होली का मौसम है। सत्ता के आँगन में रंगों की बारिश है, और नारों की पिचकारी दूर तक छूट रही है—“सबका साथ, सबका विकास!” यह नारा जब पहली बार गूंजा था, तब लगा था जैसे राजनीति ने सचमुच रंगों का संतुलन खोज लिया हो। पर जैसे-जैसे नई नीतियाँ आईं, बहसें भी रंग पकड़ने लगीं।
हाल के वर्षों में यूजीसी से जुड़ी नीतियों और बदलावों ने शिक्षा जगत में हलचल मचाई। विश्वविद्यालयों के ढाँचे, नियुक्तियों के नियम, स्वायत्तता, प्रतिनिधित्व—सब पर चर्चा हुई। समर्थकों ने कहा—यह ऐतिहासिक सुधार है। आलोचकों ने पूछा—क्या यह संतुलन का रंग है या एकतरफा छिड़काव? राजनीति का खेल भी होली जैसा ही है। मंच से घोषणा होती है—“यह निर्णय सबके हित में है।” पर जैसे ही रंग गिरता है, कोई कहता है—“हमें ज्यादा भिगो दिया!” कोई और कहता है—“हम पर तो रंग ही नहीं पड़ा!” और तब सत्ता मुस्कुराकर कहती है—“बड़ा सोचिए, व्यापक दृष्टि रखिए।”
जब Narendra Modi ने “सबका साथ, सबका विकास” का नारा दिया, तो वह एक समावेशी वादा था—हर वर्ग, हर समुदाय, हर क्षेत्र को साथ लेकर चलने का। पर राजनीति में वादे अक्सर इंद्रधनुष जैसे होते हैं—दूर से सुंदर, पास जाकर धुंधले।
यूजीसी से जुड़े फैसलों पर उठे सवालों में भी यही रंग दिखा। कुछ लोगों को लगा कि शिक्षा में सुधार की आड़ में प्राथमिकताएँ बदल रही हैं। कुछ को लगा कि यह उच्च शिक्षा को आधुनिक बनाने का प्रयास है। पर व्यंग्य यह पूछता है—अगर “सबका साथ” है, तो असहमति की आवाज़ें इतनी बेचैन क्यों हैं? अगर “सबका विकास” है, तो बहस इतनी तीखी क्यों है? होली में एक दिलचस्प परंपरा है—पहले रंग डालो, फिर गले मिलो। राजनीति में कभी-कभी क्रम उल्टा हो जाता है—पहले गले मिलो, फिर रंग डालो, और बाद में समझाओ कि रंग राष्ट्रहित में था। यूजीसी के नियमों में बदलाव भी कुछ लोगों को ऐसा ही लगा—पहले निर्णय, फिर संवाद।
व्यंग्यकार की नजर से देखें तो नारे और नीतियाँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नारा कहता है—समान अवसर। नीति कहती है—यह रहा नया ढाँचा। नारा कहता है—सब साथ हैं। बहस पूछती है—क्या सबने साथ दिया था?
राजनीति की सबसे बड़ी कला है—आलोचना को उत्सव में बदल देना। यूजीसी पर सवाल उठे, तो जवाब मिला—शिक्षा को वैश्विक स्तर पर ले जाना है। विरोध हुआ, तो कहा गया—बदलाव में असहजता स्वाभाविक है। यानी अगर रंग चटक है, तो यह आधुनिकता का प्रतीक है; अगर चुभता है, तो यह प्रगति का दर्द है। पर लोकतंत्र में सवाल पूछना भी रंग खेलने जैसा ही है—थोड़ा जोखिम भरा, पर जरूरी। अगर कोई वर्ग या समूह यह महसूस करे कि उसकी भागीदारी कम हो रही है, तो वह पूछेगा ही। और सत्ता का दायित्व है कि वह सिर्फ नारे से नहीं, संवाद से जवाब दे। “सबका साथ, सबका विकास” एक आदर्श है—और आदर्शों की परीक्षा नीतियों से होती है। यूजीसी जैसे संस्थानों में किए गए बदलाव उस परीक्षा की कसौटी बन जाते हैं। व्यंग्य बस इतना कहता है—अगर सब साथ हैं, तो तालियाँ और तर्क दोनों साथ क्यों नहीं सुनाई देते? होली की शाम जब रंग उतरते हैं, तब आईना सच्चाई दिखाता है। राजनीति में भी समय का आईना यही करता है। नारे कितने टिके? नीतियाँ कितनी समावेशी रहीं? संवाद कितना हुआ?
तो इस बार जब सत्ता कहे—“बुरा न मानो, होली है”—तो नागरिक मुस्कुराकर पूछ सकते हैं—“रंग तो ठीक है, पर संतुलन कैसा है?”
व्यंग्य का उद्देश्य किसी पर कीचड़ उछालना नहीं, बल्कि यह याद दिलाना है कि लोकतंत्र में रंग तभी सुंदर लगते हैं जब वे सब पर समान रूप से गिरें—और जब कोई भी यह महसूस न करे कि उसे सिर्फ दर्शक बना दिया गया है।
आख़िरकार, नारे होली के गुलाल जैसे हैं—उड़ते हैं, चमकते हैं, पर टिकते नहीं। टिकती है तो नीति की छाप। और वही तय करती है कि “सबका साथ” सचमुच साथ था या सिर्फ एक उत्सवी घोषणा।
लेखक- भृगु नागर
परिचय-भृगु नागर वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक हैं, जिन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में दो दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव है। फ्रंट पेज संपादन, राजनीतिक विश्लेषण, राज्य स्तरीय रिपोर्टिंग और न्यूज़रूम प्रबंधन उनकी विशेष पहचान है। उत्तर प्रदेश की राजनीति, प्रशासन और चुनावी परिदृश्य पर उनकी पकड़ गहरी और तथ्यपरक मानी जाती है। विभिन्न प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में राज्य संवाददाता, पेज वन एडिटर और डेस्क इंचार्ज के रूप में उन्होंने प्रभावशाली भूमिका निभाई है। डिजिटल न्यूज़ ऑपरेशन और ऑनलाइन एडिशन संचालन में भी उनका अनुभव मजबूत है। तेज, सटीक और प्रभावी हेडलाइन निर्माण उनकी विशिष्ट क्षमता है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में दक्षता के साथ वे अनुवाद और विश्लेषण में भी निपुण हैं। जमीनी रिपोर्टिंग से लेकर संपादकीय नेतृत्व तक उनका सफर प्रतिबद्ध पत्रकारिता का उदाहरण है। निष्पक्षता, साहस और जनहित उनके लेखन की मूल भावना है। वर्तमान में वे लखनऊ से सक्रिय पत्रकारिता और वैचारिक लेखन में संलग्न हैं।










