Advertisement
Home International गजब का हाल: देश के सवर्ण जले, भागवत बांग्लादेश में उलझे

गजब का हाल: देश के सवर्ण जले, भागवत बांग्लादेश में उलझे

0
348

नई दिल्ली, 8 फरवरी(भृगु नागर)।  देश का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य आज गजब का है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए फैसलों ने सवर्ण समाज में आग लगा दी है। यह आग सिर्फ नाराजगी नहीं, बल्कि गहरी चोट है—एक ऐसी चोट जिस पर नमक छिड़कने का काम वर्तमान सरकार और उसके समर्थक कर रहे हैं। सवर्णों को उनके अधिकारों से वंचित कर देना, उन्हें शिक्षा और अवसरों में पीछे करना, सीधे तौर पर उनका अपमान है। लेकिन इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के शीर्ष नेता इस आग को देखकर भी चुप हैं। मौन साधे रहना उनकी रणनीति हो सकती है, लेकिन जनता इसे अनदेखी और उपेक्षा के रूप में महसूस कर रही है। जो लोग बोल रहे हैं, उनकी भाषा ऐसा प्रतीत कर रही है जैसे सवर्ण समाज के जले पर नमक ही छिड़क रहे हों। सवाल उठता है: क्या यही देशभक्ति और हिंदू हितैषी होना है, जिसे सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग प्रदर्शित कर रहे हैं?

ऐसे समय में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का हालिया वक्तव्य ध्यान खींच रहा है। रविवार को मुंबई के नेहरू सेंटर में संघ के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं की सुरक्षा पर जोर दिया। भागवत जी ने कहा कि वहां के हिंदुओं को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए, बल्कि पूरी दुनिया का हिंदू समाज उनके साथ खड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर बांग्लादेशी हिंदू अपने अधिकारों के लिए लड़ने का फैसला करें, तो दुनिया भर के हिंदू उनका साथ देंगे।

Advertisment

भागवत जी ने बांग्लादेश में हालिया घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि लगभग सवा करोड़ हिंदू वहाँ रहते हैं, और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा बढ़ गई है। शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद हिंसा ने संगठित रूप ले लिया। हिंदू व्यापारियों, मजदूरों और छात्रों को निशाना बनाया गया, कई लोगों की जान गई और संपत्ति का भारी नुकसान हुआ।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब देश के अपने नागरिक—सवर्ण समाज—यूजीसी जैसे फैसलों के कारण खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब संघ प्रमुख बांग्लादेश की चिंता में क्यों उलझे हैं? यह वक्तव्य न केवल समयानुकूल नहीं है, बल्कि उनकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। क्या देश के भीतर अपने नागरिकों के दर्द को नजरअंदाज करना हिंदू हितैषी होने का प्रमाण है?

विश्लेषक मानते हैं कि मोहन भागवत का यह बयान सीधे तौर पर असंगत और विवादास्पद है। देश के भीतर सवर्ण समाज की पीड़ा आज उतनी ही गंभीर है जितनी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा। ऐसे समय में बाहरी देशों की चिंता को प्राथमिकता देना एक तरह से देश के नागरिकों के अधिकारों पर आंख मूंद लेने जैसा है।

भागवत जी ने एकता और साहस का संदेश दिया, लेकिन यह संदेश उन लोगों के लिए कितना प्रभावी हो सकता है जो अपने ही देश में न्याय और सुरक्षा की उम्मीद लगाकर बैठे हैं? जब देश के नागरिक अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं, तब बांग्लादेश पर ध्यान देना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी की झूठी छवि पेश करता है। यह राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद अनुचित है।

संघ और इसके कार्यकर्ताओं की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। संघ हमेशा हिंदू हितैषी संगठन के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन इस वक्त देश के भीतर संवेदनशील मुद्दों पर उनकी सक्रियता पर शक पैदा हो रहा है। क्या संगठन पहले अपने देशवासियों के लिए उतनी ही मेहनत कर रहा है जितनी वह विदेशों में दिखा रहा है? सवाल जिंदा हैं और जवाब की जरूरत है।

सवर्णों के जख्म अभी ताजे हैं। विश्वविद्यालय और आरक्षण के फैसले उनके लिए घाव हैं, और यह घाव बिना उपचार के बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में देश के भीतर सामाजिक और शैक्षिक असंतोष को नजरअंदाज करना और विदेशों की चिंता करना किसी भी नेता या संगठन की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं हो सकती।

संक्षेप में, देश का हाल गजब का है। एक तरफ सवर्ण समाज का गुस्सा और असंतोष उबल रहा है, दूसरी तरफ नेतृत्व और संघ प्रमुख बांग्लादेश की चिंता में उलझे हैं। देश के नागरिकों के जख्मों पर नमक छिड़कने का यह वक्त है—जब अंदर के मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है और बाहरी मामलों पर जोर दिया जा रहा है। इस विरोधाभास ने मोहन भागवत और अन्य नेताओं की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह वक्त देश के नेताओं और संगठनों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है: पहले अपने “घर” के लोग सुरक्षित और सम्मानित रहें, तभी बाहरी हित की बात करने का कोई अर्थ होगा।

यह है असली राम भजन: रघुपति राघव राजा राम का मूल भजन

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here