क्या है 1916 Agreement के आधार पर
देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार हरिद्वार और ऋषिकेश के कुल 105 गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की दिशा में गंभीर मंथन कर रही है। आगामी कुंभ और अर्धकुंभ आयोजनों को देखते हुए सरकार इस व्यवस्था को केवल अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और स्थायी स्वरूप देने पर विचार कर रही है। इस फैसले के पीछे जिस ऐतिहासिक आधार की सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है 1916 का ऐतिहासिक ‘गंगा–हरिद्वार समझौता’ (1916 Agreement)।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह कदम किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं बल्कि गंगा की पवित्रता, तीर्थ मर्यादा और सनातन परंपरा की रक्षा के उद्देश्य से उठाया जा रहा है।
क्या है 1916 Agreement?
वर्ष 1916 में, ब्रिटिश शासन के दौरान, गंगा की अविरल धारा, हरिद्वार की धार्मिक गरिमा और तीर्थ मर्यादा को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न हुई थीं। उस समय अंग्रेज सरकार की नीतियों, औद्योगिक प्रयोगों और प्रशासनिक हस्तक्षेप से गंगा के प्रवाह और घाटों की पवित्रता प्रभावित हो रही थी।
इसी पृष्ठभूमि में महान राष्ट्रवादी नेता पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में संत समाज, धर्माचार्यों और ब्रिटिश प्रशासन के बीच एक ऐतिहासिक सहमति बनी, जिसे आज 1916 Agreement के रूप में जाना जाता है।
इस समझौते का मूल भाव यह था कि:
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गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि सनातन धर्म की जीवित सांस्कृतिक धुरी है।
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हरिद्वार के गंगा घाट सार्वजनिक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि विशुद्ध धार्मिक क्षेत्र हैं।
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तीर्थ स्थलों पर धार्मिक अनुष्ठानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशेष मर्यादाएं लागू होंगी।
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कुछ विशिष्ट घाटों और धार्मिक स्थलों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित रखा जा सकता है, ताकि आस्था और अनुष्ठान निर्विघ्न संपन्न हों।
धार्मिक इतिहासकारों के अनुसार, यही वह बिंदु है जहां से हरिद्वार को एक “साधारण नगर” नहीं बल्कि सनातन तीर्थ-नगरी के रूप में प्रशासनिक मान्यता मिली।
पहले से लागू रही हैं ऐसी व्यवस्थाएं
यह उल्लेखनीय है कि हर की पैड़ी जैसे प्रमुख घाटों पर पहले भी नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को लेकर नियम लागू रहे हैं। अब धामी सरकार उसी व्यवस्था को हरिद्वार और ऋषिकेश के 105 प्रमुख घाटों तक विस्तार देने पर विचार कर रही है।
सरकार का मानना है कि कुंभ जैसे विराट धार्मिक आयोजनों के दौरान मर्यादा उल्लंघन, अनुशासनहीनता और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं, जिससे संत समाज और श्रद्धालुओं में रोष रहा है।
सनातन पवित्र नगरी का प्रस्ताव
सूत्रों के मुताबिक, सरकार हरिद्वार और ऋषिकेश को औपचारिक रूप से “सनातन पवित्र नगरी” घोषित करने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है। इसके तहत:
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गंगा घाटों पर धार्मिक आचार-संहिता लागू होगी
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अनुष्ठान काल में प्रवेश नियम सख्त होंगे
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तीर्थ क्षेत्र में आचरण, वस्त्र और व्यवहार के लिए दिशा-निर्देश तय होंगे
प्रशासनिक स्तर पर इस फैसले को संवैधानिक और कानूनी आधार देने के लिए विशेषज्ञों से राय ली जा रही है।
धर्मनिरपेक्षता बनाम धार्मिक मर्यादा
सरकार के इस कदम का विरोध करने वालों पर निशाना साधते हुए संत समाज का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक स्थलों की मर्यादा को नष्ट करना नहीं होता। हर धर्म को अपनी परंपरा के अनुसार जीने का अधिकार है।
धार्मिक विद्वानों का तर्क है कि देश में अनेक मंदिरों, मठों और धार्मिक परिसरों में प्रवेश संबंधी नियम पहले से लागू हैं और उन्हें संविधान के तहत संरक्षण भी प्राप्त है।
सांस्कृतिक साहस का परिचय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धामी सरकार का यह कदम तुष्टीकरण की राजनीति से हटकर सांस्कृतिक साहस का उदाहरण है। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि राज्य सरकार अपनी धार्मिक विरासत को लेकर सजग है और उसे संरक्षित करने के लिए कठोर फैसले लेने से पीछे नहीं हटेगी।
सनातन परंपरा की दृष्टि से आवश्यक भी
1916 Agreement कोई नया या मनगढ़ंत तर्क नहीं, बल्कि हरिद्वार की धार्मिक आत्मा की ऐतिहासिक स्वीकृति है। यदि उसी भावना के अनुरूप आज गंगा घाटों की पवित्रता सुनिश्चित करने के लिए गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर नियंत्रण किया जाता है, तो यह न केवल संवैधानिक रूप से संभव है बल्कि सनातन परंपरा की दृष्टि से आवश्यक भी है।
गंगा की मर्यादा, हरिद्वार की गरिमा और कुंभ की पवित्रता की रक्षा के लिए यह निर्णय समय की मांग बन चुका है। अब देखना यह है कि सरकार इस ऐतिहासिक विरासत को किस रूप में धरातल पर उतारती है।










