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जब सवाल यूजीसी का हो, तब हिन्दू एकता के पहरेदार कहां गायब हो जाते हैं

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नई दिल्ली, 2 फरवरी (विशेष संवाददाता)। हिन्दू एकता कोई भावनात्मक पोस्टर नहीं, जिसे जरूरत के हिसाब से दीवार पर टाँग दिया जाए और काम निकलते ही उतार लिया जाए। यह कोई चुनावी नारा भी नहीं, जिसे रैली में उछाल दिया जाए और सत्ता मिलते ही भुला दिया जाए। हिन्दू एकता एक सतत सामाजिक चेतना है, जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता तब होती है, जब नीतियाँ समाज को भीतर से झकझोर रही हों।

लेकिन आज हालात यह हैं कि यूजीसी जैसे गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले मुद्दे पर वही राजनीतिक दल और नेता साइलेंट मोड में चले गए हैं, जो हर छोटे-बड़े विषय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाने में देर नहीं लगाते।

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यूजीसी के हालिया नियमों को लेकर देश के विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, छात्रों और विशेष रूप से हिन्दू समाज के एक बड़े वर्ग में असंतोष है। यह असंतोष केवल नौकरी, आरक्षण या नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे यह आशंका भी है कि शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से सामाजिक संतुलन और परंपरागत ढांचे को प्रभावित किया जा रहा है। सवाल यह है कि जब शिक्षा सीधे समाज की रीढ़ है, तब इस पर उठे सवालों को अनदेखा करना किस तरह की राजनीति को दर्शाता है?

कांग्रेस की बात करें तो उसकी भूमिका सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है। जो पार्टी हर मुद्दे पर ‘संविधान खतरे में है’ का शोर मचाती है, वह यूजीसी जैसे संवेदनशील विषय पर पूरी तरह खामोश है। राहुल गांधी, जो भारत जोड़ो यात्रा में हर वर्ग से संवाद का दावा करते हैं, यूजीसी पर हिन्दू समाज की चिंताओं पर एक स्पष्ट शब्द नहीं बोलते। प्रियंका गांधी की सक्रियता सोशल मीडिया पोस्ट और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों तक सीमित रह जाती है। कांग्रेस के बड़े नेता सन्नाटे में हैं, और पार्टी की लाइन यह बनती दिख रही है कि अगर हिन्दू समाज के भीतर से सवाल उठ रहे हैं, तो बेहतर है उन्हें अनसुना किया जाए।

दूसरी ओर भाजपा है, जिसे स्वयं हिन्दू हितों की सबसे बड़ी राजनीतिक आवाज़ माना जाता है। भाजपा के कुछ छुटभैया नेता-नेताइन जरूर टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर बयान देते दिखाई देते हैं, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व रणनीतिक चुप्पी साधे हुए है। यह वही भाजपा है, जिसने हिन्दू अस्मिता, संस्कृति और एकता के नाम पर व्यापक जनसमर्थन हासिल किया। लेकिन यूजीसी के मुद्दे पर वही पार्टी असहज नजर आती है। विडंबना यह है कि जिन्हें ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ और ‘हिन्दू एकता के पहरेदार’ कहा जाता है, उन्हें इस पूरे विवाद से कोई फर्क पड़ता हुआ नहीं दिखता। जब हिन्दू समाज के भीतर यह भावना गहराने लगी है कि उसकी आवाज़ को योजनाबद्ध तरीके से दबाया जा रहा है, तब नेतृत्व का मौन रहना केवल चूक नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश बन जाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका यहां सबसे निर्णायक हो जाती है। वे केवल सरकार के मुखिया नहीं हैं, बल्कि भाजपा का चेहरा और करोड़ों हिन्दुओं के विश्वास का प्रतीक भी हैं। उनके एक बयान से न केवल राजनीतिक बहस की दिशा बदलती है, बल्कि प्रशासनिक अमला भी सक्रिय हो जाता है। उन्होंने कई बार कहा है कि उनकी सरकार संवाद में विश्वास रखती है। तो फिर यूजीसी को लेकर उठ रहे सवालों पर वह संवाद कहां है?

यह कहना कि यूजीसी एक तकनीकी या प्रशासनिक विषय है, वास्तविकता से मुंह मोड़ने जैसा है। शिक्षा नीति कभी भी केवल तकनीकी नहीं होती। वह समाज की सोच, उसकी दिशा और उसके भविष्य को गढ़ती है। अगर किसी नीति से समाज का एक बड़ा वर्ग स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है, तो उस पर बात करना सरकार और नेतृत्व दोनों की जिम्मेदारी है। आज स्थिति यह है कि हिन्दू समाज के भीतर ही अविश्वास और भ्रम पैदा हो रहा है। जातिगत आधार पर बंटवारे की आशंका, अवसरों के असमान वितरण का डर और परंपरागत सामाजिक संतुलन के बिगड़ने की चिंता—ये सभी प्रश्न यूजीसी के बहाने फिर से सतह पर आ गए हैं। लेकिन इन प्रश्नों के उत्तर देने के बजाय राजनीतिक दल चुप्पी को ही सबसे सुरक्षित रास्ता मान रहे हैं।

इतिहास गवाह है कि जब-जब नेतृत्व ने समाज की आशंकाओं को नजरअंदाज किया है, तब-तब उसका खामियाजा लंबे समय तक भुगतना पड़ा है। हिन्दू समाज किसी से विशेषाधिकार नहीं मांग रहा, वह केवल पारदर्शिता, संवाद और सम्मान चाहता है। वह चाहता है कि उसकी एकता को केवल वोट बैंक की तरह नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति की तरह देखा जाए।

सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है, जब बड़े नेता चुप रहते हैं और हाशिये के नेता बयानबाज़ी करने लगते हैं। इससे न तो समस्या का समाधान निकलता है और न ही विश्वास बनता है। उल्टा, समाज के भीतर असंतोष और गहराता है। नेतृत्व का अर्थ ही यही होता है कि वह कठिन प्रश्नों का सामना करे, न कि उनसे बचता फिरे।

अब समय आ गया है कि हिन्दू एकता को केवल भाषणों और नारों तक सीमित न रखा जाए। यूजीसी जैसे मुद्दों पर खुलकर, स्पष्ट और निर्भीक संवाद किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या विपक्ष के बड़े नेता—सबको तय करना होगा कि वे समाज के सवालों के साथ खड़े होंगे या इतिहास में मौन साधने वालों की सूची में अपना नाम दर्ज कराएंगे।

हिन्दू एकता के लिए बोलना होगा। सोचना होगा। और सबसे जरूरी—साइलेंट मोड से बाहर आना होगा।

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