माता वैष्णो देवी की रहस्यगाथा और श्रीराम से वचन
भैरवनाथ का उद्धार और तीन पिंडियों का दिव्य रहस्य
माता वैष्णो देवी की महिमा, श्रीराम से जुड़ी मान्यता और भैरवनाथ की कथा श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का आधार है। त्रिकूट पर्वत की पवित्र गुफा में विराजमान माता के दर्शन के साथ भैरव बाबा के दर्शन का भी विशेष महत्व माना जाता है।
तीन महाशक्तियों के तेज से प्रकट हुईं माता वैष्णो देवी
जम्मू-कश्मीर के कटरा स्थित त्रिकूट पर्वत पर माता वैष्णो देवी का पवित्र धाम देश के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिना जाता है। मान्यता है कि माता की पवित्र गुफा में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की प्रतीक तीन पिंडियां विराजमान हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र इस धाम में भक्त माता के दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
प्रचलित वैष्णो देवी कथा के अनुसार, तीनों महाशक्तियों के दिव्य तेज से एक कन्या का प्राकट्य हुआ। उसका नाम त्रिकुटा रखा गया। धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के उद्देश्य से प्रकट हुईं त्रिकुटा ने भगवान श्रीराम को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की।
भगवान श्रीराम ने दिया था कलियुग में साथ का वचन
कथा के अनुसार, वनवास के दौरान सीता की खोज करते हुए भगवान श्रीराम त्रिकुटा के सामने पहुंचे। कन्या ने उन्हें पति रूप में स्वीकार करने की इच्छा प्रकट की। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने सीता के प्रति अपनी प्रतिज्ञा का उल्लेख करते हुए उसकी इच्छा इस जन्म में पूरी करने में असमर्थता जताई।
मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने वचन दिया कि कलियुग में कल्कि अवतार के समय उसकी मनोकामना पूरी होगी। उन्होंने त्रिकुटा को त्रिकूट पर्वत पर तपस्या करने और लोककल्याण के लिए समर्पित रहने का निर्देश दिया। इसी आस्था के आधार पर माता वैष्णो देवी की महिमा युगों से गाई जाती है।
श्रीधर की भक्ति से प्रकट हुईं माता
वैष्णो देवी की दूसरी प्रसिद्ध कथा भक्त श्रीधर से जुड़ी है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, श्रीधर माता के अनन्य भक्त थे। उन्होंने नौ कन्याओं के पूजन के लिए आयोजन किया। इसी दौरान कन्या रूप में माता वैष्णो देवी उनके घर पहुंचीं और भंडारा कराने का निर्देश दिया।
श्रीधर के पास सीमित साधन थे, लेकिन उन्होंने माता के आदेश पर आसपास के गांवों में भंडारे का निमंत्रण दिया। कथा के अनुसार, माता की कृपा से भोजन और स्थान की व्यवस्था हो गई। भंडारे में भैरवनाथ भी अपने शिष्यों के साथ पहुंचा। वह कन्या की वास्तविक शक्ति जानने के लिए उसके पीछे पड़ गया।
माता उससे बचते हुए त्रिकूट पर्वत की ओर चली गईं। मार्ग में जिस स्थान पर उन्होंने बाण चलाकर जलधारा प्रकट की, वह बाणगंगा कहलाया। चरणों के निशान वाली जगह चरण पादुका और जिस गुफा में माता ने तपस्या की, वह अर्धकुमारी या गर्भजून गुफा के नाम से प्रसिद्ध हुई।
भैरवनाथ का वध और मोक्ष का वरदान
प्रचलित कथा के अनुसार, नौ महीने तक गुफा में रहने के बाद माता वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का सामना किया। भैरव के लगातार पीछा करने और युद्ध की स्थिति बनने पर माता ने अपने दिव्य त्रिशूल से उसका सिर काट दिया। उसका सिर दूर पर्वत पर जा गिरा, जहां आज भैरव मंदिर स्थित माना जाता है।
मृत्यु के समय भैरवनाथ को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने माता से क्षमा मांगी। करुणामयी माता ने उसे क्षमा करते हुए मोक्ष का वरदान दिया। साथ ही यह मान्यता प्रचलित हुई कि माता के दर्शन के बाद भैरव बाबा के दर्शन करने से वैष्णो देवी की यात्रा पूर्ण मानी जाती है।
माता की महिमा और स्तुति मंत्र
माता वैष्णो देवी की कथा श्रद्धा, तपस्या, धर्म की रक्षा और क्षमा का संदेश देती है। भैरवनाथ के प्रसंग में यह भाव सामने आता है कि सच्चे पश्चाताप से अपराधी को भी उद्धार का मार्ग मिल सकता है। वहीं श्रीधर की कथा बताती है कि भक्ति का आधार धन-संपत्ति नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और समर्पण है।
माता की आराधना करते समय भक्त श्रद्धापूर्वक इस मंत्र का जाप कर सकते हैं:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
यह देवी उपासना में प्रचलित मंत्र है। इसके अतिरिक्त श्रद्धालु माता के स्मरण के लिए ‘जय माता दी’ का उद्घोष करते हैं। माता वैष्णो देवी के प्रति अटूट विश्वास रखने वाले भक्त मानते हैं कि उनकी शरण में जाने से मन को शक्ति, साहस और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।
जय माता दी!










