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शिवलिंग पर न चढ़ाएं ये 5 चीजें

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भोलेनाथ की पूजा में जानें शास्त्रों की मर्यादा और मान्यताएं

भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे सरल और करुणामय देवता माने जाते हैं। उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है, क्योंकि वे थोड़ी-सी सच्ची श्रद्धा से भी प्रसन्न हो जाते हैं। शिवभक्ति में न तो आडंबर की आवश्यकता होती है और न ही विशेष वैभव की। एक लोटा जल और एक बेलपत्र भी भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त माने गए हैं।

शिवभक्ति का सार सादगी और नियमपालन में है। अज्ञानवश की गई छोटी-सी भूल भी पूजा के फल को प्रभावित कर सकती है। इसलिए शिवलिंग पर पूजा करते समय शास्त्रीय मर्यादाओं का ध्यान रखना आवश्यक है। सही विधि और सच्चे मन से की गई शिव आराधना से जीवन में शांति, सुख और कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

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लेकिन धर्मशास्त्र यह भी कहते हैं कि शिवपूजन जितना सरल है, उतना ही नियमबद्ध भी। श्रद्धा के साथ-साथ मर्यादा का पालन आवश्यक है। कई बार अज्ञानवश भक्त ऐसी वस्तुएं शिवलिंग पर अर्पित कर देते हैं, जिन्हें शास्त्रों में वर्जित बताया गया है। मान्यता है कि ऐसी पूजा से पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में शिवलिंग पर न चढ़ाई जाने वाली कुछ विशेष वस्तुओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। आइए धार्मिक दृष्टि से समझते हैं कि वे कौन-सी पांच वस्तुएं हैं, जिन्हें शिवलिंग पर अर्पित नहीं करना चाहिए।

तुलसी – विष्णु भक्ति का प्रतीक

तुलसी को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। यह भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को विशेष रूप से प्रिय है। लेकिन शिवलिंग पर तुलसी चढ़ाना शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी का संबंध वैष्णव परंपरा से है, जबकि शिव शैव परंपरा के आराध्य हैं। शिवपुराण में वर्णन मिलता है कि शिवपूजन में तुलसी का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए शिवभक्तों को तुलसी दल शिवलिंग पर अर्पित करने से बचना चाहिए।

केतकी (केवड़ा) का फूल – श्राप से जुड़ी कथा

केतकी का फूल देखने में सुंदर और सुगंधित होता है, लेकिन शिवपूजन में इसका प्रयोग वर्जित है।
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्मा ने केतकी के फूल को झूठा साक्षी बनाकर शिवजी को छलने का प्रयास किया था। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने केतकी के फूल को श्राप दिया कि वह कभी उनकी पूजा में स्वीकार नहीं किया जाएगा। तभी से शिवलिंग पर केतकी का फूल चढ़ाना निषिद्ध माना जाता है।

शंख से जल – विष्णु और शिव की भिन्न उपासना पद्धति

शंख को भगवान विष्णु का प्रतीक माना गया है और वैष्णव पूजा में इसका विशेष महत्व है। लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल अर्पित करना शास्त्रों में वर्जित बताया गया है।
मान्यता है कि शिव और विष्णु की उपासना की ऊर्जा और विधि अलग-अलग है। शिवलिंग पर जलाभिषेक तांबे या पीतल के पात्र से करना ही उचित माना गया है।

हल्दी – सौभाग्य का प्रतीक, पर शिव को नहीं प्रिय

हल्दी को विवाह, सौभाग्य और श्रृंगार का प्रतीक माना जाता है। लेकिन शिवलिंग पर हल्दी अर्पित नहीं की जाती।
भगवान शिव वैराग्य, तप और संन्यास के प्रतीक हैं। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पर हल्दी चढ़ाने से पूजा का पूर्ण फल नहीं मिलता। इसी कारण शिवपूजन में चंदन और भस्म को अधिक महत्व दिया गया है।

नारियल और नारियल जल

कई लोग श्रद्धावश शिवलिंग पर नारियल या उसका पानी चढ़ा देते हैं, लेकिन यह भी शास्त्रसम्मत नहीं माना गया है।
धार्मिक दृष्टि से नारियल को देवताओं को अर्पित करने की वस्तु माना गया है, लेकिन शिवलिंग पर इसका अभिषेक नहीं किया जाता। शिवजी को गंगाजल, दूध, दही, शहद और शुद्ध जल से अभिषेक करना ही श्रेष्ठ माना गया है।

शिवजी को क्या है प्रिय

शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र सबसे अधिक प्रिय है। इसके अलावा आक और धतूरा, शमी पत्र, भस्म, चंदन, गंगाजल और कच्चा दूध शिवपूजन में विशेष फलदायी माने गए हैं। श्रद्धा, संयम और सही विधि से की गई पूजा से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

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