Advertisement
Home International मन की बात से बेमन की बात तक: जब कोर वोटर ही...

मन की बात से बेमन की बात तक: जब कोर वोटर ही पूछने लगे सवाल

0
232

नई दिल्ली, 13 मार्च (विशेष संवाददाता)। रेडियो की तरंगों पर गूंजने वाला कार्यक्रम मन की बात कभी प्रधानमंत्री Narendra Modi और जनता के बीच एक भावनात्मक संवाद का माध्यम माना जाता था। हर महीने जब यह कार्यक्रम आता था तो इसे ऐसे प्रस्तुत किया जाता था जैसे प्रधानमंत्री सीधे जनता के मन की बात सुन रहे हों और उसे ही देश के सामने रख रहे हों। लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए, वही “मन की बात” कब “बेमन की बात” बनती चली गई, यह शायद जनता भी ठीक से समझ नहीं पाई।

2014 और 2019 के चुनावों में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में जिस वर्ग की सबसे बड़ी भूमिका मानी गई, वह सवर्ण समाज था। यह वही वर्ग था जिसने प्रधानमंत्री मोदी को सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक उम्मीद के रूप में देखा। इस वर्ग ने भाजपा को अपना स्वाभाविक राजनीतिक घर माना। लेकिन समय के साथ ऐसे कई फैसले सामने आए, जिनसे इसी वर्ग के भीतर असहजता और नाराजगी की भावना पनपने लगी।

Advertisment

सबसे पहले बड़ा झटका 2019 में तब लगा जब SC/ST (Prevention of Atrocities) Act को लेकर सरकार ने संशोधन किया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद गिरफ्तारी के नियमों में थोड़ी नरमी आई थी, लेकिन सरकार ने संसद में संशोधन लाकर उस व्यवस्था को फिर से पहले जैसा सख्त बना दिया। सरकार ने इसे सामाजिक न्याय और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया, लेकिन सवर्ण समाज के एक हिस्से को लगा कि उनकी चिंताओं को सुना ही नहीं गया। कई जगह विरोध भी हुआ और सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि जिस वर्ग ने भाजपा को मजबूती दी, उसकी पीड़ा पर सरकार इतनी संवेदनशील क्यों नहीं दिख रही।

यह नाराजगी पूरी तरह शांत भी नहीं हुई थी कि अब University Grants Commission से जुड़े नए विवाद ने फिर से बहस को हवा दे दी। शिक्षा से जुड़े फैसलों और नीतियों को लेकर कुछ वर्गों में यह धारणा बनने लगी कि अवसरों के समीकरण ऐसे बदल रहे हैं, जिनसे उनका पारंपरिक प्रभाव कम होता जा रहा है। राजनीति में धारणा कई बार वास्तविकता से ज्यादा प्रभावशाली होती है और यही धारणा अब भाजपा के कोर समर्थक वर्ग के बीच चर्चा का विषय बन गई है।

विडंबना यह भी है कि जिस मन की बात कार्यक्रम के जरिए प्रधानमंत्री जनता से संवाद करते थे, उसी कार्यक्रम की गूंज अब पहले जैसी नहीं सुनाई देती। कभी हर महीने का आखिरी रविवार इस कार्यक्रम के नाम होता था। सरकारी संस्थानों में, मोहल्लों में और यहां तक कि गांवों में भी लोग इसे सुनने के लिए इकट्ठा होते थे। लेकिन अब वह उत्साह धीरे-धीरे कम होता दिखाई देता है। आलोचक व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि पहले प्रधानमंत्री मन की बात करते थे और जनता मन लगाकर सुनती थी, लेकिन अब वही बातें कई लोगों को बेमन की लगने लगी हैं।

राजनीति का एक कठोर सत्य यह भी है कि सत्ता में आने के बाद हर सरकार को संतुलन साधना पड़ता है। हर वर्ग को साथ लेकर चलने की कोशिश करनी पड़ती है। लेकिन यही संतुलन कई बार उन लोगों को असहज कर देता है जो खुद को सबसे मजबूत समर्थक मानते हैं। भाजपा की राजनीति में सवर्ण समाज को लंबे समय तक रीढ़ की हड्डी माना गया। यही वह वर्ग था जिसने Narendra Modi को राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अब स्थिति यह है कि नाराजगी खुलकर सड़कों पर नहीं दिखती, लेकिन खामोशी में सवाल जरूर तैरते रहते हैं। राजनीति के गलियारों में अक्सर यह तंज सुनाई देने लगा है कि पहले जनता मन की बात सुनती थी और विश्वास करती थी, लेकिन अब कई लोग सोचने लगे हैं कि यह सचमुच मन की बात है या फिर बेमन की मजबूरी।

राजनीति में विश्वास की डोर बहुत महीन होती है। जब तक वह मजबूत रहती है, तब तक नेता और समर्थक के बीच दूरी नहीं आती। लेकिन जैसे ही उसमें हल्की दरार पड़ती है, सबसे पहले वही लोग सवाल पूछने लगते हैं जो कभी सबसे बड़े समर्थक हुआ करते थे। शायद यही वजह है कि आज कुछ लोग मुस्कराते हुए कहते हैं कि रेडियो पर मन की बात आज भी आती है, फर्क सिर्फ इतना है कि सुनने वालों के मन में अब पहले जैसी बात नहीं रही।

भाजपा में बढ़ती नाराजगी के बीच योगी का सियासी दांव!

राम मंदिर: विहिप-बजरंग दल ने झेला संघर्ष, संघ ले गया श्रेय?

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here