अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का सार्वजनिक जीवन आरंभ से ही विवादों की परछाइयों में रहा है। आलोचकों के अनुसार, यह विवाद किसी एक घटना या बयान का परिणाम नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है, जिसमें धार्मिक पद, परंपरा, राजनीति और मीडिया एक-दूसरे में उलझते चले गए। इस पूरी समय-रेखा को यदि क्रम से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि उनके व्यक्तित्व से अधिक, उनका सार्वजनिक आचरण और भूमिका आलोचना के केंद्र में रही है।
यह विवाद उस समय से गहराना शुरू हुआ जब ज्योतिषपीठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य पद को लेकर उत्तराधिकार का प्रश्न सामने आया। आलोचकों का कहना है कि जिस प्रक्रिया से उन्हें शंकराचार्य घोषित किया गया, वह न तो सर्वसम्मत थी और न ही परंपरागत अखाड़ा व्यवस्था को स्वीकार्य। इसी चरण में पहला बड़ा विभाजन दिखाई देता है, जब संत समाज के एक बड़े हिस्से ने उन्हें मान्यता देने से इनकार कर दिया। आलोचकों ने यहीं से यह कहना शुरू किया कि शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धार्मिक पद को विवाद के माध्यम से स्थापित किया जा रहा है, न कि सर्वमान्य साधना और परंपरा के आधार पर।
इसके बाद का चरण कानूनी और प्रशासनिक विवादों का रहा। विभिन्न मंचों पर यह प्रश्न उठाया गया कि क्या अविमुक्तेश्वरानंद को आधिकारिक रूप से शंकराचार्य मानने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं। आलोचकों के अनुसार, अदालतों में लंबित मामलों और प्रशासनिक नोटिसों ने इस संदेह को और गहरा किया। उनका तर्क रहा कि यदि पद निर्विवाद होता, तो उसे बार-बार प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। इसी दौर में आलोचकों ने यह भी कहना शुरू किया कि धार्मिक पद को कानूनी विवादों में घसीटना स्वयं उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है।
समय के साथ विवाद केवल पद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके बयानों और सार्वजनिक हस्तक्षेपों ने इसे और व्यापक बना दिया। आलोचकों के अनुसार, अविमुक्तेश्वरानंद ने स्वयं को धीरे-धीरे एक ऐसे संत के रूप में स्थापित किया जो हर समकालीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे पर टिप्पणी करता है। यही वह बिंदु है जहाँ उनके आलोचक सबसे आक्रामक हो जाते हैं। उनका कहना है कि एक शंकराचार्य का धर्मशास्त्र में डूबा रहना अपेक्षित होता है, न कि सत्ता, नीति और प्रशासन पर लगातार टिप्पणी करना।
इसी समय-रेखा में अन्य शंकराचार्यों और वरिष्ठ धर्माचार्यों के विरोधी स्वर भी स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगते हैं। दक्षिणाम्नाय से जुड़े एक वरिष्ठ शंकराचार्य ने परोक्ष रूप से यह टिप्पणी की कि शंकराचार्य पद को मीडिया विमर्श का हिस्सा बनाना परंपरा के विपरीत है। पश्चिमाम्नाय से संबद्ध एक अन्य शंकराचार्य ने सार्वजनिक मंच पर यह कहा कि आजकल कुछ लोग शंकराचार्य पद को वैचारिक संघर्ष का हथियार बना रहे हैं, जबकि यह पद आत्मसंयम और मौन की साधना का प्रतीक होना चाहिए। इसी क्रम में उत्तराम्नाय परंपरा से जुड़े एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य ने यह तक कहा कि जो व्यक्ति स्वयं को हर विवाद के केंद्र में रखे, वह संस्थागत मर्यादा को कमजोर करता है। आलोचकों के अनुसार, ये वक्तव्य सीधे-सीधे अविमुक्तेश्वरानंद की शैली पर सवाल थे, भले ही नाम लेकर न कहा गया हो।
समय आगे बढ़ने के साथ माघ मेला और अन्य सार्वजनिक आयोजनों में प्रशासन से टकराव की घटनाएँ सामने आईं। आलोचकों ने इसे निर्णायक मोड़ माना। उनका कहना है कि एक शंकराचार्य का प्रशासन से खुलेआम संघर्ष करना यह दर्शाता है कि संत की भूमिका से अधिक, वह स्वयं को शक्ति-संघर्ष के केंद्र में रखना चाहता है। यहीं से “विवाद को पहचान बनाने” का आरोप और मजबूत हो गया। आलोचक मानते हैं कि अविमुक्तेश्वरानंद अब उन संतों की श्रेणी में आ गए हैं जिनकी उपस्थिति शांति नहीं, बल्कि टकराव का संकेत बन जाती है।
इस पूरी समय-रेखा में मीडिया की भूमिका भी आलोचना के दायरे में आती है। आलोचकों के अनुसार, अविमुक्तेश्वरानंद मीडिया को नकारते नहीं, बल्कि उसका उपयोग करते हैं। उनके बयान समय, शब्द और मंच के चयन के कारण तुरंत राजनीतिक रंग ले लेते हैं। आलोचक इसे आध्यात्मिक आचरण के बजाय रणनीतिक संचार मानते हैं। यही कारण है कि हर नया बयान पिछले विवादों की कड़ी में जुड़ जाता है और एक सतत विवाद-चक्र बनता चला जाता है।
अंततः आलोचकों का निष्कर्ष यह है कि अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं विवाद का शिकार नहीं हैं, बल्कि विवाद उनके सार्वजनिक जीवन का स्थायी ढाँचा बन चुका है। उनके अनुसार, शंकराचार्य पद, जो परंपरागत रूप से स्थिरता, मौन और आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रतीक माना जाता रहा है, उनके कार्यकाल में असहमति, टकराव और राजनीतिक विमर्श से जुड़ गया है। आलोचकों की भाषा में यही उनका सबसे बड़ा नकारात्मक पक्ष है—कि उन्होंने धर्म के सर्वोच्च पद को भी समय के शोर से अलग नहीं रखा।
कोर्ट में शंकराचार्य विवाद का वर्तमान स्टेटस
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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ (Jyotish Peeth) का शंकराचार्य घोषित करने का मामला अदालतों में कई वर्षों से लंबित है, और इसका निर्णय अभी तक नहीं आया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में उनकी ‘पट्टाभिषेक’ (शंकराचार्य के रूप में औपचारिक अभिषेक) पर रोक लगाई थी, तब से यह मामला शीर्ष अदालत के समक्ष विचाराधीन है।
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यह सरकारी या प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है, बल्कि विवाद एक लॉन्ग-ड्रॉइंग कोर्ट केस के रूप में चल रहा है जिससे यह तय नहीं हुआ है कि वे वैध शंकराचार्य हैं या नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत कोर्ट के अंतिम निर्णय तक किसी भी नए शंकराचार्य के पट्टाभिषेक पर रोक है, इसलिए पद का औपचारिक स्वीकृति अभी नहीं मिला।
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प्रयागराज माघ मेला प्रशासन ने इसी लंबित सुप्रीम कोर्ट मामले का हवाला देकर नोटिस जारी किया, कि वे 24 घंटे में बताएं कि वे ‘शंकराचार्य’ का पद क्यों उपयोग कर रहे हैं।
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प्रशासन का तर्क है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी नए शंकराचार्य की नियुक्ति को रोक रखा है, तब तक किसी भी व्यक्ति को आधिकारिक रूप से यह पद नहीं दिया जा सकता।
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यह मामला मूल रूप से 2020 में दायर एक अपील के हिस्से के रूप में सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है, जिसमें स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती द्वारा शंकराचार्य के सही उत्तराधिकारी होने का प्रश्न उठाया गया है।
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इस पर कोर्ट ने 2022 में रोक लगा दी और तब से अंतिम सुनवाई / निर्णय नहीं हुआ, इसलिए स्टेटस अभी “लंबित” है।
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इस लंबित न्यायिक प्रक्रिया के कारण प्रशासनिक संस्थान (जैसे माघ मेला प्राधिकरण) और स्थानीय अधिकारियों ने शंकराचार्य के पद का उपयोग करने पर विवादित नोटिस जारी किया।
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इस पूरे मामले को अदालत में “वैधता और उत्तराधिकार” के रूप में देखा जा रहा है, न कि केवल धार्मिक घोषणा के रूप में, और कोर्ट का अंतिम निर्णय अभी शेष है।










