नई दिल्ली, 29 जनवरी, (भृगु नागर)। भारतीय रुपये में ऐतिहासिक गिरावट और 92 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंचने को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। यह गिरावट तब हो रही है जब भारत की जीडीपी विकास दर 8.2% जैसी मजबूत स्थिति में है। इस विरोधाभास ने मोदी सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मौजूदा संकट के पीछे सरकार की कुछ आर्थिक रणनीतियों और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बदलती व्यापारिक नीतियों का गहरा प्रभाव माना जा रहा है। विशेष रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50% तक के भारी टैरिफ ने रुपये की कमर तोड़ दी है। भारत की विदेश नीति में अमेरिका और रूस के बीच संतुलन बनाने की कोशिशों के बीच यह व्यापारिक तनाव रुपये के लिए नकारात्मक साबित हो रहा है।
सरकारी स्तर पर कैपिटल अकाउंट (पूंजी खाता) में आई गिरावट एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। साल 2026 की शुरुआत से ही विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय बाजारों से लगातार पैसा निकाला जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक अरबों डॉलर की निकासी हो चुकी है, जो सीधे तौर पर विदेशी निवेशकों के घटते भरोसे या वैश्विक स्तर पर डॉलर के मजबूत होने की ओर इशारा करती है।
इसके अलावा, सरकार की आयात नीतियों और बुलियन (सोना-चांदी) के बढ़ते आयात ने भी व्यापार घाटे को बढ़ाने का काम किया है। जहाँ एक तरफ सरकार यूरोपीय संघ के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) जैसे बड़े सौदे कर रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू स्तर पर कॉरपोरेट जगत में रुपये की कमजोरी को लेकर डर का माहौल है। आयातकों ने डॉलर की सुरक्षात्मक खरीदारी (हेजिंग) बढ़ा दी है, जिससे बाजार में डॉलर की किल्लत हो गई है और रुपया दबाव में है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका पर भी विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक अब रुपये को किसी एक निश्चित स्तर पर बचाने के बजाय उसे बाजार की शक्तियों के अनुरूप ढलने (फ्लेक्सिबिलिटी) की अधिक छूट दे रहा है। गोल्डमैन सैक्स जैसे संस्थानों का अनुमान है कि यह गिरावट जारी रह सकती है और आने वाले 12 महीनों में रुपया 94 के स्तर तक भी जा सकता है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब निर्यातकों को राहत देने और आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाना है।










