देश इस वक्त यूजीसी के मुद्दे पर उबल रहा है। विश्वविद्यालयों में असमंजस है, शिक्षक असुरक्षित हैं, छात्र भविष्य को लेकर आशंकित। लेकिन इस उबाल के बीच सबसे ठंडी चीज़ है — हिंदू एकता के कथित ठेकेदारों की प्रतिक्रिया। या यूँ कहें, प्रतिक्रिया का पूर्ण अभाव।
बीते वर्षों में “हिंदू हृदय सम्राट” और “हिंदू एकता के प्रहरी” जैसे विशेषण जितनी बार सुनने को मिले, उतनी बार शायद शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर स्पष्ट नीति नहीं दिखी। चुनावी मंचों पर हिंदू एकता का ढोल इस कदर पीटा गया कि लगा मानो यह कोई स्थायी संकल्प हो। लेकिन यूजीसी ने जैसे ही समाज के एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया, वही ढोल अचानक फट गया — और आवाज़ गायब।
यह सवाल अब टालने लायक नहीं है कि क्या हिंदू एकता सिर्फ चुनावी मौसम की उपज है? क्या यह नारा सिर्फ तभी ज़िंदा रहता है जब कैमरे ऑन हों और भीड़ तालियाँ बजा रही हो? जब अपने ही समाज के शिक्षक और छात्र सवाल पूछें, तब “नीति प्रक्रिया में है” और “हम देख रहे हैं” जैसे जुमले सामने आ जाते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, अब बात सिर्फ नीति की नहीं, भरोसे की है। हिंदू एकता की बात करने वालों को अब बोलना होगा। साफ़ बोलना होगा। क्योंकि चुप्पी को रणनीति समझना एक भारी राजनीतिक भूल हो सकती है।
इतिहास गवाह है — समाज जब खुद को उपेक्षित महसूस करता है, तो वह नारे नहीं, विकल्प खोजता है। और तब हिंदू एकता का ढोल नहीं बजता, बल्कि सत्ता की नींव हिलती है।
जब सवाल यूजीसी का हो, तब हिन्दू एकता के पहरेदार कहां गायब हो जाते हैं










