महर्षि अगस्त्य के परम शिष्य सुतीक्ष्ण गुरु-आश्रम में रहकर निष्ठा और एकाग्रता से विद्याध्ययन कर रहे थे। वर्षों की कठोर साधना, सेवा और अध्ययन के बाद एक दिन गुरुदेव ने स्नेहपूर्वक कहा— “वत्स! तुम्हारा अध्ययन पूर्ण हुआ। अब तुम स्वतंत्र हो, अपने जीवन-पथ पर अग्रसर हो सकते हो।”
सुतीक्ष्ण ने विनम्रता से उत्तर दिया— “गुरुदेव! शास्त्रों में कहा गया है कि विद्याध्ययन के उपरांत गुरुदक्षिणा दिए बिना विद्या फलीभूत नहीं होती। कृपा कर मुझे कोई आज्ञा दें।”
महर्षि अगस्त्य मुस्कराए— “बेटा! तुमने जो निष्काम सेवा की है, वही मेरी गुरुदक्षिणा है। सेवा से बढ़कर कुछ नहीं। अब जाओ, सुखी रहो।”
परंतु सुतीक्ष्ण की श्रद्धा अडिग थी। उसने आग्रहपूर्वक कहा— “गुरुदेव! सेवा तो मेरा कर्तव्य है। कृपा कर ऐसी कोई आज्ञा दें, जिसे पूर्ण कर मैं आपका ऋण कुछ तो चुका सकूँ—चाहे वह आपकी सबसे प्रिय वस्तु ही क्यों न हो।”
गुरुदेव ने शिष्य की दृढ़ निष्ठा को परखने का निश्चय किया और बोले—
“यदि देना ही चाहते हो, तो गुरुदक्षिणा में सीताराम जी को साक्षात् मेरे सामने उपस्थित कर दो।”
यह सुनकर सुतीक्ष्ण ने क्षणभर भी संदेह नहीं किया। उन्होंने गुरुचरणों में दंडवत प्रणाम किया और सीधे घोर वन की ओर प्रस्थान कर गए।
वन में पहुँचकर सुतीक्ष्ण ने कठोर तपस्या आरंभ की। वे निरंतर गुरुमंत्र का जप, भगवन्नाम का कीर्तन और ध्यान में लीन रहने लगे। समय बीतता गया, पर उनकी निष्ठा, धैर्य और गुरु-वचन के प्रति समर्पण और अधिक दृढ़ होता चला गया।
एक दिन, उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम माता सीता सहित वहाँ प्रकट हुए, जहाँ सुतीक्ष्ण ध्यानस्थ बैठे थे। प्रभु ने उनके शरीर को हिलाया-डुलाया, पर वे समाधि में इतने तल्लीन थे कि बाह्य चेतना का कोई भान नहीं था।
तब भगवान राम ने उनके हृदय में अपना चतुर्भुज दिव्य रूप प्रकट किया। तभी सुतीक्ष्ण ने नेत्र खोले और श्रीराम को साक्षात् देखकर भाव-विह्वल हो गए। उन्होंने तुरंत दंडवत प्रणाम किया।
भगवान श्रीराम ने उन्हें अविरल भक्ति का वरदान दिया।
अब सुतीक्ष्ण ने गुरुदक्षिणा पूर्ण करने का निश्चय किया। वे भगवान श्रीराम और माता सीता को साथ लेकर गुरु-आश्रम की ओर चल पड़े।
महर्षि अगस्त्य के आश्रम के द्वार पर पहुँचकर श्रीराम और सीता माता आज्ञा की प्रतीक्षा में बाहर ही ठहर गए। उधर सुतीक्ष्ण बिना विलंब किए आश्रम के भीतर गए, गुरुचरणों में साष्टांग प्रणाम किया और सरल भाव से बोले—
“गुरुदेव! मैं गुरुदक्षिणा देने आया हूँ। सीताराम जी द्वार पर खड़े आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
यह सुनते ही महर्षि अगस्त्य का हृदय प्रेम से भर आया। शिष्य उनकी कसौटी पर पूर्ण रूप से खरा उतर चुका था। उन्हें वह पात्र मिल गया था, जिस पर पूर्ण गुरुकृपा बरसाई जा सके।
उन्होंने सुतीक्ष्ण को गले लगाया और अपनी पूर्ण गुरुकृपा का अमृतकुंभ उसके हृदय में उड़ेल दिया।
फिर महर्षि अगस्त्य शिष्य के साथ बाहर आए और भगवान श्रीराम तथा माता सीता का विधिवत स्वागत और पूजन किया।
धन्य हैं सुतीक्ष्ण—जिन्होंने गुरु-आज्ञा के पालन में ऐसी दृढ़ता दिखाई कि गुरुदक्षिणा में स्वयं भगवान को गुरु के द्वार पर ला खड़ा किया।
जो शिष्य पूर्ण समर्पण, तत्परता और श्रद्धा से गुरु-आज्ञा का पालन करता है—
उसके लिए प्रकृति भी अनुकूल हो जाती है,
और भगवान स्वयं उसके संकल्प को पूर्ण करने में सहायक बन जाते हैं।










