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घूसखोर पंडित प्रकरण: योगी की सख़्ती बनाम मोदी की चुप्पी

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 क्या सामान्य वर्ग अब सत्ता की प्राथमिकता से बाहर हो चुका है?

नई दिल्ली, 7 फरवरी, (भृगु नागर )। घूसखोर पंडित प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि देश की राजनीति में नैतिकता, जवाबदेही और सामाजिक संतुलन की असली जिम्मेदारी कौन उठा रहा है। निर्देशक नीरज पांडेय द्वारा नाम हटाने पर राज़ी होना किसी आत्मग्लानि या वैचारिक सुधार का परिणाम नहीं था, बल्कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर का सीधा असर था। साफ़ है कि ऐसे मामलों में “मोटी चमड़ी” वाले लोग तभी झुकते हैं, जब कानून उनके दरवाज़े पर दस्तक देता है।

इस पूरे घटनाक्रम में अगर कोई बात सबसे ज़्यादा चौंकाती है, तो वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की चुप्पी। देशभर में विरोध हुआ, सामाजिक संगठनों से लेकर आम नागरिकों तक ने आपत्ति दर्ज कराई, यहां तक कि मायावती जैसी नेता ने भी घूसखोर पंडित का विरोध किया, लेकिन केंद्र सरकार टस से मस नहीं हुई। न प्रधानमंत्री का कोई बयान आया, न सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कोई ठोस कार्रवाई की, और न ही बीजेपी के किसी सांसद ने खुलकर विरोध दर्ज कराया।

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यह चुप्पी क्या संयोग है या सोची-समझी रणनीति? सवाल यह भी उठता है कि क्या अब बीजेपी के ब्राह्मण सांसदों पर “लगाम” कस दी गई है, या वे इस डर में हैं कि कहीं प्रधानमंत्री नाराज़ न हो जाएं। जिस पार्टी ने लंबे समय तक स्वयं को सनातन और हिंदू हितों का रक्षक बताया, वही पार्टी आज ऐसे मुद्दों पर मौन साधे हुए है, जहां हिंदू आस्था, सामाजिक मर्यादा और सामान्य वर्ग का स्वाभिमान सीधे तौर पर चोटिल हो रहा है।

योगी आदित्यनाथ ने यह दिखा दिया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो सनातन विरोधी इकोसिस्टम पर लगाम लगाई जा सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई यह संदेश देती है कि राज्य स्तर पर अब भी संवेदनशीलता और जवाबदेही बची हुई है। लेकिन यही सवाल केंद्र सरकार से भी पूछा जाना चाहिए—अगर योगी कार्रवाई कर सकते हैं, तो मोदी क्यों नहीं?

स्थिति और गंभीर तब हो जाती है, जब इसे यूजीसी के हालिया नियमों के संदर्भ में देखा जाए। केंद्र सरकार ने जिस एकमात्र मोर्चे पर सक्रियता दिखाई, वह सामान्य वर्ग को प्रभावित करने वाले यूजीसी नियम हैं, जिन्हें व्यापक रूप से सामान्य वर्ग पर अत्याचार के रूप में देखा जा रहा है। राहत अंततः अदालत से मिली, जिसने हस्तक्षेप कर असंतुलन को रोका। यह अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि सरकार की नीतियां किस दिशा में जा रही हैं और किसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

संसद में दिए गए भाषणों और सार्वजनिक मंचों पर किए गए दावों के बावजूद, ज़मीनी सच्चाई यह है कि सामान्य वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। जब समाज के एक बड़े वर्ग को यह लगने लगे कि उनकी “कब्र खोदी जा रही है” और सत्ता का शीर्ष नेतृत्व उस ओर देख तक नहीं रहा, तो यह केवल राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि विश्वास का संकट बन जाता है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भूमिका भी इस पूरे प्रकरण में सवालों के घेरे में है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर लगातार ऐसी सामग्री परोसी जा रही है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान होता है, पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को विकृत रूप में दिखाया जाता है, और देव-भाभी जैसे पवित्र संबंधों को कलंकित किया जाता है। यह सब किसकी निगरानी में हो रहा है? अगर मंत्रालय मौजूद है, तो उसकी कार्रवाई ज़मीन पर क्यों नहीं दिखती?

यह विडंबना ही है कि जिस देश में धार्मिक भावनाओं को लेकर आम आदमी पर तुरंत कार्रवाई हो जाती है, उसी देश में बड़े प्लेटफॉर्म्स और प्रभावशाली निर्माताओं पर सरकार की चुप्पी बनी रहती है। यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल इसलिए भी ज़्यादा गंभीर हैं, क्योंकि वे स्वयं को एक सशक्त, निर्णायक और सांस्कृतिक रूप से सजग नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण में उनकी निष्क्रियता यह संदेश देती है कि या तो उन्हें इन मुद्दों की गंभीरता समझ नहीं आ रही, या फिर वे जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं।

आज हालात यह हैं कि राज्य सरकारें मोर्चा संभाल रही हैं और केंद्र सरकार तमाशबीन बनी हुई है। समान्य वर्ग की उपेक्षा, हिंदू आस्थाओं पर हमले और सांस्कृतिक विकृति के बीच अगर सत्ता मौन रहे, तो यह केवल राजनीतिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक पतन भी माना जाएगा।

घूसखोर पंडित प्रकरण अब सिर्फ एक फिल्म या एक बयान तक सीमित नहीं रहा। यह उस व्यापक सोच का प्रतीक बन चुका है, जिसमें सत्ता की प्राथमिकताएं साफ़ तौर पर सवालों के घेरे में हैं। चुप्पी अब तटस्थता नहीं, बल्कि पक्षधरता मानी जा रही है—और यही मोदी सरकार के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक और नैतिक खतरा है।

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