माँ कामाख्या के क्रोध और एक भक्त की पत्थर बन जाने की रहस्यमयी गाथा
माँ कामाख्या केवल एक देवी नहीं, बल्कि चेतना, शक्ति और रहस्य का जीवंत स्वरूप हैं। नीलांचल पर्वत पर विराजमान यह महाशक्ति जब प्रसन्न होती हैं तो जीवन दे देती हैं, और जब क्रोधित होती हैं तो पीढ़ियों तक उनका प्रभाव बना रहता है। माँ कामाख्या की महिमा से जुड़ी ऐसी ही एक गाथा आज भी असम की धरती पर श्रद्धा, भय और आस्था के साथ कही जाती है। कहते हैं कि एक समय कामाख्या मंदिर के मुख्य पुजारी केंदु कलाई जी थे।
वे साधारण पुजारी नहीं, बल्कि माँ के अनन्य और सर्वस्व अर्पित भक्त थे। प्रतिदिन रात्रि के सन्नाटे में, जब पूरा नीलांचल पर्वत मौन में डूब जाता था, केंदु कलाई जी आँखों पर पट्टी बाँधकर माँ कामाख्या की स्तुति करते थे। उनका विश्वास था कि देवी को देखने की इच्छा भी अहंकार है। सच्चा भक्त केवल समर्पण करता है, दर्शन की माँग नहीं करता।
उनकी भक्ति इतनी पवित्र और नि:स्वार्थ थी कि स्वयं माँ कामाख्या उनके सामने प्रकट होकर नृत्य करती थीं। यह नृत्य कोई साधारण लीला नहीं थी, बल्कि ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रकटीकरण था। कहा जाता है कि एक बार माँ ने केंदु कलाई जी की भक्ति से प्रसन्न होकर एक मृत बच्ची को पुनः जीवित कर दिया था। यह चमत्कार धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गया।
जब यह बात वहाँ के राजा नरनारायण तक पहुँची, तो श्रद्धा के स्थान पर उनके मन में लालच जाग उठा। राजा माँ कामाख्या का नृत्य अपनी आँखों से देखना चाहता था। उसने पुजारी से आग्रह किया, विनती की, फिर आदेश दिया। लेकिन केंदु कलाई जी जानते थे कि देवी की लीला को देखना अधिकार नहीं, बल्कि परीक्षा है। उन्होंने राजा को बार-बार मना किया।
परंतु सत्ता जब ज़िद पर आ जाए, तो विवेक दब जाता है। राजा की हठ के आगे विवश होकर पुजारी ने एक शर्त पर अनुमति दी—राजा केवल मंदिर की दीवार में बने एक छोटे से छिद्र से देखेगा।
उस अमावस्या की रात जब माँ कामाख्या का दिव्य नृत्य प्रारंभ हुआ, तभी देवी को धोखे का आभास हो गया। अगले ही क्षण पूरा मंदिर काँप उठा। नीलांचल पर्वत जैसे क्रोध से दहाड़ उठा हो। माँ के प्रचंड स्वरूप से चारों दिशाएँ थर्रा गईं। देवी को सबसे अधिक पीड़ा इस बात से हुई कि उनका सबसे प्रिय भक्त भी इस धोखे का कारण बना।
माँ के क्रोध से आहत होकर वही हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। केंदु कलाई जी उसी क्षण पत्थर के बन गए।
वह भक्त, जिसकी भक्ति पर देवी स्वयं नृत्य करती थीं, आज भी एक शिला के रूप में वहाँ विद्यमान बताए जाते हैं। इसके बाद माँ कामाख्या ने राजा नरनारायण को ऐसा श्राप दिया जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। देवी ने कहा कि जिस भी क्षण इस राजवंश पर मेरी दृष्टि पड़ेगी, वह उसी क्षण भस्म हो जाएगा।
कहा जाता है कि यही कारण है कि कूच विहार राजवंश के लोग आज भी उस क्षेत्र से गुजरते समय कार में छतरी खोल लेते हैं। वे नीलांचल पर्वत की ओर आँख उठाने का साहस नहीं करते। उनके लिए यह केवल कथा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चला आ रहा भय और आस्था का मिश्रण है। माँ कामाख्या की यह गाथा हमें यह सिखाती है कि देवी की भक्ति में लालच का प्रवेश विनाश का कारण बनता है, चाहे वह राजा हो या भक्त। माँ करुणामयी हैं, लेकिन उनके नियम अटल हैं।










