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जातिवाद की आग में भाजपा!

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हिंदू एकता की ताकत पर सत्ता तक पहुंची भाजपा के सामने अब अपनी ही नीतियों से सामाजिक आधार खिसकने का खतरा

2027 और 2029 के चुनावों में भारी पड़ सकती है जातिगत राजनीति

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत क्या रही है? इसका एक बड़ा जवाब है हिंदू एकता। जातियों में बंटे हिंदू समाज को एक साझा सांस्कृतिक पहचान के सूत्र में पिरोने की कोशिश ने भाजपा को राजनीतिक विस्तार दिया। उत्तर प्रदेश में इस रणनीति का सबसे बड़ा लाभ मिला। लेकिन आज सवाल यह है कि जिस सामाजिक एकता के बल पर भाजपा सत्ता के शिखर तक पहुंची, क्या उसकी अपनी नीतियां उसी एकता को कमजोर करने का कारण बन रही हैं? यदि ऐसा है तो यह भाजपा के लिए किसी विपक्षी दल की चुनौती से कम नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सामने यह सवाल गंभीरता से खड़ा हो चुका है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून में 2018 के संशोधन और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के 2026 के नए समता नियमों को लेकर पैदा हुआ विवाद इसी चिंता को उजागर करता है। इन फैसलों के उद्देश्यों और कानूनी संदर्भों पर बहस हो सकती है, लेकिन यह अनदेखा नहीं किया जा सकता कि इनके राजनीतिक और सामाजिक प्रभावों को लेकर एक वर्ग में असंतोष है। यही असंतोष भाजपा के लिए भविष्य की चुनौती बन सकता है।

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सामाजिक न्याय या राजनीतिक जोखिम?

अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून का उद्देश्य वंचित समुदायों को जातिगत उत्पीड़न से सुरक्षा देना है। वर्ष 2018 में केंद्र सरकार ने संशोधन करके इस कानून के तहत गिरफ्तारी और अग्रिम जमानत से जुड़े प्रावधानों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पुरानी व्यवस्था को बहाल करने की दिशा में कदम उठाया था। सरकार का तर्क था कि इससे कानून की प्रभावशीलता बनी रहेगी और कमजोर वर्गों को सुरक्षा मिलेगी।

इस उद्देश्य को खारिज नहीं किया जा सकता। किसी भी सभ्य समाज में जातिगत अत्याचार के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन कानून की कठोरता, उसके निष्पक्ष क्रियान्वयन और उसके संभावित दुरुपयोग को लेकर उठने वाली आशंकाओं पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। न्याय का अर्थ केवल पीड़ित को संरक्षण देना नहीं, बल्कि निर्दोष व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना भी है।

राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि वह दोनों पक्षों के बीच विश्वास बनाए। यदि किसी कानून को लेकर समाज का एक वर्ग अपने आपको असुरक्षित या उपेक्षित महसूस करने लगे, तो सरकार को संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से उसकी आशंकाएं दूर करनी चाहिए। असंतोष को केवल राजनीतिक विरोध बताकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है।

यूजीसी के नियमों ने बढ़ाई चिंता

उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को नए समता नियम अधिसूचित किए। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में भेदभाव के विरुद्ध शिकायत निवारण की व्यवस्था मजबूत करना था। लेकिन नियमों की संरचना, शिकायतों के संभावित दुरुपयोग और सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के संरक्षण से जुड़े सवालों पर विवाद खड़ा हो गया।

विवाद इतना बढ़ा कि 29 जनवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों पर रोक लगा दी। अदालत ने इनके संभावित व्यापक प्रभावों और सामाजिक विभाजन से जुड़े सवालों पर विचार करने की आवश्यकता जताई। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने भी न्यायालय को बताया कि नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।

यह घटनाक्रम बताता है कि सामाजिक न्याय जैसे संवेदनशील विषय पर केवल नियम अधिसूचित कर देना पर्याप्त नहीं है। नियम ऐसे होने चाहिए जिनसे भेदभाव के शिकार लोगों को वास्तविक सुरक्षा मिले और किसी दूसरे वर्ग को मनमाने व्यवहार की आशंका न सताए। शिकायतों की निष्पक्ष जांच, सभी पक्षों को सुनने की प्रक्रिया और जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था विश्वास कायम करने के लिए आवश्यक हैं।

यही वह बिंदु है जहां सरकार को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए। सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि नीति के क्रियान्वयन में संतुलन नहीं दिखाई देता, तो उसका विरोध स्वाभाविक है।

विपक्ष की राह पर भाजपा?

जातिगत राजनीति भारतीय राजनीति की पुरानी सच्चाई है। विपक्षी दल लंबे समय से जातिगत समीकरणों के आधार पर चुनावी रणनीतियां बनाते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीति में पिछड़े वर्गों और अन्य जातीय समूहों की लामबंदी इसका उदाहरण रही है। दूसरी ओर भाजपा ने भी सामाजिक प्रतिनिधित्व, पिछड़े वर्गों तक पहुंच और विभिन्न जातियों को साथ लाने की रणनीति अपनाई है।

इसलिए यह मानना उचित नहीं होगा कि जातिगत राजनीति केवल विपक्ष करता है। भाजपा भी चुनावी राजनीति में जातीय समीकरणों से अछूती नहीं रही। अंतर यह है कि भाजपा ने अपनी व्यापक राजनीतिक पहचान में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदू एकता को प्रमुख स्थान दिया। इसी पहचान ने उसे अलग-अलग जातीय समूहों के बीच साझा राजनीतिक आधार बनाने में मदद की।

अब यदि सरकारी फैसलों की वजह से जातिगत पहचानें एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ी होती दिखाई दें, तो भाजपा की अपनी विचारधारा और राजनीतिक व्यवहार के बीच टकराव का सवाल उठेगा। हिंदू समाज में ऐतिहासिक असमानताओं को नकारकर एकता नहीं बनाई जा सकती, लेकिन उनका समाधान इस तरह भी नहीं होना चाहिए कि सामाजिक अविश्वास और गहरा हो जाए।

भाजपा को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय के नाम पर किसी वर्ग की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी करना जितना गलत है, उतना ही गलत किसी दूसरे वर्ग की आशंकाओं को महत्वहीन मान लेना भी है। सरकार का काम समाज को न्याय देना है, समाज को स्थायी खांचों में बांटना नहीं।

2027 की परीक्षा, 2029 का संकेत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भाजपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा होंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश की राजनीति में कानून-व्यवस्था, विकास, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समीकरणों की अहम भूमिका है। ऐसे में केंद्र सरकार के फैसलों से पैदा होने वाला असंतोष प्रदेश की चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि, यह मान लेना भी जल्दबाजी होगी कि इन मुद्दों के कारण भाजपा निश्चित रूप से चुनाव हार जाएगी। चुनावी नतीजे अनेक कारकों पर निर्भर करते हैं। संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, सरकार का कामकाज, विपक्ष की रणनीति और मतदाताओं की प्राथमिकताएं भी निर्णायक होती हैं। फिर भी भाजपा के लिए यह खतरे की घंटी है कि कहीं जातिगत असंतोष उसके व्यापक सामाजिक गठबंधन को कमजोर न कर दे।

यदि 2027 में पार्टी को नुकसान होता है, तो उसका असर 2029 के लोकसभा चुनाव की रणनीति पर भी पड़ सकता है। लेकिन इससे आगे की राजनीतिक पराजय की अभी से निश्चित भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या भाजपा समय रहते अपनी नीतियों और उनके सामाजिक प्रभावों की समीक्षा करेगी?

मोदी को समझनी होगी जमीन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक सफलता का एक आधार यह रहा है कि उन्होंने अलग-अलग सामाजिक वर्गों को विकास और राष्ट्रीय पहचान के साझा विमर्श से जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन कोई भी राजनीतिक पूंजी स्थायी नहीं होती। जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए नीतियों में संवेदनशीलता, न्याय और संवाद आवश्यक हैं।

यदि किसी फैसले से समाज में विभाजन की आशंका पैदा होती है, तो सरकार को उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय सुधार का अवसर मानना चाहिए। कानून का उद्देश्य किसी जाति को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना नहीं, बल्कि अन्याय रोकना होना चाहिए। यूजीसी के नियमों में भी ऐसी व्यवस्था जरूरी है जो भेदभाव के विरुद्ध प्रभावी हो और शिकायतों के निष्पक्ष निस्तारण की गारंटी दे।

भाजपा को यह भी याद रखना होगा कि हिंदू एकता केवल चुनावी नारा नहीं हो सकती। इसे मजबूत करने के लिए सामाजिक न्याय, समान सम्मान और सभी वर्गों के प्रति विश्वास जरूरी है। यदि पार्टी अपनी राजनीतिक ताकत के मूल आधार को ही कमजोर करती है, तो उसका लाभ विपक्ष को मिल सकता है।

आज सवाल केवल मोदी सरकार के दो फैसलों का नहीं, बल्कि भाजपा की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा का है। जातिगत असंतोष को समय रहते दूर नहीं किया गया तो 2027 में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है और 2029 की राह भी कठिन हो सकती है। हिंदू एकता की बात करने वाली पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता के बीच संतुलन बनाने में सक्षम है।

सत्ता का रास्ता समाज को जोड़ने से बनता है, उसे बांटने से नहीं। भाजपा यदि इस बुनियादी सत्य को भूलती है, तो उसे चुनौती विपक्ष से पहले अपने ही सामाजिक आधार के भीतर से मिल सकती है।

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