नई दिल्ली, 23दिसंबर(एजेंसियां)। पश्चिम बंगाल की राजनीति अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। यदि आगामी विधानसभा चुनाव में हिंदू मतदाता एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान करते हैं और मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से अलग हो जाता है, तो ममता बनर्जी की सत्ता से विदाई तय मानी जा रही है। यह आकलन केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि ज़मीनी समीकरण और सीट गणित पर आधारित है।
राज्य की कुल आबादी में लगभग 70 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं। अब तक यह वर्ग जाति, क्षेत्र और स्थानीय मुद्दों के आधार पर बंटा रहा, जिसका लाभ तृणमूल कांग्रेस को मिलता रहा। लेकिन हाल के वर्षों में कानून-व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आयोजनों पर टकराव और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दों ने हिंदू समाज में एक साझा असंतोष पैदा किया है। यदि यही असंतोष भाजपा के पक्ष में संगठित मतदान में बदलता है, तो चुनावी तस्वीर पूरी तरह पलट सकती है।
भाजपा रणनीतिक रूप से हिंदू ध्रुवीकरण को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है। उत्तर बंगाल, जंगलमहल, नादिया, हुगली, हावड़ा और दक्षिण 24 परगना जैसे क्षेत्रों में पार्टी को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। विश्लेषकों के अनुसार यदि हिंदू वोटों का 60 से 65 प्रतिशत हिस्सा भाजपा के खाते में जाता है, तो कई सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को सीधे नुकसान होगा।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी की सत्ता की रीढ़ माने जाने वाले मुस्लिम वोट बैंक में भी दरार के संकेत हैं। लगभग 27–30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता अब तक एकतरफा तृणमूल के साथ खड़े रहे, लेकिन बेरोजगारी, शिक्षा, स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा और “पक्का वोट बैंक” समझे जाने की भावना से नाराजगी बढ़ी है। यदि मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस और वाम मोर्चे की ओर शिफ्ट होता है, तो तृणमूल कांग्रेस की पकड़ मुस्लिम बहुल इलाकों में कमजोर पड़ जाएगी।
इस डबल पोलराइजेशन—हिंदू वोट का एकजुट होना और मुस्लिम वोट का बिखराव—की स्थिति में सीटों का गणित तृणमूल के खिलाफ जाता दिखता है। अनुमान के मुताबिक भाजपा 150 से 170 सीटों तक पहुंच सकती है, जो स्पष्ट बहुमत के लिए पर्याप्त है। वहीं तृणमूल कांग्रेस 80 से 100 सीटों पर सिमट सकती है। कांग्रेस और वाम मोर्चा को 35 से 45 सीटों का सीमित लाभ मिल सकता है, लेकिन वे सत्ता की दौड़ से बाहर रहेंगे।
यदि यह परिदृश्य साकार होता है, तो यह केवल ममता बनर्जी की हार नहीं होगी, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक युग का अंत माना जाएगा। तृणमूल कांग्रेस का वह मॉडल, जो माइनॉरिटी सपोर्ट और सरकारी कल्याण योजनाओं पर आधारित रहा है, गंभीर संकट में पड़ जाएगा। वहीं भाजपा पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति को स्थायी रूप से स्थापित कर सकती है।
कुल मिलाकर, चुनावी संकेत यही बताते हैं कि यदि हिंदू मतदाता जागरूक होकर एकजुट हो जाते हैं और मुस्लिम वोट बैंक तृणमूल से दूरी बनाता है, तो “हिंदू जागा तो ममता की विदाई तय” केवल नारा नहीं, बल्कि चुनावी सच्चाई बन सकता है।
सीटों का संभावित गणित
इस “डबल पोलराइजेशन” की स्थिति में, यानी हिंदू मतों का भाजपा के पक्ष में एकजुट होना और मुस्लिम वोट का TMC से कटना, विधानसभा की 294 सीटों का समीकरण कुछ इस प्रकार बन सकता है—
भाजपा: 150 से 170 सीटें
तृणमूल कांग्रेस: 80 से 100 सीटें
कांग्रेस + वाम मोर्चा: 35 से 45 सीटें
अन्य/निर्दलीय: 0 से 5 सीटें
इस अनुमान के अनुसार भाजपा पहली बार बंगाल में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना सकती है। वहीं तृणमूल कांग्रेस, जो पिछले एक दशक से सत्ता में है, विपक्ष की भूमिका में सिमट सकती है।










