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ट्रंप की टैरिफ राजनीति से बदली वैश्विक धुरी

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 यूरोप-कनाडा ने अमेरिका को छोड़ा, भारत बना नया भरोसेमंद केंद्र

नई दिल्ली, 30 जनवरी,(भृगु नागर)। दशकों से जिन देशों की अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका पर निर्भर रही हैं, उनके सामने आज यह सबसे बड़ा सवाल खड़ा है कि व्हाइट हाउस में लगातार अविश्वसनीय और शत्रुतापूर्ण होते जा रहे डोनाल्ड ट्रंप के साथ वे आखिर कैसे तालमेल बिठाएं। ट्रंप द्वारा पैदा की गई वैश्विक उथल-पुथल के बीच यह सवाल अब सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि अरबों डॉलर से जुड़ा आर्थिक सवाल बन चुका है।

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ट्रंप की टकरावपूर्ण कूटनीति और टैरिफ को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की नीति ने अमेरिका के परंपरागत सहयोगियों को उससे दूर कर दिया है। इसी का करारा जवाब इस सप्ताह यूरोप और कनाडा ने दिया, जब दोनों ने अपने निर्यात को विविध बनाने के लिए एक अधिक स्थिर, विश्वसनीय और दीर्घकालिक साझेदार की ओर रुख किया। उनका पहला और सबसे अहम पड़ाव भारत बना।

भारत के साथ “व्यापार का सबसे बड़ा समझौता” करने की दिशा में यूरोपीय संघ (ईयू) की पहल ट्रंप के लिए एक बड़ा झटका मानी जा रही है। यह कदम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि ट्रंप की कठोर व्यापार नीतियां और दंडात्मक टैरिफ वैश्विक आर्थिक गठबंधनों में तेज़ बदलाव ला रहे हैं, जिसमें अमेरिका खुद को एक असहज और अलग-थलग स्थिति में पा रहा है।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट की टिप्पणियां भी इसी बेचैनी को उजागर करती हैं। उन्होंने किसी आक्रामक भाषा का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि यूरोप के रुख पर खुली निराशा जाहिर की। सीएनबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि यूरोपीय देश अमेरिका के साथ इसलिए नहीं जुड़े क्योंकि वे भारत के साथ यह व्यापार समझौता करना चाहते थे। ट्रंप के करीबी सहयोगी ने यूरोप पर यूक्रेन युद्ध से ऊपर व्यापारिक हितों को रखने का आरोप भी लगाया और भारत के रूस से तेल आयात का जिक्र किया।

हालांकि, इन आरोपों के बीच अमेरिका एक बुनियादी सच्चाई को नजरअंदाज करता दिखा—कोई भी देश लंबे समय तक दबाव में रहकर या एक अनिश्चित साझेदार पर निर्भर रहना नहीं चाहता। ग्रीनलैंड अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर ट्रंप की धमकियों ने भी यूरोपीय संघ के अविश्वास को और गहरा किया। यही कारण है कि लगभग दो दशकों से चल रही भारत-ईयू वार्ता अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है।

दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी माना है कि “ट्रंप फैक्टर” ने वर्षों से अटके इस समझौते को अंतिम रूप देने में निर्णायक भूमिका निभाई है। यह समझौता सिर्फ अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारत और यूरोप के बीच एक व्यापक और तेज़ी से बढ़ती रणनीतिक साझेदारी की नींव भी है।

भारत के लिए इस समझौते का महत्व बेहद गहरा है। भारत और यूरोपीय संघ मिलकर वैश्विक जीडीपी के लगभग 25 प्रतिशत और विश्व व्यापार के करीब एक-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगले साल की शुरुआत में जिस समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना है, उससे भारत को कपड़ा, रत्न-आभूषण, जूते और अन्य श्रम-प्रधान उत्पादों के निर्यात में बड़ी बढ़त मिलेगी, जो ट्रंप द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत तक के भारी टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित हुए थे।

वहीं, यूरोपीय संघ को भारत को होने वाले अपने 96.6 प्रतिशत निर्यात पर टैरिफ में छूट या समाप्ति का लाभ मिलेगा। भारत की राजनीतिक और आर्थिक संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हुए यूरोपीय संघ ने डेयरी और कृषि जैसे क्षेत्रों को इस समझौते से काफी हद तक बाहर रखा है। साफ है कि यह समझौता सिर्फ एक व्यापारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेतक है।

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