संस्कृत को विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं सुव्यवस्थित भाषाओं में स्थान प्राप्त है। वैदिक काल से लेकर आज तक यह भाषा न केवल धार्मिक और दार्शनिक विमर्श की धुरी रही है, बल्कि ज्ञान-विज्ञान, गणित, खगोल, आयुर्वेद और व्याकरण जैसे विविध क्षेत्रों की आधारशिला भी बनी। ऋग्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में संस्कृत का जो रूप मिलता है, वह इसकी प्राचीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सहस्राब्दियों पूर्व रचित मंत्र आज भी उसी शुद्धता के साथ उच्चारित किए जाते हैं, यह इस भाषा की संरचनात्मक स्थिरता को दर्शाता है।
संस्कृत को केवल प्राचीन होने के कारण महत्त्व नहीं मिला, बल्कि इसकी वैज्ञानिक संरचना ने इसे विशेष बनाया। व्याकरणाचार्य पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी विश्व की सर्वाधिक परिष्कृत व्याकरणिक कृति मानी जाती है। इसमें ध्वनि, शब्द, रूप और वाक्य की संरचना को सूत्रबद्ध और गणितीय ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पाणिनि ने भाषा को नियमों के ऐसे तंत्र में बाँधा, जो आज के एल्गोरिद्म की अवधारणा से मेल खाता है। उनके सूत्र छोटे, सटीक और तार्किक हैं—जैसे किसी कम्प्यूटर प्रोग्राम के निर्देश। संस्कृत की परिष्कृतता का एक बड़ा कारण इसकी ध्वन्यात्मकता है। जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है। वर्णमाला वैज्ञानिक क्रम में व्यवस्थित है—कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य और ओष्ठ्य ध्वनियों के आधार पर। यह वर्गीकरण उच्चारण-स्थान के अनुसार किया गया है, जो ध्वनि-विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत उन्नत है। आधुनिक भाषाओं में जहाँ अपवाद अधिक मिलते हैं, वहीं संस्कृत में नियम प्रधान हैं और अपवाद अत्यल्प। यही कारण है कि इसे ‘देववाणी’ के साथ-साथ ‘वैज्ञानिक भाषा’ भी कहा जाता है।
कम्प्यूटर भाषा और संस्कृत के बीच समानता का विषय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कम्प्यूटर भाषाएँ—जैसे C, Java या Python—स्पष्ट निर्देशों और तार्किक संरचना पर आधारित होती हैं। उनमें अस्पष्टता के लिए स्थान नहीं होता। संस्कृत की वाक्य-रचना भी अत्यंत स्पष्ट और नियमबद्ध है। संधि, समास और प्रत्यय के माध्यम से शब्दों का निर्माण अत्यंत व्यवस्थित ढंग से होता है। उदाहरण के लिए, धातु से शब्द निर्माण की प्रक्रिया किसी ‘फंक्शन कॉल’ की तरह है—जहाँ मूल धातु में उपसर्ग और प्रत्यय जोड़कर नया अर्थ निर्मित किया जाता है।
संस्कृत की एक विशेषता इसकी लचीली वाक्य-रचना है। विभक्तियों के कारण शब्दों का क्रम बदलने पर भी अर्थ नहीं बदलता। जैसे—“रामः वनं गच्छति” और “वनं गच्छति रामः” दोनों का अर्थ समान है। यह संरचनात्मक स्वतंत्रता कम्प्यूटर प्रोसेसिंग में भी सहायक सिद्ध हो सकती है, क्योंकि अर्थ-निर्धारण शब्द-क्रम पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि व्याकरणिक चिह्नों पर आधारित होता है। संस्कृत की तार्किकता ने आधुनिक वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकर्षित किया। कई शोधों में यह मत व्यक्त किया गया कि संस्कृत की संरचना कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और प्राकृतिक भाषा संसाधन (NLP) के लिए अनुकूल हो सकती है। कारण यह है कि इसमें शब्द-निर्माण और अर्थ-निर्धारण के नियम स्पष्ट और सूत्रबद्ध हैं। पाणिनि के व्याकरण को यदि कम्प्यूटर कोड के रूप में देखा जाए, तो यह ‘रूल-बेस्ड सिस्टम’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रतीत होता है। संस्कृत केवल व्याकरण की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि शब्द-संपदा की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है। एक ही धातु से अनेक अर्थों वाले शब्द बनाए जा सकते हैं। इससे भाषा में सटीक अभिव्यक्ति की क्षमता विकसित होती है। दार्शनिक ग्रंथों में सूक्ष्मतम विचारों को भी अत्यंत स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया गया है। यही कारण है कि उपनिषदों, गीता और अन्य ग्रंथों की दार्शनिक गहराई आज भी प्रासंगिक है।
आज के डिजिटल युग में जब विश्व कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर अग्रसर है, तब संस्कृत की संरचनात्मक स्पष्टता उसे पुनः चर्चा के केंद्र में ला रही है। यदि किसी भाषा को ‘परिस्कृत’ कहा जाए, तो उसमें तार्किकता, स्पष्टता, नियमबद्धता और अभिव्यक्ति की सटीकता होनी चाहिए—ये सभी गुण संस्कृत में विद्यमान हैं। प्राचीनता और आधुनिकता का ऐसा अद्भुत संगम विरले ही देखने को मिलता है। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि संस्कृत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं की भी भाषा है। इसकी वैज्ञानिक संरचना और व्याकरणिक परिपूर्णता इसे विश्व की सर्वाधिक परिष्कृत भाषाओं में स्थापित करती है। जिस भाषा ने सहस्रों वर्षों तक अपने मूल स्वरूप को सुरक्षित रखा हो और जो आज भी कम्प्यूटर युग में प्रासंगिक प्रतीत हो, वह निश्चय ही मानव सभ्यता की अमूल्य निधि है।
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