हूँ, लौटते समय उनकी इच्छा बता दूँगा।”

भगवान से पूछने पर उत्तर मिला— “उसके पूर्व कर्म ऐसे हैं कि अभी सात जन्म तक उसे संतान का सुख नहीं मिलेगा।” यह सुनकर नारद मौन रह गए।

Advertisment

इसी बीच उसी मार्ग से एक अन्य महात्मा गुज़रे। उस व्यक्ति ने उनसे भी प्रार्थना की। महात्मा ने सहज भाव से आशीर्वाद दे दिया— और आश्चर्य! दसवें महीने उसके घर पुत्र का जन्म हो गया।

दो वर्ष बाद जब नारद लौटे तो उन्होंने वही दैवी वचन दोहराया— “भगवान ने कहा है कि अभी सात जन्म तक संतान नहीं होगी।”
यह सुनकर वह व्यक्ति मुस्कराया, अपने बालक को बुलाया और नारद के चरणों में रखकर बोला— “एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र मिला है।”

यह देखकर नारद को क्रोध आ गया। उन्हें लगा भगवान ने उन्हें झूठा सिद्ध कर दिया। वे विष्णु लोक पहुँचे और कटु शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त की। भगवान ने शांत भाव से कहा— “समय आने पर उत्तर दूँगा।”

कुछ दिन बाद भगवान ने नारद से कहा— “लक्ष्मी बीमार हैं, उनकी औषधि के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए, जाकर लाओ।”
नारद कटोरा लेकर जगह-जगह भटके, पर कोई तैयार न हुआ। अंततः वे उसी महात्मा के पास पहुँचे जिसने संतान का आशीर्वाद दिया था। भगवान की आवश्यकता सुनते ही महात्मा ने बिना क्षण भर सोचे अपना कलेजा निकालकर दे दिया।

नारद वह कलेजा भगवान के समक्ष ले आए। तब भगवान मुस्कराए और बोले—
“नारद! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए अपना कलेजा दे सकता है, उसके लिए मैं अपना विधान भी बदल सकता हूँ। तुम भी भक्त थे, पर तुमने अपना कलेजा देने का विचार तक नहीं किया, केवल दूसरों से माँगते रहे।”

भगवान ने आगे कहा— “मैं अपने भक्तों पर कृपा त्याग और प्रेम के आधार पर करता हूँ। श्रेय भी उसी अनुपात में मिलता है।”
यह सुनकर नारद का क्रोध शांत हो गया, सिर लज्जा से झुक गया।

संदेश स्पष्ट है— सच्चा प्रेम और निःस्वार्थ त्याग ही ईश्वर को भी नियम बदलने पर विवश कर देता है।
जै जै श्री राधे…

यूजीसी से टूटा भरोसा: मोदी का ‘सबका साथ’ सवालों के घेरे में

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here