Advertisement
Home Religious Tirth-Darshan दो दिव्य ज्योतियों के रूप में स्थापित हैं श्री मल्लिकार्जुन

दो दिव्य ज्योतियों के रूप में स्थापित हैं श्री मल्लिकार्जुन

0
1028

क्षिण भारत में तमिलनाडु में पातालगंगा कृष्णा नदी के तट पर पवित्र श्ौल पर्वत है। जिसे दक्षिण भारत का कैलाश भी कहा जाता है। श्री श्ौल पर्वत के शिखर के दर्शन मात्र से मनुष्य के सभी कष्ट मिट जाते हैं। इस श्री श्ौलप पर भगवान मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग है। मंदिर के निकट एक जगदम्बा जी का भी स्थान है।

श्री पार्वती जी यां भ्रमराम्बा या भ्रमराम्बिका कहलाती हैं। जगतपिता ब्रह्मा जी ने सृष्टिकार्य की सिद्धि के लिए इसका पूजन किया था। शिवपुराण में इस पावन धाम को लेकर कथा भी है। कथा के मुताबिक श्री गण्ोश के प्रथम विवाह हो जाने से कार्तिकेय जी नाराज होकर माता-पिता के रोकने पर भी क्रौंचपर्वत चले गए। देवगणों ने भी कुमार कार्तिकेय से लौटने के लिए आग्रह किया, लेकिन कुमार कार्तिकेय ने सभी प्रार्थनाओं से अस्वीकार कर दिया। माता पार्वती और भगवान भोलेनाथ पुत्र वियोग में दुख का अनुभव करने लगे। फिर दोनों क्रौंचपर्वत पर गए। माता-पिता का आगमन हुआ जानकर स्नेहहीन हुए कुमार और दूर चले गए। अंत में पुत्र के दर्शन की लालसा से जगदीश्वर भगवान शिव ज्योति रूप धारण कर उसी पर्वत पर अधिष्ठित हो गए। उस दिन से ही वहां प्रादुर्भूत शिवलिंग मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से जगत में विख्यात हुआ है। मल्लिकार्जुन का अर्थ है पार्वती और अर्जुन। अर्जुन शब्द शिव का वाचक है।

Advertisment

यह भी पढ़ें – श्री मल्लिकार्जुन महादेव की कृपा से मिलती है स्थिर भक्ति

इस प्रकार इस ज्योतिर्लिंग में शिव और पार्वती दोनों ज्योतियां प्रतिष्ठित हैं। एक अन्य कथा भी प्रचलित है। जिसके अनुसार इस पर्वत के पास चंद्रगुप्त नामक राजा की राजधानी थी। एक बार उसकी कन्या किसी विश्ोष विपत्ति से बचने के लिए अपने पिता के महल से भागकर इस पर्वत पर आ गई। वह यहां ग्वालों के साथ कंद-मूल और दूध से अपना जीवन निर्वहन करने लगी। उस राजकुमारी के पास एक श्यामा गाय थी। जिसका दूध प्रतिदिन कोई दुह लेता था। एक दिन उसने चोर को दूध दुहते देख लिया। जब वह क्रोध में भरकर उसे मारने के लिए दौड़ी तो गौ के निकट पहुंचकर उसे शिवलिंग के अलावा कुछ अन्य न मिला। तब राजकुमारी ने उस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया। तब से भगवान मल्लिकार्जुन वहीं प्रतिष्ठित हैं। उस लिंग का जो दर्शन करता है। वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अपने परम अभिष्ट को सदा-सर्वदा के लिए प्राप्त कर लेता है।

यह भी पढ़ें – काशी विश्वनाथ की महिमा, यहां जीव के अंतकाल में भगवान शंकर तारक मंत्र का उपदेश करते हैं

यह भी पढ़ें अकाल मृत्यु से मुक्ति दिलाता है महामृत्युंजय मंत्र

यह भी पढ़ें संताप मिटते है रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के दर्शन-पूजन से

यह भी पढ़ें – शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही क्यों करनी चाहिए ? जाने, शास्त्र मत

यह भी पढ़ें – साधना में होने वाली अनुभूतियां, ईश्वरीय बीज को जगाने में न घबराये साधक 

यह भी पढ़ें – यहां हुंकार करते प्रकट हुए थे भोले शंकर, जानिए महाकाल की महिमा

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here