कमंडल की आड़ में मंडल का दांव: यूजीसी नियमों ने खोला मोदी सरकार का राजनीतिक एजेंडा, 2029 की राह हुई और कठिन
कमंडल की राजनीति के सहारे सत्ता के शिखर तक पहुँची भारतीय जनता पार्टी अब उसी रास्ते पर फिसलन महसूस कर रही है। हालिया यूजीसी नियमों को लेकर उठा विवाद केवल शैक्षणिक या प्रशासनिक नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपा राजनीतिक गणित अब खुलकर सामने आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक बार फिर “वीपी सिंह पार्ट टू” की संज्ञा दी जाने लगी है—ऐसे नेता के रूप में, जिसने सामाजिक संतुलन साधने के नाम पर एक बड़े सामाजिक वर्ग को असंतोष की आग में झोंक दिया। यूजीसी नियमों को लेकर मोदी सरकार की मंशा पर सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से रोक लगाई, उसने न केवल सरकार की जल्दबाजी उजागर की, बल्कि यह भी संकेत दे दिया कि यह फैसला महज सुधार नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग था। इस प्रयोग का लक्ष्य साफ था—पिछड़ा वर्ग। सपा, बसपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी। सरकार को उम्मीद थी कि शैक्षणिक और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव कर वह पिछड़ों के बीच यह संदेश दे सकेगी कि भाजपा ही उनकी असली हितैषी है।
लेकिन इस तथाकथित “वौद्धिक विश्लेषण” में एक बड़ी चूक हो गई। मोदी सरकार यह भूल गई कि जिन सवर्णों के मजबूत समर्थन के बल पर भाजपा 2014 से सत्ता के शीर्ष पर पहुंची, वही सवर्ण अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हिन्दू एकता का नारा देने वाली सरकार द्वारा यूजीसी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर उठाया गया कदम सवर्ण समाज के लिए सीधे आघात के रूप में देखा जा रहा है। यह आघात ऐसा है, जिसे सवर्ण समाज जल्दी भूलने के मूड में नहीं दिख रहा।
राजनीतिक हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार अपने संगठनात्मक ढांचे और व्यक्तिगत लोकप्रियता के बल पर एक बार फिर जीत दर्ज कर सकती है। इससे योगी का कद और भी विशाल होगा, इसमें संदेह नहीं। लेकिन सवाल योगी का नहीं, सवाल मोदी का है। 2029 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह फैसला कितना भारी पड़ेगा, इसका पूरा अंदाजा शायद खुद भाजपा नेतृत्व भी अभी नहीं लगा पा रहा है।
मोदी सरकार का आकलन यह माना जा रहा है कि सवर्ण चाहे जितना हल्ला मचा लें, भाजपा का पिछड़ा वोट बैंक मजबूत हो जाएगा और सत्ता संतुलन बना रहेगा। लेकिन जमीनी राजनीति इससे अलग कहानी कह रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सवर्ण समाज के सामने अब दो स्पष्ट विकल्प उभर रहे हैं। पहला—नोटा। दूसरा—उत्तर प्रदेश में मायावती जैसी सशक्त नेता का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन।
मायावती को लेकर सवर्ण समाज में जो स्मृतियाँ हैं, वे पूरी तरह नकारात्मक नहीं हैं। उनके शासनकाल में प्रशासनिक सख्ती थी, कानून व्यवस्था पर नियंत्रण था और खासकर ब्राह्मण समाज को कोई विशेष परेशानी नहीं झेलनी पड़ी थी। यही कारण है कि 2029 की ओर बढ़ते राजनीतिक परिदृश्य में मायावती एक बार फिर सवर्णों के लिए “कम नुकसान वाला विकल्प” बनकर उभर सकती हैं। यदि सवर्ण समाज नोटा का रास्ता चुनता है, तो यह भाजपा के वोट प्रतिशत में सीधी और निर्णायक गिरावट का कारण बनेगा। यह गिरावट सीटों में तब्दील हो या न हो, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक लाभ कांग्रेस को अवश्य मिलेगा। वही कांग्रेस, जिससे मोदी सरकार पिछले एक दशक से निरंतर संघर्ष कर रही है। कांग्रेस को भले ही प्रत्यक्ष रूप से सवर्णों का संगठित समर्थन न मिले, लेकिन भाजपा के कमजोर होते वोट प्रतिशत से उसे सांस लेने की जगह जरूर मिल जाएगी।
उधर मुस्लिम वोट बैंक की तस्वीर भी एकरंगी नहीं रह गई है। ओवैसी जैसे नेता मुस्लिम मतों को विभाजित कर रहे हैं। कुछ वोट ओवैसी के साथ जाएंगे, कुछ पारंपरिक दलों के साथ और कुछ रणनीतिक रूप से भाजपा विरोधी खेमे में बिखरेंगे। यह बिखराव भाजपा के लिए राहत की बजाय नई चुनौती बन सकता है, क्योंकि विपक्षी गठजोड़ को अप्रत्याशित लाभ मिल सकता है।
कुल मिलाकर, यूजीसी नियमों का मुद्दा अब शिक्षा से निकलकर सीधे सत्ता के केंद्र तक पहुंच चुका है। यह फैसला मोदी सरकार की उस सोच को उजागर करता है, जिसमें कमंडल की राजनीति के भीतर मंडल का दांव खेला गया। लेकिन इस दांव में अगर सवर्ण समाज पूरी तरह खिसक गया, तो 2029 का चुनाव मोदी के लिए अब तक की सबसे कठिन परीक्षा बन सकता है। हिन्दू एकता के नाम पर सत्ता में आई सरकार अगर उसी एकता को आहत करती है, तो उसका राजनीतिक मूल्य चुकाना तय है—और शायद यह मूल्य उम्मीद से कहीं अधिक बड़ा हो।
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