Advertisement
Home International बच्चों पुस्तकों से करो दोस्ती, मोबाइल से बनाओ दूरी

बच्चों पुस्तकों से करो दोस्ती, मोबाइल से बनाओ दूरी

0
68

-आदर्श प्रकाश सिंह

लखनऊ में पुस्तक मेला का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है। वर्ष में दो बार यह मेला यहाँ राजधानी में आयोजित होता है। यह सिलसिला वर्ष 2003 से चल रहा है। लखनऊ के लोगों को इसका बेसब्री से इंतजार रहता है। अब तो यह पुस्तक मेला प्रदेश के अन्य शहरों में भी आयोजित किया जा रहा है। हाल ही में कानपुर, प्रयागराज, अलीगढ़ और गोरखपुर में यह मेला लगा था। देश के विभिन्न स्थानों से प्रकाशक यहाँ आकर अपने स्टाल लगाते हैं। जनता में किताबों के प्रति लगाव बना रहे, इस दिशा में यह मेला काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है। लखनऊ में 13 मार्च को लगा पुस्तक मेला 22 मार्च को समाप्त हो गया। इस बात में कोई शक नहीं कि डिजिटल दुनिया के युग में पुस्तकों को पढ़ने का क्रेज कम हुआ है। स्मार्ट फ़ोन आने के बाद समाज का हर तबका मोबाइल प्रेमी हो गया है। पुस्तक या समाचार पत्र पढ़ने का रिवाज धीरे- धीरे कम होता जा रहा है। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, रविवार, इलस्ट्रेटेड वीकली, माधुरी, सारिका, नंदन और पराग जैसी अनेक पुरानी पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। सोशल मीडिया ने प्रिंट मीडिया को चोट पहुंचाई है। इस वजह से पब्लिशर्स के कारोबार पर असर भी पड़ा है।

Advertisment

इन हालात में इस तरह के बुक फेस्टिवल की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता। लोगों में पुस्तक पढ़ने की आदत कायम रहे, यह आज के इन्टरनेट के ज़माने में एक बहुत बड़ी चुनौती है। आज के छात्र और छात्राएं मोबाइल फ़ोन का बहुत इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे उनके सोचने और समझने की काबिलियत समाप्त हो रही है। मगर हमें समझना होगा कि रचनात्मक सोच का निर्माण पुस्तकों के माध्यम से ही संभव है। पुस्तकों में प्रकाशित कंटेंट फैक्ट के अधिक नजदीक रहता है। लोग उस पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं। इनकी विश्वसनीयता का कोई जवाब नहीं है। तकनीक के युग में किताबों की ओर रुझान कम होना चिंता की बात है। डिजिटल का दौर तो ठीक है लेकिन हमें अपनी परम्परा, विरासत और संस्कृति को भी बचा कर रखना होगा। पुस्तकों का अपना महत्व है। ज्ञान का भंडार इसी में छुपा है। इनके पढ़ने से भाषा की समझ विकसित होती है। किसी विषय के गंभीर अध्ययन के लिए पुस्तक ही हमारा सबसे उपयुक्त साथी है। इन्टरनेट ने आज हर सेक्टर में अपनी पैठ बना ली है। मीडिया के सेक्टर में इसकी काफी बड़ी भूमिका है। मगर स्टूडेंट्स को मेरी यही सलाह है कि वे पुस्तकों के प्रति अपनी दिलचस्पी बढ़ाएं। आजकल मोबाइल से हमें दूरी बनाने की सलाह दी जाती है। खासकर बच्चों को तो इससे दूर रहने को कहा जाता है। ऑस्ट्रेलिया जैसे कुछ देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल देखने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके दुष्प्रभाव से हम भली भांति परिचित हैं। डिजिटल क्रांति ने छोटे बच्चों के दिमाग पर असर डाला है। मोबाइल या टीवी के स्क्रीन से आँखों को आराम नहीं मिलता लेकिन पुस्तक पढ़ने से यह समस्या नहीं होती बल्कि ज्ञान के साथ हमारी रचनात्मकता बढती है। पुस्तकें ज्ञान का स्थायी स्रोत हैं, ये हमारी कल्पनाशीलता को पंख देती हैं। पुस्तकें ज्ञान का अथाह सागर हैं जिनका कोई विकल्प नहीं है।

डिजिटल स्क्रीन, फ़ोन या लैपटॉप से ध्यान जल्द भटकता है जबकि किताबें हमारी एकाग्रता बढाती हैं। गहन सोच के लिए प्रेरित करती हैं। इन्टरनेट पर दी हुई जानकारी अक्सर गलत भी हो जाती है जबकि पुस्तकों को लिखने वाले एक्सपर्ट लोग होते हैं। किसी विषय के बड़े जानकर लोग ही पुस्तक लिखते या सम्पादित करते हैं। इस नाते पुस्तकें अधिक भरोसेमंद मानी जाती हैं। सीनियर पत्रकार और मीडिया के एक्सपर्ट डॉ संतोष तिवारी का कहना है कि ‘हमें पुस्तकों के प्रति अपनी रूचि बढानी चाहिए, अमेरिका में अनेक घरों में अख़बार नहीं आता, कोविड महामारी के समय भारत में भी अख़बारों की प्रसार संख्या में गिरावट दर्ज की गयी। यह रुझान उचित नहीं है। वह कहते हैं कि खासकर बच्चों में पढने की रूचि बढानी होगी, इसके लिए स्कूलों में ही प्रयास करने होंगे।’

अनेक एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्कूल और कॉलेजों में मोबाइल फ़ोन लाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इससे विद्यार्थियों का ध्यान भटकना लाजिमी है। मैं खुद जब लखनऊ के एक मीडिया इंस्टिट्यूट में स्टूडेंट्स को पढ़ाने गया तो क्लास में मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल पर उन्हें टोका। मैंने प्रबंधन से भी इसकी शिकायत की। जाहिर है, शिक्षक की एकाग्रता भी इससे भंग होती है। पुस्तकों से आत्मीयता तभी बढ़ेगी जब हम उनके करीब जायेंगे। पुस्तक मेला हमें यह अवसर प्रदान करता है। विशेष रूप से स्कूल जाने वाले बच्चों को इस ओर प्रेरित करना होगा। पुस्तकालयों का महत्त्व आज भी बरकरार है। फैक्ट सहित जानकारियां हमें किताबों से ही मिल सकती हैं। इसलिए पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को बचा कर रखना होगा। इस काम में बच्चों के अभिभावक अहम भूमिका निभा सकते हैं। आशा है बच्चे इस पर ध्यान देंगे। उनको पुस्तक मेले का भ्रमण अवश्य करना चाहिए।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here