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किसे दान देंगे तो लगेगा पाप, दान है क्या

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दान क्या है: सनातन दृष्टि से दान का वास्तविक अर्थ

आज के समय में “दान” शब्द इतना सामान्य हो गया है कि उसका अर्थ लगभग “किसी को कुछ दे देना” भर मान लिया गया है। कोई सड़क किनारे बैठे व्यक्ति को पैसा दे दे, कोई संस्था में चंदा दे दे, या कोई भोजन बाँट दे — सबको दान कहा जाने लगा है। लेकिन सनातन धर्म में दान इतनी सरल और सामान्य क्रिया नहीं है। दान एक धार्मिक संस्कार, एक आत्मिक कर्म और एक नैतिक उत्तरदायित्व है, जिसका सीधा संबंध केवल प्राप्तकर्ता से नहीं, बल्कि दान देने वाले की आत्मिक स्थिति, विवेक और पात्रता से भी है।

संस्कृत में दान का मूल अर्थ है — अपना अधिकार छोड़ देना। अर्थात् जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु, धन या संसाधन पर से अपना स्वामित्व पूर्ण रूप से त्यागकर उसे विधिपूर्वक किसी योग्य पात्र को समर्पित करता है, तभी वह दान कहलाता है। इसमें अपेक्षा, दिखावा, भय, दबाव या सामाजिक प्रतिष्ठा का कोई स्थान नहीं है। इसी कारण मनुस्मृति, महाभारत, पुराण और भगवद्गीता बार-बार यह स्पष्ट करते हैं कि हर देना दान नहीं होता

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भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण दान के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि जो दान बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है, वही सात्त्विक दान है। इसके विपरीत जो दान नाम, यश, दिखावे, या प्रत्युपकार की भावना से दिया जाए, वह राजस कहलाता है और जो दान अपात्र को, अनुचित समय पर, तिरस्कारपूर्वक दिया जाए, वह तामस दान है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि सनातन धर्म में तामस दान को पुण्य नहीं बल्कि पापकर्म की श्रेणी में रखा गया है।

दान सनातन धर्म में केवल सामाजिक दया नहीं, बल्कि आत्मा का संस्कार है। यह विवेक, शुद्धता और धर्मबोध की परीक्षा है। हर देना दान नहीं है और हर जरूरतमंद दान का अधिकारी नहीं है। जो व्यक्ति इस अंतर को नहीं समझता, वह अनजाने में पुण्य के स्थान पर पाप का भागी बन सकता है। आज जब दान को भावुकता और दिखावे से जोड़ा जा रहा है, तब शास्त्रीय दृष्टि से दान को समझना और अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

दान किसे देना श्रेयस्कर होता है

शास्त्रों में दान का अधिकारी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व और विदुर नीति में बार-बार कहा गया है कि दान का वास्तविक पात्र वही है जो धर्मनिष्ठ, संयमी, लोभ-रहित, और आत्मसंयम में स्थित हो। विशेष रूप से ब्राह्मण को दान इसलिए श्रेयस्कर माना गया, क्योंकि ब्राह्मण का पारंपरिक कर्तव्य ही था — विद्या, यज्ञ, धर्म और समाज को दिशा देना। जो ब्राह्मण वेदाध्ययन, संयम और आचार में स्थित हो, उसे दिया गया दान समाज में धर्म की रक्षा करता है।

इसके अतिरिक्त शास्त्रों में अतिथि, संन्यासी, विद्वान, गुरु, वृद्ध, माता-पिता और ऐसे व्यक्ति जो स्वयं धर्ममार्ग पर चल रहे हों लेकिन संसाधनों के अभाव में हों — उन्हें दान देना श्रेष्ठ माना गया है। यहाँ निर्धनता अकेला मापदंड नहीं है, बल्कि चरित्र और उद्देश्य मुख्य कसौटी हैं। यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं कि एक अपात्र निर्धन को दिया गया दान निष्फल हो सकता है, जबकि एक साधनहीन लेकिन धर्मनिष्ठ व्यक्ति को दिया गया दान अत्यंत फलदायक होता है।

किसे दान देने से पुण्य नहीं मिलता, बल्कि पाप लगता है

यह विषय आज के समय में सबसे अधिक असुविधाजनक लेकिन सबसे अधिक आवश्यक है। सनातन धर्म स्पष्ट रूप से कहता है कि अपात्र को दिया गया दान पाप का कारण बनता है। महाभारत में विदुर कहते हैं कि जो व्यक्ति आलसी, नशे में लिप्त, हिंसक, छलकारी, अधर्म से जीविका चलाने वाला या समाज को हानि पहुँचाने वाला हो, उसे दिया गया दान दाता के पुण्य को नष्ट कर देता है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि जो व्यक्ति परिश्रम करने में सक्षम है लेकिन जानबूझकर भिक्षा या मुफ्त पर निर्भर रहता है, वह दान का अधिकारी नहीं है। ऐसे व्यक्ति को दिया गया धन न तो उसका कल्याण करता है और न ही दाता का। आज सड़क पर बैठे अनेक भिखारी, जो संगठित गिरोहों का हिस्सा हैं या आलस्य को जीवन-वृत्ति बना चुके हैं, शास्त्रीय दृष्टि से दान के पात्र नहीं हैं। उन्हें दिया गया धन दान नहीं, बल्कि अधर्म को पोषित करने वाला कृत्य बन जाता है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति दान का उपयोग अधर्म, नशा, हिंसा या अनैतिक कार्यों में करता है, उसे दान देना तामस कर्म है। शास्त्रों में यहाँ तक कहा गया है कि ऐसे दान से दाता अगले जन्म में दरिद्रता या मानसिक कष्ट भोगता है।

दान देने वाले की पात्रता क्या है

अक्सर लोग केवल यह पूछते हैं कि दान किसे देना चाहिए, लेकिन सनातन धर्म इससे भी गहरा प्रश्न पूछता है — दान देने वाला स्वयं दान के योग्य है या नहीं। शास्त्रों में कहा गया है कि दान देने वाला व्यक्ति यदि स्वयं छल, अन्याय, शोषण या अधर्म से धन अर्जित करता है, तो उसका दान शुद्ध नहीं माना जाता। अन्याय से कमाया गया धन चाहे कितने ही अच्छे उद्देश्य से क्यों न दिया जाए, वह पुण्य नहीं देता।

दानकर्ता में विनय, अहंकार-रहित भाव, कृतज्ञता और कर्तव्यबोध होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति दान देकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगे, प्राप्तकर्ता को छोटा समझे, या समाज में उसका प्रचार करे, तो वह दान नहीं बल्कि आत्मप्रदर्शन बन जाता है। मनुस्मृति स्पष्ट कहती है कि दान देते समय दाता को ऐसा भाव रखना चाहिए मानो वह स्वयं अनुगृहीत हो रहा हो।

गरीबों को दिया गया धन: दान या सहायता?

यह प्रश्न आज सबसे अधिक भ्रम पैदा करता है। सनातन दृष्टि से हर गरीब व्यक्ति दान का पात्र नहीं होता। जो गरीब असहाय है, वृद्ध है, रोगी है, विधवा है, अनाथ है या किसी आपदा का शिकार है — उसकी सहायता करना धर्म है, लेकिन वह हमेशा दान नहीं कहलाता। ऐसे मामलों में अधिकांशतः वह सहायता होती है।

सहायता और दान में मूल अंतर यह है कि सहायता आवश्यकता-आधारित होती है, जबकि दान पात्रता-आधारित। सहायता का उद्देश्य कष्ट निवारण है, जबकि दान का उद्देश्य धर्म की स्थापना और आत्मिक शुद्धि। किसी भूखे को भोजन कराना अत्यंत पुण्य है, लेकिन यदि वह व्यक्ति आलसी है और श्रम नहीं करना चाहता, तो वह सहायता है, दान नहीं।

सनातन धर्म सहायता को भी महत्त्व देता है, लेकिन दान की ऊँची श्रेणी अलग रखता है। इसलिए यह कहना कि “गरीबों को दान दे दो” — शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा और कई बार गलत कथन है। सही कथन यह होगा कि असहाय की सहायता करो और योग्य को दान दो

इन्हें दान दोंगे लगेगा पाप

जो व्यक्ति अधर्मी, दुराचारी या पाप कर्मों में लिप्त हो, उसे दिया गया दान पाप का भागीदार बना देता है। यदि कोई व्यक्ति अपराध, हिंसा, भ्रष्टाचार या समाज विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है और उसे आर्थिक या अन्य प्रकार का सहयोग दिया जाता है, तो यह अधर्म के पोषण के समान माना गया है। ऐसे दान को मनुस्मृति और अन्य ग्रंथ निष्फल बताते हैं।

नशे की लत में डूबे व्यक्ति को दिया गया दान भी पाप का कारण बनता है, विशेष रूप से तब जब यह निश्चित हो कि दान का धन शराब, नशा, जुआ या अन्य गलत कार्यों में खर्च होगा। इस स्थिति में दान करुणा नहीं बल्कि पाप में सहयोग बन जाता है। इसी प्रकार सक्षम होते हुए भी जो व्यक्ति श्रम नहीं करता और केवल दूसरों के दान पर निर्भर रहता है, उसे दिया गया दान तमसिक कहा गया है। यह व्यक्ति को कर्म से दूर कर पतन की ओर ले जाता है।

धर्म के नाम पर ढोंग करने वाले साधु, बाबा या तथाकथित धर्मगुरु, जो श्रद्धालुओं की भावनाओं से खेलकर धन, स्त्री या सत्ता का दुरुपयोग करते हैं, उन्हें दिया गया दान भी अधर्म का समर्थन माना जाता है। ऐसे लोगों को दान देने से पुण्य नहीं, बल्कि समाज को हानि पहुँचती है।

यदि दान स्वयं पाप से अर्जित धन से किया गया हो, जैसे रिश्वत, छल, शोषण या अन्य अनुचित साधनों से कमाया गया पैसा, तो वह दान भी व्यक्ति को पाप से मुक्त नहीं करता। शास्त्र स्पष्ट करते हैं कि अपवित्र धन से किया गया दान केवल अहंकार बढ़ाता है, पुण्य नहीं देता।

कभी-कभी पात्र के अनुरूप न होने वाली वस्तु का दान भी पाप बन जाता है। जैसे भूखे को ऐसी वस्तु देना जो उसके लिए हानिकारक हो, रोगी को गलत चीज देना या किसी धार्मिक व्यक्ति को अपवित्र वस्तु देना—इसे विपरीत दान कहा गया है, जो दोष उत्पन्न करता है।

दान की भावना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि दान अहंकार, दिखावे, भय, दबाव या मजबूरी में किया गया हो, तो भगवद्गीता के अनुसार वह तमसिक दान कहलाता है और उसका फल नकारात्मक होता है। ऐसा दान आत्मशुद्धि के स्थान पर आत्मवंचना बन जाता है।

शास्त्रों में सात्त्विक दान वही बताया गया है जो देश, काल और पात्र को देखकर, श्रद्धा और विनम्रता के साथ किया जाए। इसलिए विवेकहीन दान से बचना ही धर्म है, क्योंकि गलत स्थान पर किया गया दान पुण्य नहीं, पाप का कारण बन सकता है।

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

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