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वैश्विक भूचाल के बीच मोदी की स्ट्राइक डिप्लोमेसी

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Netanyahu से सीधी बात, जर्मन चांसलर भारत रवाना, यूरोप में जयशंकर का दमदार मिशन

नई दिल्ली, 7 जनवरी (एजेंसियां)। अंतरराष्ट्रीय राजनीति इस समय उथल-पुथल, युद्ध और ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रही है, लेकिन इसी उथल-पुथल के बीच भारत की कूटनीति पूरी आक्रामकता और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अब केवल वैश्विक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक समीकरणों को प्रभावित करने वाली निर्णायक शक्ति बन चुका है।

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इसी रणनीतिक सक्रियता के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से फोन पर विस्तृत और गंभीर बातचीत की। यह संवाद किसी नववर्षीय औपचारिकता तक सीमित नहीं था, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चे, सुरक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को और गहराई देने का स्पष्ट संदेश था।

पश्चिम एशिया इस समय विस्फोटक हालात से गुजर रहा है। गाजा में हमास के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई, ईरान को लेकर बढ़ती आशंकाएं और क्षेत्रीय अस्थिरता ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में मोदी-नेतन्याहू संवाद यह दर्शाता है कि भारत आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी प्रकार का दोहरा मापदंड स्वीकार करने को तैयार नहीं है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह आतंक के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहेगा—चाहे दबाव किसी भी दिशा से आए।

यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब भारत-अमेरिका संबंधों में कुछ मुद्दों पर मतभेद भी उभरकर सामने आए हैं। इसके बावजूद भारत ने एक बार फिर साबित किया है कि उसकी विदेश नीति किसी एक शक्ति केंद्र की मोहताज नहीं है। इजराइल के साथ मजबूत संवाद भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति का खुला प्रदर्शन है। रक्षा तकनीक, खुफिया सहयोग और आतंकवाद विरोधी रणनीतियों में भारत-इजराइल साझेदारी अब और अधिक आक्रामक और निर्णायक होती जा रही है।

इसी बीच, भारत की कूटनीतिक हलचल केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। अगले सप्ताह जर्मन चांसलर की भारत यात्रा प्रस्तावित है, जिसे वैश्विक शक्ति संतुलन के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। जर्मनी यूरोप की आर्थिक और राजनीतिक रीढ़ है और उसके शीर्ष नेतृत्व का भारत आना इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली अब यूरोप की प्राथमिक रणनीतिक सूची में शीर्ष स्थान पर पहुंच चुकी है। व्यापार, अत्याधुनिक तकनीक, रक्षा सहयोग और जलवायु नीति जैसे क्षेत्रों में यह यात्रा भारत के लिए बड़े अवसर खोल सकती है।

साथ ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर फ्रांस और लक्जमबर्ग की अहम यात्रा पर हैं। यह दौरा भारत की मल्टी-लेयर डिप्लोमेसी का सशक्त उदाहरण है। फ्रांस जहां भारत का पुराना और भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार है, वहीं लक्जमबर्ग जैसे छोटे लेकिन आर्थिक रूप से प्रभावशाली देश से संपर्क यह दिखाता है कि भारत अब केवल बड़ी शक्तियों तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है जहां उसके दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित सुरक्षित हो सकते हैं।

इन तमाम घटनाक्रमों को एक साथ देखने पर साफ होता है कि भारत की विदेश नीति अब रक्षात्मक या प्रतिक्रियात्मक नहीं रही। यह नीति अब पूर्व नियोजित, स्पष्ट और आक्रामक दिशा में आगे बढ़ रही है। मोदी सरकार का संदेश बिल्कुल साफ है—भारत अपने राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं करेगा और आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया को दोहरे मापदंड नहीं अपनाने देगा।

जब पूरी दुनिया ध्रुवीकरण और टकराव की ओर बढ़ रही है, तब भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ—सभी के साथ संतुलित लेकिन सशक्त संवाद बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र वैश्विक पहचान कायम रख सकता है।

कुल मिलाकर, फोन पर हुई उच्चस्तरीय बातचीत, लगातार हो रही कूटनीतिक यात्राएं और वैश्विक मंचों पर भारत की मुखर मौजूदगी यह साबित करती है कि आज भारत केवल उभरती शक्ति नहीं, बल्कि एक निर्णायक, भरोसेमंद और प्रभावशाली वैश्विक खिलाड़ी बन चुका है। मोदी की आक्रामक कूटनीति ने भारत की विदेश नीति को नई धार, नई दिशा और नया आत्मविश्वास दिया है।

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