जब माँ काली के क्रोध से चौसठ योगिनियाँ प्रकट हुईं, तब केवल असुरों का संहार नहीं हुआ, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति-संतुलन की पुनर्स्थापना हुई। आज भी तांत्रिक परंपरा में योगिनियाँ साधना, सिद्धि और आत्मबोध का सर्वोच्च प्रतीक मानी जाती हैं। ये यह संदेश देती हैं कि जहाँ भय है, वहीं शक्ति का द्वार भी है। भारतीय सनातन परंपरा में यदि किसी विषय को सबसे अधिक रहस्यमय, गूढ़ और तांत्रिक माना गया है, तो वह है चौसठ योगिनियों का स्वरूप। ये योगिनियाँ केवल उग्र देवियाँ नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्तियों, सूक्ष्म तत्वों और मानव चेतना के गहन स्तरों का सजीव प्रतीक हैं। शाक्त, तांत्रिक और पुराणिक परंपराओं में इनका उल्लेख अत्यंत सम्मान और रहस्य के साथ किया गया है।
आदि शक्ति की महिमा अनंत है, उनके महात्म को सनातन ग्रंथों में उल्लेख किया गया है। देवीमाहात्म्य, कालीकापुराण, मत्स्यपुराण तथा विभिन्न तंत्रग्रंथों के अनुसार, जब पृथ्वी पर असुरों का अत्याचार बढ़ा और देवताओं व ऋषियों के यज्ञ नष्ट होने लगे, तब देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की। इस आह्वान पर माँ दुर्गा ने काली का उग्र रूप धारण किया।
कथा के अनुसार, युद्ध के समय जब असुरों का रक्त पृथ्वी पर गिरता और प्रत्येक रक्तबिंदु से नया असुर उत्पन्न हो जाता, तब माँ काली का क्रोध चरम पर पहुँच गया। उसी क्षण उनके शरीर से 64 दिव्य शक्तियाँ प्रकट हुईं—इन्हीं को चौसठ योगिनियाँ कहा गया। इन योगिनियों ने असुरों का रक्त पीकर उनका संपूर्ण नाश किया और ब्रह्मांड में धर्म एवं संतुलन की पुनर्स्थापना की।
चौसठ योगिनियों का स्वरूप और वर्गीकरण
तांत्रिक ग्रंथों में योगिनियों को सामान्यतः आठ-आठ के आठ समूहों में विभाजित किया गया है, जिन्हें अष्ट मातृकाओं से जोड़ा जाता है—
- ब्राह्मी
- माहेश्वरी
- कौमारी
- वैष्णवी
- वाराही
- नारसिंही
- ऐन्द्री
- चामुण्डा
प्रमुख योगिनियों में काकिनी, डाकिनी, शाकिनी, भैरवी, चामुण्डा, वाराही, नारसिंही, माहेश्वरी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्हें योग, मंत्र, सिद्धि और तंत्र-ज्ञान की अधिष्ठात्री शक्तियाँ माना गया है।
तांत्रिक परंपरा में चौसठ योगिनियाँ
तंत्रशास्त्र के अनुसार, चौसठ योगिनियों की साधना अत्यंत गोपनीय और कठिन मानी जाती है। यह साधना सामान्य गृहस्थ के लिए नहीं, बल्कि दीक्षित साधकों और सिद्ध योगियों के लिए निर्दिष्ट है।
इनकी उपासना विशेष रूप से—
- अमावस्या
- अष्टमी
- नवमी
- महाकाल रात्रि
- विशिष्ट ग्रह-नक्षत्र योगों
में की जाती है। ग्रंथों में उल्लेख है कि योगिनी-साधना से साधक को वाक्-सिद्धि, तंत्र-सिद्धि, रोग-नाश, भय-मुक्ति, शत्रु बाधा निवारण और अंततः आत्मबोध की प्राप्ति हो सकती है।
चौसठ योगिनी मंदिर : स्थापत्य और रहस्य
भारत में चौसठ योगिनियों के कई प्राचीन मंदिर आज भी विद्यमान हैं, जो तांत्रिक स्थापत्य के अद्वितीय उदाहरण हैं। प्रमुख मंदिर हैं—
- मितावली (मुरैना, मध्य प्रदेश)
- खजुराहो (मध्य प्रदेश)
- हिरापुर (ओडिशा)
- भेड़ाघाट (जबलपुर, मध्य प्रदेश)
इन मंदिरों की विशेषता है कि ये प्रायः वृत्ताकार (गोलाकार) होते हैं। तंत्र में वृत्त को चक्र, ब्रह्मांड और कालचक्र का प्रतीक माना जाता है। अधिकांश मंदिरों की छत खुली होती है, जो यह संकेत देती है कि योगिनियाँ आकाशमार्ग से विचरण करने वाली दिव्य शक्तियाँ हैं।
आध्यात्मिक और दार्शनिक अर्थ
चौसठ योगिनियाँ केवल उग्र शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि—
- मानव चेतना के 64 स्तर
- योग के 64 मार्ग
- तंत्र के 64 रहस्य
का प्रतीकात्मक निरूपण भी हैं। माँ काली का क्रोध यहाँ विनाश का नहीं, बल्कि अज्ञान, अहंकार और अधर्म के नाश का संकेत है। योगिनियाँ उस चेतना-शक्ति का विस्तार हैं, जो साधक को भय से मुक्त कर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर करती हैं।
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