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स्वयंभू शंकराचार्य और सनातन पर संकट

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कौए और कोयल में अंतर कैसे पहचाना जाए: स्वयंभू संतों की पहचान का प्रश्न

भारतीय सनातन परंपरा में कहा गया है कि जैसे कौए और कोयल देखने में समान होते हुए भी स्वर से पहचाने जाते हैं, वैसे ही वास्तविक संत और स्वयंभू संतों में अंतर उनके आचरण, वाणी और उद्देश्य से स्पष्ट होता है। आज यही प्रश्न अविमुक्तेश्वरानंद नामक व्यक्ति को लेकर उठता है, जो स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कहता है, जबकि उसका यह दावा न्यायिक और धार्मिक दोनों ही स्तरों पर विवादों से घिरा हुआ है।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद सहित 13 अखाड़ों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अविमुक्तेश्वरानंद का शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेक फर्जी वसीयत के आधार पर किया गया। आरोप है कि उसने स्वयं को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित कर लिया, जबकि शंकराचार्य परंपरा के अनुसार नियुक्ति की जो विधि, परंपरा और स्वीकृति आवश्यक होती है, उसका पालन नहीं किया गया। यही कारण है कि यह मामला आज भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और समाप्त नहीं हुआ है।

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वर्ष 2022 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ—जिसमें न्यायमूर्ति बी.आर. गवई (वर्तमान में भारत के मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना शामिल थीं—ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय में कहा था कि “एक व्यक्ति यदि गलत तरीके से शंकराचार्य बनता है, तो इसका समाज में अत्यंत गलत संदेश जाएगा।” न्यायालय ने इस टिप्पणी के साथ पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी। अंतिम निर्णय कब आएगा, यह न्यायालय का विषय है, लेकिन तथ्य यह है कि मामला आज भी न्यायिक विचाराधीन है।

इसके बावजूद अविमुक्तेश्वरानंद देशभर में स्वयं को शंकराचार्य बताकर भ्रमण करता है। आलोचकों का कहना है कि उसकी भाषा, उसके वक्तव्य और उसका सार्वजनिक आचरण शंकराचार्य परंपरा के अनुरूप नहीं हैं। सनातन धर्म, वेद, उपनिषद या शास्त्रीय विमर्श पर उसे बोलते कम ही सुना जाता है, जबकि राजनीतिक विषयों पर उसके बयान अक्सर चर्चा में रहते हैं।

उसकी भाषा और तर्कशैली को लेकर यह भी आरोप लगाए जाते हैं कि वह वही शब्दावली और वही प्रश्न उठाता है, जिन्हें पाकिस्तान समर्थक या भारत-विरोधी तत्व प्रायः प्रयोग करते हैं। पहलगांव की आतंकवादी घटना के बाद, जब पूरा देश शोक और आक्रोश में था और विश्व समुदाय भारत के साथ खड़ा था, उस समय अविमुक्तेश्वरानंद के बयान ने कई लोगों को विचलित किया। उसने कहा कि यदि आतंकवादी पाकिस्तान से आए थे तो चौकीदार को पहले से कैसे पता चल गया, और फिर “चौकीदार” शब्द का प्रयोग कर परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कटाक्ष किया। उसने यह भी कहा कि “अपने को चौकीदार कहते हैं, पर चौकीदारी की नहीं”, लेकिन प्रधानमंत्री का नाम सीधे लेने का साहस नहीं दिखाया।

गंभीर आपत्ति इस बात पर भी जताई गई कि उसने इंटेलिजेंस जैसे संवेदनशील विषय को या तो समझा नहीं या जानबूझकर भ्रम फैलाने के लिए प्रस्तुत किया। सामान्य और एक्शन योग्य इंटेलिजेंस के अंतर को नज़रअंदाज़ करते हुए उसने ऐसे सवाल उठाए, जिनसे सुरक्षा बलों और सरकार की भूमिका पर संदेह उत्पन्न किया जा सके।

इसी क्रम में उसने पाकिस्तान की ओर जाने वाले सिंधु जल प्रवाह को लेकर भी प्रधानमंत्री पर कटाक्ष किया और यह कहा कि विशेषज्ञों के अनुसार यदि आज से प्रयास किया जाए तो पानी रोकने में बीस वर्ष लगेंगे। आलोचकों का कहना है कि यह कथन भ्रामक है, क्योंकि सिंधु जल परियोजनाओं पर केंद्र सरकार वर्ष 2016 से कार्य कर रही है। उसने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि जिन “विशेषज्ञों” का वह हवाला दे रहा है, वे भारत के थे या किसी अन्य पक्ष के।

अविमुक्तेश्वरानंद पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि उसका उद्देश्य सनातन धर्म की रक्षा नहीं, बल्कि एक निश्चित राजनीतिक एजेंडा चलाना है—जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और केंद्र सरकार के विरोध पर केंद्रित रहता है। यह भी कहा जाता है कि वह गांधी परिवार के एक सदस्य के निकट है और समय-समय पर उसी अनुरूप राजनीतिक बयान देता है। आलोचकों के अनुसार उसका सनातन से संबंध केवल दिखावटी है और वह सनातन के नाम का प्रयोग सरकार को घेरने के लिए करता है।

उसके व्यक्तिगत आचरण पर भी प्रश्न उठाए जाते हैं। आरोप है कि वह उद्योगपतियों के यहाँ होने वाले भव्य आयोजनों में अत्यधिक रुचि दिखाता है। ऐसे ही एक विवाह समारोह में, जिसमें प्रधानमंत्री भी उपस्थित थे, प्रधानमंत्री ने शंकराचार्य पद की मर्यादा के कारण उसके चरण स्पर्श किए। आलोचकों का कहना है कि यह सम्मान पद को मिला, व्यक्ति को नहीं।

उसकी पृष्ठभूमि को लेकर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, छठी कक्षा के बाद उसके पिता उसे गुजरात ले गए और किसी संत के आश्रम में छोड़ आए। वहीं उसने कुछ धार्मिक और आध्यात्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया और बाद में वह स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का शिष्य बना। आरोप है कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की समाधि से पूर्व ही उसने अपना पट्टाभिषेक करा लिया, जिसे अखाड़ों ने अवैध बताया।

यह भी सत्य है कि स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के कांग्रेस के प्रति झुकाव रहे, लेकिन उनकी विद्वता, शास्त्रज्ञान और सनातन धर्म के प्रचार में योगदान पर कभी गंभीर प्रश्न नहीं उठे। यही कारण है कि आलोचक स्पष्ट करते हैं कि यह विवाद गुरु की विद्वता का नहीं, शिष्य की नीयत और प्रक्रिया का है।

कुल मिलाकर, अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर यह धारणा बनती जा रही है कि वह अंदर से सनातन विरोधी है, लेकिन ऊपर से स्वयं को सनातन का रक्षक बताता है। ऐसे लोगों को शास्त्रों में “कालनेमि” कहा गया है—जो साधु का वेश धारण कर समाज को भ्रमित करते हैं। आलोचकों का मत है कि ऐसे व्यक्तियों से समाज को सतर्क रहने की आवश्यकता है और जब तक न्यायालय अंतिम निर्णय न दे दे, तब तक उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्वीकार करना सनातन परंपरा के साथ अन्याय होगा।

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