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शिवत्व के बिना सुंदरता मूल्यहीन

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भारतीय मूल्यशास्त्र का महावाक्य है— सत्यं शिवं सुन्दरम्। यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि मानव जीवन की मूल कसौटी है। जो सत्य है, वही शिव है और जो शिव है, वही सुंदर है। यहाँ सुंदरता किसी क्षणिक आकर्षण या मन की प्रसन्नता का नाम नहीं, बल्कि कल्याण की अनुभूति है।

पश्चिमी सौंदर्यशास्त्र यह मानकर चलता है कि सुंदरता देखने वाले की दृष्टि में होती है, अर्थात सौंदर्य पूरी तरह व्यक्तिनिष्ठ है। किंतु भारतीय मनीषा इस अवधारणा को अस्वीकार कर देती है। उसके लिए सत्य, शिव और सुंदर—तीनों वस्तुनिष्ठ हैं, निरपेक्ष हैं। मूल्य मनुष्य के मन की उपज नहीं, बल्कि मनुष्य की पहचान हैं। मनुष्य इसलिए मनुष्य है क्योंकि वह मूल्यों के अधीन है।

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तो सुंदर क्या है? शास्त्र का उत्तर स्पष्ट है—जो शिव है, वही सुंदर है। अर्थात जहाँ शिवत्व नहीं है, वहाँ सुंदरता भी नहीं हो सकती।
यस्मिन् शिवत्वं नास्ति तस्मिन् सुन्दरमपि नास्त्येव।

अक्सर कहा जाता है कि जो मन को सुख दे वही सुंदर है, पर यह सुंदरता की एक बचकानी और अधूरी परिभाषा है। सुख और दुःख संस्कारजन्य होते हैं, इसीलिए व्यक्तिनिष्ठ हैं। एक ही वस्तु किसी को सुख देती है और किसी को दुःख। लेकिन सुंदरता ऐसी नहीं है। वह वस्तुनिष्ठ है, सार्वकालिक है। हमारे शास्त्र कहते हैं—जो कल्याणकारी है वही सुंदर है। हर सुखद वस्तु सुंदर हो, यह आवश्यक नहीं।

गीता स्पष्ट चेतावनी देती है कि भोगजन्य सुख अंततः दुःख को ही जन्म देता है—
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।

ऐसा सुख भी होता है जो आरंभ में अमृत-सा लगता है, किंतु परिणाम में विष बन जाता है। यदि कोई क्षणिक आकर्षण आगे चलकर दीर्घकालीन दुःख का कारण बने, तो वह सुंदर नहीं हो सकता। इसके विपरीत, जो साधना वर्तमान में कष्टकर प्रतीत होती है लेकिन भविष्य में उन्नति का मार्ग खोलती है, वही वास्तविक सुंदरता है।

गीता इसे और गहराई से समझाती है—
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्।

यहाँ प्रश्न उठता है कि जो कष्ट देता है, वह सुंदर कैसे हो सकता है? उत्तर है—यदि वह कष्ट दीर्घकालीन सौंदर्यबोध और जीवन-कल्याण का कारण बने, तो वही तप है और तप स्वयं में सुंदर है। प्रमाद से उत्पन्न सुख कभी सुंदर नहीं हो सकता। तप विकास का कारण है, इसलिए वह सुंदर है।

इस प्रकार सुंदर की परिभाषा स्पष्ट हो जाती है— यत् शिवं तत् सुन्दरम्
शिव का अर्थ है मंगल, और मंगल का अर्थ है कल्याण, उत्कर्ष और प्रगति। भारतीय शास्त्र बाहरी प्रगति का तिरस्कार नहीं करता, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक अभ्युदय कहता है। अशिक्षा से शिक्षा की ओर बढ़ना, दरिद्रता से समृद्धि की ओर जाना, निस्तेजता से तेजस्विता की ओर बढ़ना—यही प्रगति है।

समृद्धि के पीछे श्रम और कर्मकौशल होता है। प्रतिष्ठा किसी को दान में नहीं मिलती। विद्वान ही विद्वान के परिश्रम को समझता है— विद्वान् जानाति विद्वज्जन परिश्रमः श्रम स्वयं में सुंदर है, क्योंकि वह तप है।

भीतरी प्रगति का आरंभ भी जीवन-मूल्यों से होता है। जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओर जाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। सत्त्व में स्थित होना, विनम्रता में टिके रहना, भक्ति में प्रतिष्ठित होना—यही शिवत्व है। शिवत्व का अर्थ ही है कल्याण और प्रगति।

पर शिव का भी एक हेतु है—सत्य। वेदान्त कहता है कि सत्य, शिव और सुंदर के बीच कारण-कार्य का संबंध है। जो सत्य है वही शिव है और जो शिव है वही सुंदर है। शास्त्र को केवल समझना ही नहीं, उसे अनुभव से जोड़ना भी आवश्यक है। यदि यह तालमेल टूट जाए, तो जीवन दिशाहीन हो जाता है।

महात्मा गांधी सत्य की इसी गहराई में उतरे। वे कहते थे—सत्य को छोड़ना ईश्वर को छोड़ना है। उन्होंने सत्य को केवल जाना नहीं, बल्कि जीवन में प्रयोग किया। यही कारण था कि वे सत्यनिष्ठ से आगे बढ़कर प्रयोगनिष्ठ बने।

रामायण और महाभारत इस दर्शन के दो जीवंत उदाहरण हैं। रामायण पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक है, जबकि महाभारत पारिवारिक कलह का। नीति कहती है कि अपंग राजा नहीं बन सकता, इसलिए जन्मांध धृतराष्ट्र के स्थान पर पाण्डु राजा बने। इस सत्य को धृतराष्ट्र ने कभी स्वीकार नहीं किया और उसे षड्यंत्र मानता रहा। यदि वह सत्य स्वीकार कर लेते, तो महाभारत का जन्म ही न होता। असत्य में शिवत्व खोजने की उसकी जिद ने पूरे कौरव वंश का विनाश कर दिया।

इसके विपरीत, भरत ने कभी सत्य नहीं छोड़ा। भरी सभा में उन्होंने कहा— सब संपत्ति रघुपति कै आही और स्वयं को केवल सियापति का सेवक माना। राजा घोषित होने के बाद भी वे राम के प्रतिनिधि बनकर ही अयोध्या का संचालन करते रहे। भरत के सत्याग्रह से रामायण निकली और धृतराष्ट्र के असत्याग्रह से महाभारत।

जिस सुंदरता से शिव प्रकट न हो, वह छलावा है और जिस शिव से सत्य प्रकट न हो, वह अमंगलकारी है।

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