नई दिल्ली, 30 जनवरी, (भृगु नागर)। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” — यह नारा केवल एक राजनीतिक उद्घोष नहीं था, बल्कि 2014 के बाद भारतीय राजनीति में भरोसे की एक वैचारिक नींव माना गया। नरेंद्र मोदी ने इसे केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे अपनी छवि, अपनी राजनीति और अपने नेतृत्व का केंद्रीय सूत्र बनाया। लेकिन यूजीसी (UGC) से जुड़े हालिया निर्णयों और विवादों ने इस नारे की आत्मा पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर सवर्ण समाज के बीच यह भावना गहराती जा रही है कि ‘सबका विकास’ की बात करते-करते सरकार ने उनके हितों को हाशिये पर धकेल दिया है।
पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने एक ऐसी “तिलिस्मी दुनिया” रची थी, जहां राष्ट्रवाद, विकास और सांस्कृतिक गौरव का सम्मोहन था। मध्यम वर्ग, शिक्षित समाज और विशेषकर सवर्ण तबके का एक बड़ा हिस्सा इस भरोसे के साथ मोदी के साथ खड़ा रहा कि यह सरकार योग्यता, परिश्रम और समान अवसर की बात करती है। लेकिन यूजीसी से जुड़े फैसलों ने इस भरोसे में सीधी सेंध लगा दी है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह नियमों को बदला गया, आरक्षण और नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर जो संदेश गया, उसने सवर्ण समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनकी चिंताओं का अब सत्ता के गलियारों में कोई मूल्य नहीं रहा।
यह केवल शिक्षा नीति का सवाल नहीं है, बल्कि राजनीतिक संवेदनशीलता का भी है। विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान किसी भी देश की बौद्धिक रीढ़ होते हैं। यहां लिए गए निर्णय दूरगामी प्रभाव डालते हैं। यूजीसी के हालिया कदमों को लेकर जो असंतोष उभरा, वह अचानक नहीं था। लंबे समय से यह शिकायत रही है कि योग्यता आधारित अवसरों में कटौती हो रही है और सामाजिक संतुलन के नाम पर एक वर्ग विशेष पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। सरकार ने यदि समय रहते संवाद और संतुलन का रास्ता अपनाया होता, तो शायद हालात इतने विस्फोटक न होते।
प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी छवि रही है — एक ऐसे नेता की छवि, जो हर वर्ग की बात सुनता है, हर समाज को साथ लेकर चलता है। लेकिन यूजीसी प्रकरण ने इसी छवि पर सबसे गहरी चोट की है। सवर्ण समाज, जो भाजपा का पारंपरिक और वैचारिक आधार माना जाता रहा है, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। यह भावना खतरनाक है, क्योंकि राजनीति में जब भरोसा टूटता है तो उसे जोड़ने में वर्षों लग जाते हैं।
भाजपा के भीतर भी इस मुद्दे पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। कई वरिष्ठ नेता, जो खुलकर तो नहीं लेकिन संकेतों में सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं। यह वही भाजपा है, जिसने कभी “मेरिट बनाम आरक्षण” जैसे मुद्दों पर मुखर रुख अपनाया था। आज वही पार्टी असहज चुप्पी साधे हुए है। यह चुप्पी केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक दुविधा की भी प्रतीक है।
मोदी सरकार के लिए यह संकट इसलिए भी बड़ा है क्योंकि यह विपक्ष द्वारा थोपा गया नहीं, बल्कि खुद की नीतियों से उपजा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को बैठे-बिठाए एक ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिस पर वे भाजपा के सामाजिक संतुलन और कथित “सबका साथ” के नारे को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं। आने वाले समय में यह मुद्दा केवल सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चुनावी विमर्श का भी हिस्सा बनेगा।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यूजीसी का यह धक्का मोदी के राजनीतिक दामन पर एक ऐसा दाग है, जिसे धो पाना आसान नहीं होगा। मोदी अब जिस दौर में हैं, वहां उनसे केवल करिश्माई भाषण नहीं, बल्कि ठोस और संतुलित निर्णयों की अपेक्षा है। यदि सरकार ने सवर्ण समाज की आशंकाओं को गंभीरता से नहीं लिया, तो यह असंतोष धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक अलगाव में बदल सकता है।
अंततः सवाल यही है — क्या ‘सबका साथ’ का नारा वास्तव में सबके लिए था, या यह केवल एक चुनावी मंत्र बनकर रह गया? यूजीसी प्रकरण ने इस सवाल को और तीखा बना दिया है। अब गेंद प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के पाले में है। या तो वे संवाद, संशोधन और संतुलन का रास्ता अपनाएं, या फिर उस तिलिस्मी दुनिया के टूटते मलबे के बीच अपनी राजनीति को संभालने की कोशिश करते रहें।










